कुछ आवाज़ें


आज मन हुआ कि कान
में एक सुऱाख करुं
इसे शोर सुनाई देता है
पर पचा नहीं पाता ये
वो महीन आवाज़ें

ये चीखों को निगल जाता है
पर पेड़ के पत्तों की सांय-सांय
को समझता नहीं,

ये गालियां बरर्दाश़्त करता है
पर पहचानता नहीं मां की आवाज़

कभी जब कोई रोता है अकेले में
ये अनसुनी करता है सिसकियां

जब कभी दुहाई देता है
कोई किसी संबंध की
तब दोनों कान टालते हैं
दुहाई को भी...

इसलिए मन होता है
कि सुऱाख करुं कान में...

ताकि वो कम-से-कम
अपनी आवाज़ तो सुन सके
और मेरे पास लोगों के
सवालों के जवाब में
कहने के लिए इतना तो हो
कि मैं एक कान से सुनकर
दूसरे कान से निकाल देता हूं

इसलिए मैं करना चाहता हूं
सिर्फ एक सुऱाख.....

तुषार उप्रेती



कत्ल

सन्नाटा वहीं है
लोग आगे बढ़ गये हैं,


धूल वैसे ही लेटी है
शव उसमें सड़ गये हैं,


कत्ल तो किया था उसने
वो दोष मुझ
पर मढ़ गये.......



तुषार उप्रेती

चार्ली चैप्लिन यानी हम सब ....



दुनिया ने कभी उसे दुत्कारा था। बाद में उसी दुनिया ने उसे सिर आंखों पर बिठाया... उसने हमेशा अपने आसपास मक्कारी का समुद्र पाया..जिसमें बड़े बड़े मगरमच्छ घात लगाए बैठे थे.. इसलिए पर्दे पर उसने कुछ ऐसी लातें मारी जिसने मक्कारी की कमर तोड़ दी... ये वो लातें थी जो कमज़ोर से दिखने वाले इस शख्स ने अपने से आकार में बड़े..हाथी जैसे शरीर वाले उस आदमी की चूतड़ पर मारी थी..जो भोलेपन के नकाब में अपना मक्कार चेहरा छिपाता था..यकीनन लोग जब ये देखते तो उनके पेट में हंस-हंस के बल पड़ जाते...
ये कारनामा था उस शख्स का जिसे दुनिया चार्ली चैप्लिन के नाम से जानती है...



चार्ली चैप्लिन जिसने दुनिया को पहली बार बताया कि खुद पर हंसने का सुख ही कुछ और है..वो जिंदगी भर दूसरों को हंसाता रहा और जिंदगी उसे हर वक्त रुलाती रही... शायद इसलिए उसने एक बार कहा था कि 'मुझे बारिश में रोना पसंद हैं क्योंकि आपका दुख आप तक ही रहता है'... कभी लंदन की गलियों में पागल मां के प्यार के लिए भटकता भूखा चार्ली आने वाले दिनों मे इतना मशहूर होगा ये किसी ने भी नहीं सोचा होगा.. उसकी शख्सियत से डर कर जापान के आतंकवादियों ने उसकी हत्या करने की योजना बनाई थी.. वो समझते थे कि उसकी हत्या से बौखलाकर अमेरिका जापान में दूसरा विश्व युद्द शुरु होगा.. चार्ली उन दिनों अपनी लोकप्रियता के चरम पर था औऱ उन दिनों अमेरिका में रह रहा था.. बाद में जब आतंकवादियों को ये पता चला कि चार्ली अमेरिका का गौरव नहीं बल्कि ब्रिटेन के नागरिक हैं तो उन्होंने उसकी हत्या का विचार त्याग दिया...


उसने जिंदगी भर कई महिलाओं से संबंध बनाए पर अफसोस वो जिंदगी भर अकेलेपन से जूझता रहा.. साथ रहा तो बस हेटी केली नाम की लड़की से प्यार का अहसास..जो उसे कभी न मिल पाई... उसके साथ अगर जिंदगी में किसी ने दिया तो वो था उसका भाई सिडनी चैप्लिन और उसकी कला..यानि कि उसकी फिल्में जैसे द ट्रैम्प, सिटी लाईट्स,द ग्रेट डिक्टेटर(जो हिटलर की खिल्ली उड़ाती थी), लाइमलाइट... इत्यादि...
दुनिया ने शायद ही कभी इतना ताकतवर चरित्र पर्दे पर कभी देखा हो... वो पिट कर भी पीट देने की प्रेरणा देता है.. उसने फिल्में नहीं सपने बेचे एक ऐसे समाज को जो सिर्फ अपने तक क्रेंद्रित था.. उसने बताया कि भोलेपन से भी मक्कारों की इस दुनिया को जीता जा सकता है...



तुषार उप्रेती

गुलामी

आज फिर कुछ ख्याल फेंके हैं शाह ने
दौड़ पड़े हैं सारे गुलाम,
हाथ में कुछ कल-पुर्जे लिए
हर कोई फुर्सत से बीन रहा अपने
हिस्से के ख्याल को....
अपने हाथों से तराशकर ये देंगे
ख्याल को एक नई शक्ल....
कोई मीनार बनाएगा,कोई जहाज़ तो कोई ताजमहल...
और ईनाम में पाएगा दो कटे हाथ...
लेकिन कोई तो होगा जो ख्याली पुलाव बनाकर
खुद की आज़ादी का ख्वाब बुनेगा....



तुषार उप्रेती

उम्मीदें अभी बाकी हैं...

और कोशिशें भी जारी हैं....

हाथ में फिर से क़लम पकड़ने की तैयारी है....



सीने में लावा है..

दिल में अज़ाब (तूफ़ान) है...

उंगलियां अब मुट्ठी हैं...

हर लफ़्ज़ इंक़लाब है...







- पुनीत भारद्वाज

कमाल के कमल


कमल हासन की दशावतारम को अगर अजूबों का पुलिंदा कहा जाय तो कुछ गलत नहीं होगा... दशावतारम के साथ भारतीय सिनेगा में कई चीजें पहली बार होगीं... जैसे पहली बार किसी भारतीय फिल्म का बजट डेढ़ अरब बैठा है इस लिहाज से दशावतारम अब तक की सबसे महंगी भारतीय फिल्म बन गई है... पहली बार एक ही अभिनेता दस अलग अलग किरदारों को एक साथ निभागेगा...दशावतारम के लिए पहली बार पांच एकड़ जमी पर पानी जमा कर सेट तैयार किया गया... पहली बार हेलीकॉप्टर पर चेन्नई के आस पास के इलाकों में इतने करीब से शूटिंग की इजाजत दी गई... अब तक भारत सरकार ने बड़े महानगरों में इस तरह की शूटिंग पर मनाही थी... जब हमने आपको फिल्म के बारे में इतना कुछ बताया है, तो चलिए आपको फिल्म ‘दशावतार’ की कहानी की एक झलक भी दिखला दें। इसकी कहानी एक ऐसे वैज्ञानिक की है, जो वक्त के साथ चलने वाली एक मशीन का अविष्कार करता है, लेकिन कुछ शैतानी ताकतें उसका गलत इस्तेमाल करना चाहती हैं। इसे बचाए जाने की कोशिश में ये मशीन तमिलनाडु में रहने वाली एक बूढ़ी महिला के हाथ लग जाती है। दक्षिण के सुपरस्टार कमल हासन ने फिल्म ‘दशावतारम’ में दस अलग-अलग भूमिकाएं निभाई हैं। इस फिल्म में कमल हासन वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी से लेकर जॉर्ज बुश तक के किरदार में दिखाई पड़ेंगे।  पर जरा सोचिए कि 80 साल की बूढ़ी महिला से लेकर अगर वे चीन की एक मार्शल आर्टिस्ट, वैज्ञानिक और पंजाबी गायक जैसी भूमिका में दिखें तो कितनी दिलचस्प बात होगी। आइए हम आपकी जानकारी में कुछ और इजाफा करते हैं। कलम हासन इस फिल्म में जिन दस किरदारों में दिखेंगे उनके नाम होंगे रंगराजा नांबी, बलराम नायडू, गोविंद रामास्वामी, अवतार सिंह, कृष्णवेणि पट्टी, किश्चियन फ्लेट्ज़र, शिग़्हेन नारहसी, जॉर्ज बुश, विन्सेंट पूवारगन और कैलीफुल्ला खान। फिल्म ‘दशावतारम’ में ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, फंतासी, धार्मिक और अत्याधुनिकत जमाने से जुड़ी घटनाओं को दृश्याने के लिए कला निर्देशन के पहलू पर भी काफी ध्यान दिया गया है। फिल्म के कला निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता समीर चन्दा और थोट्टा ईरानी की मदद भी ली गई है... दिलचस्प बात तो यह है कि इस फिल्म में सूनामी को दर्शाने के लिए 5 एकड़ जमीन पर पानी जमा करके उसे समुद्र का प्रभाव दिया गया। इस खास दृश्य के लिए अमेरिका से एक विशेष टीम ने आकर इस जमे हुए पानी में लहरों का प्रभाव उत्पन्न किया। जरा सोचिए, कि सूनामी के एक दृश्य को फिल्माने के लिए फिल्म ‘दशावतार’ की टीम ने इतनी मेहनत की है, तो फिर पूरे फिल्म के लिए उन्होंने अपनी पूरी कला ही दांव पर लगा दी होगी। इस फिल्म की पटकथा 12वीं शताब्दी के भारत से शुरु होती है, और फिर पहुंचती हैं आज के जमाने में। ‘दशावतारम’ की कहानी के जरुरतों के मुताबिक की फिल्म की शूटिंग कन्याकुमारी, चेन्नई से लेकर मलेशिया, वाशिंगटन, टोक्यो, न्यूयॉर्क, लॉस एजेंल्सि और फ्लोरिडा तक जाकर फिल्माई गई है। इस हफ्ते ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘दशावतारम’ के 1000 प्रिंट जारी किए गये हैं, जो कि दक्षिण भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में एक अनोखी पहल है... भारतीय सिनेमा में ऐसा पहली बार होगा कि एक ही फिल्म 40 देशों में एक साथ रिलीज की जाएगी। फिल्म ‘दशावतारम’ की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मद्रास विश्वविद्यालय, तंजौर विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की विशेष समिति ही नहीं बल्कि तमिलनाडु के पुरातत्वविद विभाग भी फिल्म के लिए शोध पत्र, और ऐतिहासिक तथ्य जुटाने में लगा हुआ है। इसका मकसद है कि फिल्म की कहानी और पटकथा की प्रामाणिकता को बनाए रखना। रावण के दस सिर थे और ‘दशावतारम’ फिल्म में कमल हसन के दस किरदार हैं। हालांकि हिंदी बेल्ट के दर्शकों को अभी दशावतारम के लिए दो हफ्तों का इंतज़ार करना होगा... लेकिन इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि दक्षिण भारत के सिनेमाघरों में रिलीज से पहले ही २० लाख टिकिट बिक चुकी थीं और वहां के सारे हॉल अगले एक महीने के लिए एडवांस बुक हो चुके हैं...
देवेश वशिष््ठ खबरी
9811852336

किरदारों पर दांव



कहते हैं कि कुछ पात्र कभी नहीं मरते... कुछ किरदार दर्शकों के दिलों पर ऐसा अक्स छोड़ जाते हैं जो गुजरते वक्त के साथ धुंधला होने की जगह और गहराता जाता है... फिल्म इंड्रस्ट्री में ऐसे किरदारों को भुनाने का दौर नया नहीं है... हॉलीवुड में तो ये फैशन है ही पर अब बॉलीवुड भी हर हिट किरदार को दोबारा भुनाना चाहता है... नगीना में श्री देवी की नागिन और सपेरे की दुश्मनी दुनिया ने देखी... फिल्म सुपर डुपर हिट रही और श्री देवी की नागिन ऐसा ही न भूलने वाला किरदार बन गई... लेकिन जब श्री देवी नागिन बनकर दोबारा निगाहों के ज़रिये पर्दे पर आईं तो वो दर्शकों के निगाहों में जगह नहीं बना सकीं... ये मिसाल भर है कि हिंदी फिल्म इंड्रस्ट्री में सिक्वल बहुत सफल नहीं रहे हैं... वास्तव में संजय दत्त मुंबई के डॉन बने तो दर्शकों ने उनकी अदाकारी का खूब सराहा... लेकिन वास्तव के सिक्वल हथियार में संजय दत्त के साथ शिल्पा शेट्टी की जोड़ी को खारिज कर दिया... लेकिन सिक्वल फिल्मों के लगातार प्लॉप के बाबजूद दमदार किरदारों का मोह डायरेक्टर नहीं छोड़ पाये... सिक्वल फिल्मों के प्रयोग में सिनेमा के साहूकारों को मोटा मुनाफा दिखाई देता है नहीं तो यशराज फिल्म्स, राकेश रोशन और विधु चोपड़ा जैसे बड़े बैनर सिक्वल पर इतना पैसा नहीं लगाते... लेकिन यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है कि एक हिट फिल्म की सफलता से उसी किरदार पर बनने वाली दूसरी फिल्मों से उम्मीदें बढ़ जाती हैं और इसीलिए सीक्वल बनाने के लिए खास तौर पर तैयारी की जरूरत होती है...निर्माता निर्देशक पर दबाब होता है कि वो पिछली फिल्म से बेहतर फिल्म बनाए क्योंकि लोग सिक्वल फिल्म सिर्फ इसलिए देखने नहीं जाते कि फिल्म बेहतर हो बल्कि लोग उस फिल्म की पुरानी फिल्म से तुलना भी करते हैं... हॉलीवुड के जेम्स बॉण्‍ड की तर्ज पर हो सकता कि संजय दत्त मुन्ना भाई २, ३, ४, और ५ में भी देखने को मिलें... मुन्नाभाई एमबीबीएस के हिट होने के बाद लगे रहो मुन्ना भाई भी जबर्दस्त हिट रही थी... हिट सीक्वल फिल्मों में फिर हेरा फेरी का नाम भी शामिल है जो जबर्दस्त कॉमेडी फिल्म हेरा फेरी की सिक्वल है... एक्शन फिल्मों में धूम के बाद धूम २ आई पर सफल हुई सुपरनेचुरल पावर पर बनी कोई मिल गया की सिक्वल कृष... अब सुनने में आ रहा है कि घायल, नो एंट्री और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों के सिक्वल की भी तैयारी चल रही है... यानी हिट फिल्मों के रीमेक को भले ही दर्शकों ने सिरे से खारिज कर दिया हो पर हिट किरदारों के सिक्वल पर अभी फिल्मकारों का भरोसा बना हुआ है...
देवेश वशिष््ठ खबरी
9811852336

पेन की स्याही, सूखी तो समझ आया...


प्यासा छोड़ कर एक बार फिर थम गई बारिश
और बेचारा संमदर बह गया सब...
रातभर की नींद को गिरवी रखा है...
और दिन की चांदनी को पी गया रब...
फिर मिलेगी तंग छुट्टी घूम आऊंगा...
दूर... बहुत दूर... वहीं पर रह गया सब...
जैसे नुकीली बालियां गेहूं की, सोने की...
टकटकी में ही रहा और कट गया सब...
मां का, पिताजी का, बहनों- दोस्तों का
ना पता ये सारा हिस्सा छंट गया कब...
पेन की स्याही, सूखी तो समझ आया...
स्याह सा एक दौर था... और खप गया सब...
दूर सीसा था... और बीच में बादल
रोशनी जब ना रही तो छंट गया सब...
किताब तूने दी मुझे दर्दों के गीतों की...
तोहफा था पहला इसलिये यूं रट गया सब
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

ये वो सहर तो नहीं...एक थी हॉकी..


अब फिर से सारा देश मुंह फुलाएगा..खिलाड़ियों को कोसेगा..फेडरेशन को गलियाएगा...ध्यानचंद दादा कि याद में टेसुए बहाएगा..इसी बहाने सही पर जनाब लोगों को हॉकी की याद तो आएगी..पता तो चलेगा कि एक खेल है जो राष्ट्रीय होने का दम भरता है..वैसे परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो जानकारों को समझना चाहिए कि झुके हुए कंधों के साथ अपन कब तक ये बोझ सहेंगे..ऐसे में कोई ये सुझाव दे डाले कि इस देश का राष्ट्रीय खेल क्रिकेट होना चाहिए तो अचरज नहीं होगा..क्योंकि यहां का नियम,नीयत और नियति तीनों क्रिकेट है..आप सोचेगें कि अपन भी उसी बेहस के वक्ता हैं जो क्रिकेट बनाम हॉकी पर बोलना पसंद करते हैं..लेकिन हुजूर आप खुद ही सोचिए कि जब किसी चीज़ का खात्मा हो जाए तो परिवर्तन होना लाज़मी है..उदाहरण के लिए मान लीजिए कल को बाघ खत्म हो जाते हैं जो हाशिए पर हैं..कुछ चैनल तो बाघ बचाओ का नारा भी दे बैठे हैं..तब आप क्या करेंगे?क्या तब भी आप बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है कि लकीर पीटते रहेंगे..ऐसे में समझदारी यही है कि सड़कों पर आवारा से घुमने वाले कुत्तों को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए...
इसी तरह हॉकी के खत्म होने से पहले कुछ जुगाड़ करलें तो अच्छा होगा..फजीहत से बचा जा सकेगा..वैसे भी 80साल में पहली बार ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने में नाकाम होने के बाद अपने पास कोई खास ऑप्शन तो बचा नहीं..न ही क्रिकेट की तरह यहां कोई शाहरुख खान पूरी की पूरी टीम की बोली लगाने वाला है..यानी अब इससे बुरा क्या होगा..भले ही खिलाड़ियों को ऐस्ट्रो-टर्फ पर खेलने को न मिले, भले ही अपने पास सपोर्ट स्टॉफ की कमी हो, भले ही अपन हॉकी से ज्यादा खुद की कुर्सी को लेकर चिंतित हों..एक सर्वे बताता है कि भारतीय खिलाड़ी 18-19 साल की उम्र में जब एस्ट्रो टर्फ पर खेलना शुरु करता है..तब तक पोलैंड समेत कई देशों के बच्चे एस्ट्रो-टर्फ पर हज़ार से भी ज्यादा मैच खेल चुके होते हैं..ये हाल सिर्फ हॉकी का ही नहीं है बल्कि अभी कुछ दिनों पहले बैडमिंटन के खिलाड़ियों को शटलकॉक की कमी की वजह से काफी दिक्कतें आई थी..समरेश जंग जैसे हाई लेवल के शूटर को सरकार एक बढ़िया पिस्टल तक मुहैया नहीं कराती.. ऐसे में हॉकी के अलावा बीजिंग ओलंपिक में बाकी खेलों का क्या हाल होगा ये तो हम देखेंगे ही..नहीं देखेंगे तो 8 बार ओलंपिक विजेता भारतीय टीम के जौहर जो हार के बावजूद सुर्खयां तो बटोरती थी..अब जब खेलना ही नहीं है तो खबरों की दुनिया में गुम हो जाने का खतरा बराबर बना रहेगा..कई बार ताज्जुब भी होता है कि एक छोटा सा आर्टिकल चक दे इंडिया जैसी फिल्म का आइडिया दे जाता है..लेकिन इतनी बड़ी हार के बावजूद भी हॉकी फेडरेशन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती..ये वो सहर तो नहीं जिसकी हमने कल्पना कि थी..गिल साहब आप सुन रहे हैं न..वैसे गिल को गाली देना वैसा ही है जैसा अफ्रीका के जंगलों मे अफ्रीकी करते हैं..ये पहले किसी इंसान को बारिश का देवता बनाते हैं..उसे सम्मान देते हैं..और जब बारिश नहीं होती तब उसे राजगद्दी से उतारकर जूते मारते हैं..हम भी तो कुछ ऐसा ही करते हैं..1994 में गिल के आने के बाद से 15 कोच बदले जा चुके हैं..लेकिन हॉकी अब भी हाशिए पर है..गिल को भी भगाकर देख लें..हालात ज्यादा सुधरने वाले नहीं..लेकिन इतना तो तय है कि गिल को अब जाना चाहिए..पहले ही पूर्व खिलाड़ी आईएचएफ को भंग करके एडहॉक कमेटि बनाने की मांग कर चुके हैं..इससे ज्यादा बुरा अब क्या होगा..

तुषार उप्रेती

मुझे कार्नर वाली सीट चाहिए....डोंबिविली फास्ट


हमारे आसपास इतनी गंदगी है कि सच झूठ का फैसला करना बेहद मुश्किल हो गया है..ऐसे में अगर अपनी जिंदगी की जद्दोजेहद से कुछ पल फुर्सत के मिल जाएं तो आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वो अपने नहीं बल्कि एक भीड़ के साथ जी रहा है..जो रोज़ सुबह उसे नींद से जगाती है..उसे खाना खिलाती है..दफ्तर के लिए तैयार करती है..बस या ट्रेन में सफर कराती है औऱ फिर वही भीड़ शाम तक न जाने ऐसे कितनी शख्सियतें निगल जाती हैं.. हम सब रोज़ ऐसे ही जीते हैं..औऱ जीते रहेंगे खासकर तब तक जब तक कि इस रुटीन से अपन चिढ़ न जायें..
कुछ ऐसा ही कहती है निशीकांत कामथ कि फिल्म 'डोंबिविली फास्ट' जिसमें एक आदमी खुद को भीड़ से अलग करने के चक्कर में मारा जाता है..वो भी ऐसे में जब सारी दुनिया गांधीजी के तीन बंदरों जैसी जिंदगी बसर कर रही है...शहर है,भीड़ है, बुराई है पर किसी को न तो वो नज़र आती है, न सुनाई देती है..ऐसे में संदीप कुलकर्णी के सामने इतना कुछ घटता है कि वो खुद को अच्छाई के रास्ते पर चलने से रोक नहीं पाता..ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बुराई के लिबास में जीते जीते कभी कभी इतनी सडन होती है कि आदमी के अंदर की अच्छाई छलांग लगाकर बाहर आना चाहती है..क्योंकि कई बार चुप्पी भी बुराई का सबब होती है.. किसी कवि ने कहीं लिखा है..
हम चुप रहे कि सब चुप हैं
वो चुप रहे कि हम चुप हैं
आओ बात करें उस चुप्पी पर
जिसे लेकर हम इतने समय तक चुप्प रहे..


मैनेजर चाहता है कि माधव आपटे(संदीप कुलकर्णी) कुछ भी ले देकर एक फेक बिल पास करे,माधव कि पत्नी मीडिल क्लास जिंदगी से तंग आ चुकी है, मोहल्ले में पानी सप्लायर पानी देने के पैसे मांगता है,दुकान वाला टैक्स चोरी करने के चक्कर में हर चीज़ एमआरपी से ज्यादा पर बेचता है..ये सारी बातें मिलकर माधव को फरस्ट्रेट करती हैं..नतीजा हिंसा में बदलता है..बंदा एक क्रिकेट का बल्ला लेकर मुंबई को सुधारने निकल पड़ता है.. नतीजा सारे शहर में दहशत फैल जाती है..
पुलिस माधव को पकड़ने में नाकाम रहती है तो उसे मारने पर तुल जाती है..घटनाएं,घटनाएं औऱ घटनाएं..और उन्हें फिल्माने के रोचक अंदाज़ में फिल्म कब खत्म हो जाती है..पता नहीं चलता..माधव आपटे उसी ट्रेन में मारा जाता है जिसमें रोज़ सफर करता था..आफिस जाते वक्त..गोली लगने के बाद वो इंन्सपेक्टर को सिर्फ इतना कहता है कि मुझे कार्नर वाली सीट पर बैठा दो..औऱ खिड़की खोल दो.. क्योंकि वो जिंदगीभर खड़े खड़े ही सफर करता आया है..


तुषार उप्रेती

सफर एक कहानियां तीन....मीनाक्षी..


बतौर चित्रकार एम.एफ हुसैन ने अपनी कूची से कई चित्र बनाए हैं...उन्हें समझना बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी मजदूर की कूची से पुती दिवार में चित्रकारी ढूंढना...लेकिन हुसैन की चित्रकारी की तरह ही उनकी फिल्म मीनाक्षी में भी कुछ बात जरुर है..जो लंबे समय तक फिल्म से बांधे रखती है..रंगों का खेल सिनेमाई कैनवस पर उन्होंने बखूबी किया है..संतोष सीवन ने बतौर सिनेमाटोग्राफर इसमें उनका बखूबी साथ दिया है.. हर दृश्य अपने आप में नई पेंटिंग सा लगता है... हुसैन ने रेगिस्तान से लेकर प्राग तक अपने अनुभव का उम्दा इस्तेमाल किया है.
हर शहर की अपनी दास्तान होती है..जहां किरदार भी लगभग वैसे ही होते हैं..बदलते हैं तो सिर्फ चेहरे..ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि आजकल समस्याएं ग्लोबल हो गई हैं जिसने हर जगह के लोकलाइट को अपनी पकड़ में ले रखा है..जैसे शहर अलग-अलग हैं पर अकेलापन वही है..
इस फिल्म में लेखक रघुवीर यादव से लेकर, मीनाक्षी तब्बू और कार मैकेनिक कुणाल कपूर तक सभी की एक ही समस्या है अकेलापन..लेखक सोचता है कि उसकी कहानी में किरदार अब बासी हो चुके हैं..इसलिए वो एक ऐसी कहानी तलाशता है जिसमें कुछ नयापन हो..मुलाकात होती है इत्र बेचने वाली तब्बू से..जो अपनी जिंदगी को इतना दिलचस्प समझती है कि उसके मुताबिक उसका जीवन लेखक के लिए उपन्यास लिखने का एक सब्जेक्ट हो सकता है..दूसरी तरफ मैकेनिक मियां हैं जो बचपन के थपेड़ों से अब तक उबर नहीं पाये हैं..बनना चाहते थे म्यूज़िशियन औऱ बन गये कार मैकेनिक..
इधर उधर किरदारों की तलाश में भटकते लेखक को लगता है कि अपने आसपास के वातावरण से किरदारों को चुन कर उन्हें कहानी के सांचे में ढालना बेहद मुश्किल है..फिर भी वो नयेपन के लिए ये चुनौती स्वीकार करता है..अंतत: होता ये है कि किरदार लेखक से ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं..और लेखक कि जिंदगी की कहानी लिखने लगते हैं..ये है क्या..समझने में देर लगेगी फिल्म देखिए धन्य हो जाएंगे...





तुषार उप्रेती

दर्द में भी इक मज़ा आने लगा...

ज़ख़्म-ज़ख़्म सर उठाने लगा
अब तो दर्द में भी इक मज़ा आने लगा

बीता कोई लम्हा मुस्कुराने लगा..
अब तो दर्द में भी इक मज़ा ने लगा

उसकी यादों का मौसम फिर से छाने लगा
अब तो दर्द में भी इक मज़ा आने लगा

बे-साया था मैं....मुझको वो अपनाने लगा
अब तो दर्द में भी इक मज़ा आने लगा

मैं बेहोश था..अब मैं होश में आने लगा
अब तो दर्द में भी इक मज़ा आने लगा

ज़ख़्म-ज़ख़्म सर उठाने लगा
अब तो दर्द में भी इक मज़ा आने लगा
अब तो इस दर्द की आदत सी हो गई है
उस हमदर्द की आदत सी हो गई है..

- पुनीत भारद्वाज

सब ऊंगली का खेल है मेरे भाई....



ऊंगली इतनी important होती है इसका पता अपन को काफी दिनों बाद चला..बचपन में नाक औऱ कान में ऊंगली डालने पर टीचर अक्सर डांट पिलाती थी..छी छी छोटा बाबा तुम कितना गंदा है..नाक में ऊंगली डालता है..तब से अपन को लगा कि ऊंगली कुछ ऊल जलूल चीज़ है..लेकिन मीडिया में आये तो पता चला ये ऊंगली बड़े काम की चीज़ है..ये आपके लिए सुदर्शन चक्र साबित हो सकती है..आपके अच्छे-अच्छे दुश्मनों के गले काट सकती है..किसी के भी काम में ऊंगली करो और बन गये आप बॉस फेवरेट..इसलिए ऊंगली करना और ऊंगली को झेलना दोनों सीखिए...सफलता आपके कदम चूमेगी..हां ऊंगली कहां कहां की जाती है..ये आपको सीखना पड़ेगा..



तुषार उप्रेती

शायर औऱ नज़्में


वो जो सपनों को झांकते हुए देखता था
वो जो आसमान की गिरेबान में सरेआम पत्थर फेंकता था
वो शायर अब नहीं रहा,
बची हैं तो बस ये नज़्में....

जो सुकून में बैठी किसी के लबों को
चूम रही हैं,
खुदगर्ज़ हैं साली
जब वो जिंदा था तब उसके दर्द पर
फाहे डालती थी...
अब उसकी गैर-मौजूदगी में सरगोशियां करती हैं...


तुषार उप्रेती

ये तारे सच्चे लगते हैं...




सूरज दिनभर जलता है

रात में चंदा चलता है

साथ में तारे जगते हैं

जग-मग, जग-मग करके ये

कोई इशारा करते हैं

देखो वो तारा टूट गया

वो आसमान से रूठ गया

चुपचाप ही सबकुछ सहते हैं

फिर भी ये ख़ुश रहते हैं

रात में ड्यूटी करते हैं

और दिनभर सोते रहते हैं

पर टाईम से ये उठ जाते हैं

हर रोज़ नहाकर आते हैं

ना ये छुट्टी लेते हैं

और ना ये बंक लगाते हैं.........




- पुनीत भारद्वाज



दूरियां......


















माना के दूर होते हैं...
जब हम पास होते हैं..
और इन फ़ासलों में
भले ही मन उदास होते हैं..




जितने भी दूर हो हम-तुम
तो क्या हुआ ऐ दोस्त...
कुछ एहसास हैं जो
बेहद ख़ास होते हैं...



ये फ़ासलें तो बस नज़र का धोख़ा है....
हरदम तेरे ख़्याल तो मेरे आस-पास होते हैं...







- पुनीत भारद्वाज

जियांशु....


मासूम हंसी, चंचल छवि
घर-आंगन महकता गुलशन
जाने क्यूं, आखिर क्यूं
झटपट से गुज़रता है बचपन
कोई थाम ले डोर,
और रोक ले दौर
क्योंकि फिर ना आएंगे वो दिन
और फिर ना मिलेगा ये बचपन....
(मेरे भतीजे जियांशु और सभी मासूम, नन्हें-मुन्ने बच्चों के लिए )

कुछ ऐब


जीने के लिए एक ऐब पालना चाहिए
कुछ सवालों को सवालों से संभालना चाहिए

कहां-कहां ढूंढेंगे जवाबों को
कुछ वक्त अपने लिए भी निकालना चाहिए

उम्र के हर फासले पर फैसला न करो
कभी कुछ सिक्कों को यूं ही उछालना चाहिए

ऐब न हो तो हौंसला न हारें
कुछ हसीन किस्सों को फिर से खंगालना चाहिए

कभी न कभी तो बदलेगी ये सूखी फिजां
मिट्टी के घरौंदों पर एक छप्पर तो डालना चाहिए..


तुषार उप्रेती

गुस्सा

एक बारीख सी सांस ने अभी अभी
पिया है गर्म सा गुस्सा
नथूनों में एक जलन सी हो रही है
ये सांस भीतर ही भीतर
फुफकार रही है..

चीभ पर गालियों से छाले पड़े हैं
अंदर ही अंदर मैं अपने ज़हर से मर रहा हूं

धड़कनें अब पूछ कर धड़क रही हैं
दिमाग में बसी यादों से खून रिस रहा है
शरीर पर जख्मों से बना एक मिनार तैयार है


एक बारीक सी सांस ने अभी अभी
पिया है गर्म सा गुस्सा....



तुषार उप्रेती

ये फिल्म फ्लॉप क्यों नहीं हुई..जब वी मेट


कुछ दोस्तों ने कहा था कि ये फिल्म मत देखो..बकवास है..इसलिए नहीं देखी थी। लेकिन जब बाज़ार में 39रुपये में वीसीडी आई तो खुद को रोक नहीं पाया।। कब से बेचैनी थी कि आखिर जब वी मेट में ऐसा क्या है जो वो फ्लॉप नहीं हो पाई(जैसा कि सब कह रहे थे कि वो बकवास फिल्म है, शाहिद-करीना का पब्लिसिटी स्टंट है)। इम्तियाज़ अली का बतौर निर्देशक ये दूसरा प्रयास है जो उनकी कलात्मक ईमानदारी की गवाही देता है। गवाही इसलिए की कहानी में एक चोट खाया आशिक है, जो ट्रेन में गीत(करीना) से मिलता है, दोनों का मिलन ही कैसे उनकी किस्मत बदल देता है…ये हज़ारों हिंदी फिल्मों में आप देख चुके हैं। लेकिन पूरी फिल्म में दर्शक बैठ कर दोनों कैरेक्टरर्स के सफर का गवाह बना रहता है।
लोग हमेशा फिल्म खत्म होने के बाद उसके सितारों को याद रखते हैं औऱ ये भूल जाते हैं कि एक्टर हमेशा निर्देशक की कहानी का एक चेहरा होता है। फिल्म का असली बाप उसका स्क्रिप्ट राईटर औऱ डॉयरेक्टर ही होता है। बात सिर्फ इतनी होती है कि कौन सा कलाकार निर्देशक की सोच को कितनी गहराई से जीने का माद्दा रखता है...इस लिहाज से फिल्म में इम्तियाज़ अली यानी निर्देशक हावी है। शाहिद-करीना ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। शाहिद कपूर अगर लटके-झटकों की दुनिया से बाहर निकलने का साहस दिखायें तो दर्शक जल्द ही उनके भीतर एक नया सुपरस्टार देखेंगे....करीना कपूर की खासियत ये है कि वो किसी भी किरदार को अपने व्यक्तित्व
से जोड़कर उसे निभाती हैं। ये ‘चमेली’ में हम देख चुके हैं।
जहां तक संगीत की बात है उसमें ताज़गी है। जैसा कि प्रीतम से उम्मीद की जा सकती थी उन्होंने कर दिखाया है।
‘ये इश्क हाय बैठे बिठाए’ गाने में बजती पहाड़ी लोक-धुनों को आप महसूस कर सकते हैं....
अंतत; इतना ही कि अगर एक बार ये समझना चाहते हैं कि रोमांटिक फिल्म क्या होती है तो जब वी मेट जरुर देखिए। खुद देखिए और फैसला करिए कि ये फिल्म फ्लॉप क्यों नही हुई?


तुषार उप्रेती