
क्षितिज....

वंदे मातरम (महबूब) MEHBOOB
Music- ए. आर. रहमान
Album- मां तुझे सलाम
महबूब उस गीतकार का नाम है जिन्हें अपने काम के मुताबिक उतना नाम नहीं मिल पाया जिसके वो हक़दार है। महबूब वो नाम है जो आवाज़ तक गया ही नहीं। महबूब ने 'हम दिल दे चुके सनम' के लिए 'तड़प-तड़प के ' लिखा है वहीं युवा के 'कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद' को महबूब ने फ़िल्म के बैकग्राउंड के मुताबिक बांग्ला अंदाज़ में बख़ूबी पेश किया। इसके अलावा वे रंगीला, दौड़, लकीरें, बॉंम्बे, तक्षक जैसी कई फ़िल्मों के लिए गीत लिख चुके हैं। ए. आर. रहमान की भी पसंद हैं महबूब। रहमान का गाया और महबूब का लिखा एक शानदार गीत....
यहां-वहां सारा जहां देख लिया है....
कहीं भी तेरा जैसा कोई नहीं है
अस्सी नहीं, सौ दिन दुनिया घूमा है
नहीं कहीं तेरा जैसा कोई नहीं
मैं गया जहां भी, बस तेरी याद ही
जो मेरे साथ थी
मुझको तड़पाती-रूलाती
सब से प्यारी तेरी सूरत
प्यार है बस तेरा, प्यार ही
मां तुझे सलाम, मां तुझे सलाम
अम्मा तुझे सलाम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
जनम-जनम तेरा ही दीवाना मैं
झूमू-नांचूं, गाऊं तेरे प्यार का तराना मैं
जीना नहीं सोच नहीं दुनिया की दौलत नहीं
बस लूटूंगा तेरे प्यार ख़ज़ाना मैं
इक नज़र जब तेरी होती है प्यार की
दुनिया तब तो मेरी चमके-दमके-महके रे
तेरा चेहरा सूरज जैसा, चांद सी ठंड है प्यार में
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
तेरे पास ही मैं आ रहा हूं
अपनी बाहें खोल दे
ज़ोर से मुझको गले लगा ले
मुझको फिर वो प्यार दे
तू ही तो ज़िंदगी है, तू ही मेरी मोहब्बत है
तेरे ही पैरों में जन्नत है
तू ही दिल, तू जान, अम्मा
मां तूझे सलाम, मां तूझे सलाम
अम्मा तूझे सलाम, मां तूझे सलाम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम......
महबूब का एक और गाना
बेजान दिल को
बेजान दिल को
बेजान दिल को तेरे इश्क़ ने ज़िंदा किया
फिर तेरे इश्क़ ने ही इस दिल को तबाह किया
तड़प-तड़पके इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए हां लूट गए
तो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में...
अजब है इश्क़ यारा
पल-दो-पल की ख़ुशियां
ग़म के ख़ज़ानें मिलते हैं
फिर मिलती हैं तन्हाईयां
कभी आंसू, कभी आहें
कभी शिक़वे, कभी नालें
तेरा चेहरा नज़र आए
तेरा चेहरा नज़र आए मुझे दिन के उजालों में
तेरी यादें तड़पाएं
तेरी यादें तड़पाएं रातों के अंधेरों में
तेरा चेहरा नज़र आए
मचल-मचलके इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए हां लुट गएतो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में
अगर मिले ख़ुदा तो
पूछूंगा ख़ुदाया
जिस्म मुझे देके मिट्टी का
शीशे-सा दिल क्यों बनाया
और उसपे दिया फ़ितरत के वो करता है मोहब्बत वाह रे वाह तेरी क़ुदरत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत, उसपे दे दिया क़िस्मत
कभी है मिलन, कभी फ़ुरक़त
कभी है मिलन, कभी फ़ुरक़त है यही क्या वो मोहब्बत
वाह रे वाह तेरी क़ुदरत
सिसक-सिसकके इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए, हां लुट गएतो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में
वादियों से लौटकर....
शायद किसी ने ठीक कहा है जिंदगी का असली मज़ा सफऱ में हैं मंजिल की खामोशी में नहीं। वापिस आये तो अपना शहर पराया लग रहा था। मानो उसने किसी और के साथ घर बसा लिया हो।
फिल्म बनाने का अनूठा अंदाज़…जॉनी गद्दार
अगर मैं आपसे कहूं की फिल्म की शुरुआत में ही अगर आप को बता दिया जाये कि आप जो फिल्म देखने जा रहे हैं, उसमें फलां शख्स कातिल है तो क्या फिर भी आप निर्देशक की प्रतिभा पर यकीन करते हुए उस फिल्म को देखेंगे। यकीन मानिय़े इस सवाल का जवाब आपको जॉनी गद्दार में मिलेगा। यहां गीतकार से लेकर फिल्म के निर्देशक तक एक भी ब्रैंड नेम नहीं है..। न तो निलेश मिश्रा और जयदीप साहनी के गीतों में गुलज़ार सी ताज़गी है और न ही नील नितिन मुकेश का इंतज़ार सांवरिया के रणबीर कपूर की तरह हो रहा है। बावजूद इसके निर्देशक श्रीराम राघवन ने जॉनी गद्दार के जरिये कहानी कहने का एक नया तरीका इजाद किया है.। जहां निर्देशक ने खालिस कहानी कही है वो भी बिना कोई सफाई दिये। अंग्रेजी में अगर कहें तो just do it ,no explanation. इस फिल्म की शुरुआत से ही छायांकन आपके दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है। पात्र ठीक वैसा ही अभिनय करते हैं जैसा कि निर्देशक चाहता है। हां, जहां तक बैकग्रांउड स्कोर की बात है तो उसमें शंकर ,एहसान,लॉय की जोड़ी ने एक खास किस्म की स्वायत्ता ले ली है। इसलिए तो हर दृश्य में जिस तरह से पुरानी थ्रिलर फिल्मों के संगीत का रिमिक्स कानों में घोला गया है। वो कहानी की मांग के मुताबिक माहौल बनाता है। अगर फिल्म के अलग अलग पहलुओं पर बात करें तो छायांकन में मुरलीधरन ने गज़ब ढ़ा दिया है। कैसे एक साधारण से बातचीत के सीन को भी कैमरे के एक नये कोण से तराशकर मज़ेदार बनाया जा सकता है ये उन्हें बखूबी आता है। इसलिये फिल्म इंटरवल तक आपको खुद से चिपटाये रखती है। इंटरवल के बाद अभिनेता अपने फार्म में और भी धाकड़ होते गये हैं। खासकर नील नितिन मुकेश जिनके तराशे हुए नैन नक्शों को भूलकर अब तक आप ये समझ चुके होते हैं कि ये आदमी सिर्फ सही मौके की फिराक में है और अगर इसे ये मौका मिल गया तो वो हमारी इंडस्ट्री के जमे-जमाये नायकों के पसीने छुड़ा सकता है। जहां तक बात धर्मेंद्र की है वो तो फिल्म में its not about age ,its about mileage वाला संवाद बोलकर स्क्रीन पर अपनी धाक पहले ही जमा लेते हैं। विनय पाठक भी खोसला का घोंसला और भेजा-फ्राई के बाद इस बार भी सही गेंद(संवाद) पर सही टाईमिंग करके चौका मारने के अभ्यस्त हो गये हैं। रही बात रिमी सेन की तो उनका इस्तेमाल फिल्म में एक मकसद से किया गया है। मकसद जॉनी की गद्दारी का औऱ फिल्म के सारे खेल का। आप चाहें तो उन्हें फिल्म का सबसे वेस्ट मैटिरियल कह सकते हैं या फिर कहानी को बुनने में मदद करने वाली सूई जो तीखापन लिये है। पर अफसोस जब हीरो इतना हैंडसम हो तो हिरोइन सोच समझ के चुननी चाहिये। ये श्रीराम राघवन को समझना होगा। नहीं तो वो उम्दा फिल्म बनाते जायेंगे और दर्शक उसे नकारते जायेंगे। आखिर बेहतर फिल्म को बेहतर बाज़ार मुहैया कराने में निर्देशक का भी योगदान होना चाहिये।हम तो ऐसे हैं भइया.. (स्वानंद किरकिरे) SWANAND KIRKIRE
Song- हम तो ऐसे हैं भइया...Lyricist- स्वानंद किरकिरे
Singer- श्रेया घोषाल, सुनिधी चौहान,
स्वानंद किरकिरे, प्रणब बिस्वास
Music- शांतुनु मोइत्रा
Film- लागा चुनरी में दाग
Director- प्रदीप सरकार
स्वानंद किरकिरे इससे पहले परिणीता, एकलव्य, मुन्नाभाई एमबीबीएस, लगे रहो मुन्नाभाई, हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी.. जैसी फ़िल्मो के गाने भी लिख चुके हैं। आईए, आपको उनके लिखे एक ठेठ बनारसी गाने से रू-ब-रू कराते हैं...
ये गाना सुनने के लिए आप यहां क्लिक करें....
जेब में हमरी दुई रूपैया
श्याम बेनेगल: सिनेमा जगत के दादा
अंकुर, मंथन, भूमिका, निशांत जैसी बेहतरीन फिल्मों केजरिए हिंदी सिनेमा में नई इबारत लिखने वाले श्याम बेनेगल को भारतीय फिल्मों का
सर्वोच्च सम्मान दादासाहब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। बेनेगल को 2005
के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। भले ही कुछ देर से ही सही लेकिन इस बार का ये
पुरस्कार श्याम बेनेगल को दिया जाना इस पुरस्कार की साख को
और बढ़ा देता है...
- एक नजर बेनेगल के फिल्मी सफर पर...
अगर कहें कि सिनेमा एक प्रतीकात्मक माध्यम है तो कहना पडेगा कि श्याम बेनेगल की फिल्में प्रतीकों में बात करती है। सन् 1973 में अंकुर फिल्म के जरिये उन्होंने सेल्युलायड की दुनिया में कदम रखा था। अंकुर का वो द्रश्य आज भी उतना ही दमदार लगता है जिसमें एक बच्चा जमींदार के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ जमींदार के घर की खिड़की पर पत्थर दे मारता है।अंकुर का वो बच्चा दरअसल और कोई नहीं खुद श्याम बेनेगल का ही एक रुप है।और वो पत्थर बालीवुड की झूठी और फरेबी दुनिया के राजमहल की खिडकी पर मारा गया था।यह अहसास दिलाने के लिए कि रंगीन और चमकदार कांच के दायरे के इस ओर धूल,धूप और धुएँ से भरी एक दुनिया और भी है,जिसमें नायक नायिकाओं के लिए जीवन का मतलब जडों के इर्द-गिर्द नाचकर इज़हार -ए -मोहब्बत करना ही नहीं है।
दरअसल श्याम बेनेगल की फिल्में अपने आप में एक आंदोलन की शुऱुआत हैं..जहां समाज के हर वर्ग का चेहरा हमें झांकता हुआ मिलता है...फिर चाहे बात मंडी की रुकमिनी बाई की हो ...
जिसके कोठे में हर वक्त कोई न कोई हलचल मची रहती है..या फिर इंसानियत के बूते जिंदा रहने वाली मम्मो की..इतना ही नहीं बल्कि भूमिका में तो एक औरत की जिंदगी से जुडे कई पहलुओं पर श्याम बेनेगल ने बिना किसी झिझक के रोशनी डाली....वो भी तकनीक के हर छोटे बडे पहलुओं पर ध्यान देते हुए ..इसलिए उनकी हर फिल्म अपने आप में एक कलासिक का दर्जा पा गई है....
शायद यही वजह है कि दादा साहेब फालके पुरस्कार पाने के बावजूद भी श्याम बेनेगल रुकने का नाम नही लेने वाले बल्कि भारत की एक नए सिरे से खोज करने के लिए वो बुद्द के जीवन पर एक फिल्म बनाने का विचार कर रहे हैं...दरअसल इन बीते चौंतीस सालों में श्याम बेनेगल की फिल्मों ने जिंदगी के हर लम्हे को छू डाला है.....
-तुषार उप्रेती
ये आग लगने से पहले क्यों बुझी ?
धुआं उठा तो आग भी होगी,पर ये वक्त से पहले क्यों और कैसे बुझ गई थोड़ा खोपड़ी खुझाते हुए सोचें तो समझ आयेगा।मुनाफा, मार्केटिंग और मनोरंजन(निश्चित तौर पर यहां हम एक खास तबके के मनोरंजन की बात कर रहे हैं) में हमेशा अव्वल रहने वाले रामू कैंप पर इस बार लोगों ने कैंची चला दी है। ‘शोले’ ‘आग’ पकड़े उससे पहले ही रामू के अरमानों पर किसी ने मानो पानी डाल दिया हो..पहले दिन ही रामगोपाल वर्मा की आग सिर्फ 50 प्रतिशत का बिज़नेस करते हुए हांफने लगी है। ये एक देसी बनारसी पहलवान की तरह चारों खाने चित्त हो गई है। जो लंगोट बांध कर तो अखाड़े में पूरे दम-खम से उतरता है लेकिन उसका लंगोट जल्द ही उतार लिया जाता है।
-तुषार उप्रेती
किसने चक-दिया इंडिया...

किसी ने ठीक कहा है कि आने वाले समय में स्किप्ट ही असली स्टार होगी ...यानि फिल्मों में चेहरे नहीं कहानी ज्यादा बिकेगी..शायद तब कहीं जाकर हम जैसे चवन्नी-छाप लेखकों का कुछ भला हो।इस बात को हम सुभाष घई के उस ऐलान से जोड़ कर देख सकते हैं ,जिसमें उन्होंने घोषणा कर डाली है कि वो एक उम्दा स्किप्ट लिखने वाले को एक करोड रुपये देंगे..।
अब बात करते हैं हाल-फिल्हाल में रिलीज हुई फिल्म चक-दे इंडिया की इसमें भी वो सब-कुछ है जो यशराज फिल्मों से आज से पहले एक्सेप्ट करना थोडा मुश्किल था। कहां हाथ में भारी भरकम थाल लिये चालिस हज़ार का लेहंगा पहने टेसुए बहाती वो औरतें जो कभी खुशी कभी गम के बड़े बड़े ढ़कोसले करती भारतीयता का ढ़ोग रचती थी...और कहां साधारण सी दिखने वाली वो महिलाएं जो हॉकी की एबीसीडी एक नये कोच के साथ ,नये तरीके से सीखने की जुगत में लगी पड़ी हैं।
साफ तौर पर कहें तो चक-दे इंडिया यशराज बैनर की फिल्म है ही नहीं ये पूरी तरह से शिमीत अमीन की फिल्म है..जो इससे पहले अब तक छप्पन जैसी यथार्थवादी फिल्म बनाकर साबित कर चुके हैं कि उनमें कहानी कहने का एक अदभुत और नया साहस कूट-कूट के भरा हुआ है.....
एक रिश्ता....
ना देखा तुम्हे, ना तुमसे कभी मिला..
ना जाने इस रिश्ते को क्या नाम देते हैं..
यार मुझको सभी पागल कहते हैं..
सोचता हूं तेरे दामन को छोड़ दूं कभी..
इस बेनाम से रिश्ते को तोड़ दूं कभी..
जाने किस दुनिया में हम दो रहते हैं..
यार मुझको सभी पागल कहते हैं...

