अब ख़ुद को ऐसा अंदाज़ तो दे....



अगर तू है कहीं, तो अपने होने का कभी कोई एहसास तो दे....
जो मैं ग़लती कर बैठूं तो मुझे कहीं से आवाज़ तो दे...

जीकर-मरना, मरकर-जीना... ये तो चलता रहता है...
बीच में आकर कभी-कभी तू जीवन को नया रिवाज़ तो दे...

शबद दिए, गीता कही, बाइबल और कुरान भी दी
कितनी इंसानी ज़ुबानों में तूने अपनी ज़ुबान भी दी
तू समझाए...सब समझ जाएं.. अब ख़ुद को ऐसा अंदाज़ तो दे....

- पुनीत बालाजी भारद्वाज

इक लौ जलने दो....


क माटी का दीया सारी रात अंधियारे से लड़ता है...
तू तो ख़ुदा का दिया है, किस बात से डरता है*

इक लौ...
जलने दो...
पलने दो...
दर्द को....

इक लौ....
मचलने दो...
बढ़ने दो...
दर्द को.....

इक लौ...
लड़ती है...
भिड़ती है...
तूफां से अब...

इक लौ...
दहकती है...
वो कहती है...
जहां से अब...

क्यूं...
चुप रहते हो
सब सहते हो...
अब ना सहो
इस दर्द को......

क्यूं...
घर बैठे हो...
घर से निकलो...
अब तो कुचलो
इस दर्द को....


*ऊपर की दो लाइन किसी अंजान शख़्स की हैं...
- पुनीत भारद्वाज


ये दुनिया संभल भी सकती है......




हर रोज़ नज़ारा लगता है
हर शाम किनारा सजता है
कोई प्यार का मारा रोता है
कोई पेट से भूखा हंसता है

वो जेब से खाली है लेकिन
वो दिल का मालिक है लेकिन
पर इससे भी क्या होता है
हर रात वो भूखा सोता है

क्यूं नफ़रत से बर्बाद रहें
चलो प्यार से दिल आबाद करें
हर बंदिश से आज़ाद करें
इस दुनिया को शादाब* करें * हरा-भरा

ये आग भड़क भी सकती है
ये शोला भी बन सकती है
तू एक ज़रा हुंकार तो भर
कोई आंधी भी चल सकती है

कैसे हो, क्यों हो भूलो तुम
हर मुश्क़िल का हल ढूंढों तुम
जो रस्ते में थक जाएगा
तो कैसे मंज़िल पाएगा

अब तो दिल से तूफ़ान उठे
और भीतर का भगवान उठे
ये दुनिया संभल भी सकती है
जो तुझमे छिपा इंसान उठे....





- पुनीत भारद्वाज

ख़्वाहिश


ख़्वाहिशों को पंख लगाऊं
मैं यूं उड़ जाऊं
अंबर की सारी हवा बटोर के लाऊं....

छू लूं छोर गगन का
खोलूं चोर मन का
बादलों की सड़क पे ऐसे दोनों हाथ फैलाऊं
अंबर की सारी हवा बटोर के लाऊं....

एक हाथ में सूरज थामू
एक हाथ में चंदा मामू

आंखों से थामू मैं तारें
झिलमिलाएं मेरे सपने सारे
कोई तारा टूटे मैं जग जाऊं

अंबर की सारी हवा बटोर के लाऊं...

- पुनीत बालाजी भारद्वाज

इक उम्मीद...
























इक उम्मीद पे टिका है सारा जहां
उम्मीद है तो फिर है अंत कहां

उम्मीद है तो नींदों में ख़्वाबों का बसेरा है
उम्मीद के साथ कुछ ढूंढने निकलो तो पूरा संसार तेरा है

ग़र उम्मीद है तो कैसी भी कोई भी हद नहीं
ग़र उम्मीद है तो आसमां से आगे भी सरहद नहीं

उम्मीद पाने से पहले, उम्मीद खोने के बाद भी
उम्मीद हर मुस्कान में, उम्मीद रोने के साथ भी

उम्मीद है तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है
वो होगा नहीं नाउम्मीद कभी जिसे ख़ुद पे यकीं है

इक उम्मीद से हर दिन नया सूरज निकलता है
उम्मीद से धरती घूमती है, रात दिन में बदलता है
और उम्मीद से ही काले-स्याह आसमान में चांद भी आगे चलता है

क्योंकि इक उम्मीद पे टिका है सारा जहां
उम्मीद है तो फिर है अंत कहां

- पुनीत बालाजी भारद्वाज

आगे लगे और धुंआ उठे.....


आग लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे


सांसों से सांसे छू जाए
बातों ही बातों में तूफ़ान चले

आग लगे तो इस तरह लगे.....


मेरी धड़कनें तेरी धड़कनों से टकराए
मेरी धड़कनें तेरी धड़कनें बन जाएँ
जज़्बातों का सिलसिला कुछ इस तरह चले
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे....


मेरी बातों में इतना असर हो
ना तुझे दिन में चैन मिले,
ना रात में बसर हो
लफ़्ज़ होंटों से गिरे और कोई जादू करे
आगे लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे....


वो पल के जिसमें जन्नत नसीब होती है
रूह जिस्मों से निकलकर ख़ुदा के क़रीब होती है
आओ उस एक पल को आबाद करें


आग लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे......



- पुनीत भारद्वाज




कठपुतली...




बिन धागे की कठपुतली हम
दौड़े-भागे, नाचे-गावे....
ऊपर बैठा सबदा रब राखा
डमरू बजावे, खेल दिखावे....

मजमा लगा है, मंच सजा है...
उसने क़रतब में हर रंग रचा है....
कभी उछलता, कभी फुदकता
कभी सोचता, कभी भटकता
कभी है रोता, कभी मटकता
कभी झगड़ता, कभी झिड़कता
इक आवे तो दूजा जावे...
आवे-जावे, जावे-आवे........

ऊपर बैठा सबदा रब राखा
डमरू बजावे, खेल दिखावे.....


- पुनीत भारद्वाज

Why So Serious....



Why so serious...
Lets move on...
Life is mysterious...
Forget it whats gone......

Smooth or Rough...
Hard & Tough...
Or....
If its enough is enough
Just bear a Smile
Bcoz...
Always crying is futile
Live the Life full on....

Why so serious...
Lets move on...


-Puneet Bhardwaj

आसमान



















मुझे नफ़रत है ऊंची-ऊंची इमारतों से....
कम्बख़्त मेरे और मेरे आसमान के बीच आ जाती हैं....

काश ऐसी भी कोई जगह होती....
जहां सिर्फ मैं होता,
इक क्षितिज होता,
बारिश होती, खुली हवाएं होती और दूर तक फैला आसमान होता...

जहां तक मेरी निग़ाहें जाती...
वहां तक जाने का मेरा भी अरमान होता ...

- पुनीत भारद्वाज

Conditions Apply...


क्यूं बस बुत बनके बैठे हो...
क्यूं हाथ में गदा लेके ऐसे ऐंठे हो...
अब तो हिलो...चलो...उसे...मुझे...
पाप का हर निशान.....कुचलो...
अब तो हिलो....अब तो चलो
क्यूं बस बुत बनके ही बैठे हो....





व्रत धरो...गंगा नहाओ....या संग संगत भजन गाओ
सुबह-शाम मंदिर जाओ
या पुजारी जी के मार्फत कनेक्सन बनाओ
चाहे घूस के नाम पर चढ़ावा
श्री चरणों में चढ़ाओ

थोड़ा सा...या पूरी जेब करो ढीली ...
कभी-कभी या...ये शुभ कार्य करो डेली...

कितना जप लो......राम नाम
कोई गारंटी नहीं कि
100 परसेंट बनेंगे आपके काम

नारियल फोड़ लो
साष्टांग करो या हाथ जोड़ लो...

यहां तो हर बार....हर अरज पर....
होती है... conditions apply*...

देर-अंधेर तो पता नहीं माई बाप
इतना पता है कि
भगवान के दफ़्तर में है कोरी अफ़सरशाही....

*Terms & Conditions apply...Please read the documents of Geeta carefully
- पुनीत भारद्वाज

प्यार*


प्यार* के बाज़ार में Sale लगी है...
रिश्ते बिक रहे हैं कौड़ियों में...
एक के साथ एक Free...
Offer लग रहे हैं जोड़ियों में....

प्यार* के ऊपर एक स्टार लगता है भाई
जो किसी-किसी को देता है दिखाई
जिसका मतलब होता है
*Conditions Apply

- पुनीत भारद्वाज

ज़िंदगी के मायने....


ज़िंदगी इक अजब तमाशा है

कभी नीम सी कड़वी

कभी मीठा बताशा है.......



कभी ज़ालिम है, ज़हर है, क़हर है ज़िंदगी

तो कभी इक सुनहरी सहर है ज़िंदगी



होंठों पे दबी हंसी सी है

पलकों में छिपी नमी सी है....

ज़िंदगी कहो तो एक दुआ-सलाम भी है


हिंदु की राम-राम, मियां का असलाम भी है



और कहते हैं ज़िंदगी जीने का नाम भी है

मगर ज़िंदगी वो इक नाम भी है

जिसके संग ज़िंदगी गुज़ार सकें

वो शख़्स भी आपकी ज़िंदगी ही है
जो आपकी ज़िंदगी संवार सके...




- पुनीत भारद्वाज


Iron Lady Promo


जीते-जी अपने शक्ति प्रदर्शन से बढ़ाई देश की शान
अलविदा भी यूं कहा कि शक्ति स्थल कहलाया हिन्दुस्तान
इंदू से इंदिरा बनी... और इंदिरा से आयरन लेडी
- पुनीत भारद्वाज

शुभ दीपावली (प्रोमो)


ख़ुशियों के रॉकेट

मुस्कुराहटों की फुलझड़ी

प्यार का अनार

खिलखिलाहटों की लड़ी


आनंद की आतिशबाज़ी में बनी रहे आपकी खुशहाली

आपके जीवन को इस बार कुछ यूं रोशन करे दीवाली

अंधकार की अमावस में हो उजाले का उल्लास

इस प्रकाश पर्व पर महालक्ष्मी करें आपके घर वास

और सुख-सृमद्धि सदा रहे आपके आस-पास


"शुभ दीपावली"

- पुनीत भारद्वाज




Happy Diwali..


क्या तीज-दीवाली-ईद और होली,
ज़िंदगी तो ऐसे ही चलती है...
खुशी के ये चंद बहानें ही क्यों,
मैं जब-जब हंसता हूं तो दीवाली मनती है....

ख़ुदा क्या, ख़ुदा के सातों दिन क्या
रोटी की तलब तो हर दिन पेट में पलती है
भूख की तासीर वही, पेट की फ़ितरत वही
इसी सोच से सुबह होती है,
इसी फ़्रिक़्र में सांझ ढलती है....


हर धर्म की जात, हर जात की बात
हमाम में सबकी एक सी औकात
मैं हिन्दू, वो मुसलमां...
ग़र लफ़्ज़ बदल दो तो कहां ज़िंदगी बदलती है...

उजालों की दीवाली में खुशी के रॉकेट छोड़ तू
खुशी की उस रोशनी में अपना अक़्स खोज तू
वो अक़्स जो मुस्कुराहट की चांदनी से बना हो
वो अक़्स जो खिलखिलाहट की दीवानगी से बना हो
उससे आंखें मिलाने सीख ले,

ज़िंदगी की घड़ी-दो-घड़ी में हंसना-हंसाना सीख ले..

- पुनीत भारद्वाज

हर दिल में एक रावण ज़िंदा है...

हर साल रावण जल रहा है
और हर साल फिर से ज़िंदा हो जाता है
साल-ओ-साल चल रहे इस सिलसिले में
रावण और ख़ूंखार बनकर लौट आता है
और मर्यादा पुरूषोत्तम राम तो वहीं के वहीं रह गए हैं,
बस मंदिरों में एक मूरत बनकर,
उतने बेजान जितनी निर्जीवता एक पत्थर में होती है
आज राम का वजूद नहीं है
मगर ये सच है
कि आज हर दिल में एक रावण ज़िंदा है...

आओ दशहरा कुछ यूं मनाएं
इस बार अपने भीतर के रावण को जलाएं






-पुनीत भारद्वाज


अब कौन बनाए मंदिर-मस्जिद.....


"मंदिर-मस्जिद कौन बनाए
खड़ा करे कौन सवाल नया
मंदिर-मस्जिद में चैन अभी है
कौन करे बवाल नया"

मगर इक मूरत अपने ख़ुदा की
हमने भी बना के रखी है
जो ज़ालिमों के चंगुल से
बचा के रखी है
ना मंदिर में मेरे प्रभु,
ना मस्जिद में मेरे अल्लाह
वो मूरत तो हमने सीने
में छुपा के रखी है
दिल से लगा के रखी है
ज़ालिमों से बचा के रखी है......
- पुनीत भारद्वाज

ये दिल्ली है.........




ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.....


इस शहर में अब दिल कहां बसते हैं
बस चेहरों की एक भीड़ है
और भीड़ में जिस्म रिसते हैं
दिलवालों का ये शहर अब दिलों को तोड़ता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.......









कई ख़्वाब संजोए थे इन आंखों ने
मगर इस शहर के मंज़र ने वो सब ख़्वाब छीन लिए
बंजर इन आंखों ने टूटे ख़्वाबों के ढेर से
आधे-अधूरे से ख़्वाब फिर से बीन लिए
पहले ख़्वाब दिखाता है, फिर ख़्वाबों को रौंदता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है

जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है...








इक आंचल था जिसे छोड़कर मैं इस शहर की गोद में आया था
किसी के गले से लिपटने के बाद
मैंने इस शहर को गले से लगाया था
मगर जिसे अपना समझा, वो तो धोखा दे गया
अपनो से दूर कर ये शहर एक झूठा सपना दे गया
इक मां-बेटे के रिश्ते को तोड़ता है....




ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है






- पुनीत भारद्वाज

अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......

















ना बाप, ना बेटा
ना बििटया, ना माई
ना किसी का बंधु
ना किसी का भाई

हे रामजी अबके इतना तो कीजो
अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......

ना गिरिजा-गुरुद्वारे
मंदिर, ना मसजिद
ना बुद्ध, ना जैन
मोमिन, ना पंडित
ना वेद-विधि में
ना सबद, ना ज्ञान
ना किसी पुस्तक में
ना गीता, कुरान

हे रामजी अबके इतना तो कीजो
अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......
- पुनीत बालाजी

ये शहर कितना अजीब है...

















अजनबी शामें हैं, अजनबी रातें
अजनबी से किस्सें, अजनबी बातें
पता भी नहीं कुछ, ख़ता भी नहीं कुछ
हमदम है या रक़ीब है
ये शहर कितना अजीब है...

ख़्वाबों की झिलमिल राहें यहां
देखती, चौंकती, काटती निग़ाहें यहां
गले लगाती है या गला घोंटना चाहती है
ना जाने किस मकसद से फैली बाहें यहां

कहीं दौर है तूफ़ानों सा
कहीं दरिया सी रवानी है
भागती, रौंधती, रेंगती ज़िंदगानी है
क्या कहूं.. कहने को दो लब और लंबी सी कहानी है

हर रोज़ सुलाता है
जगाता है,
फिर से सुलाता है
अपनी ऊंगलियों पे नचाता है....
दादागीरी मनवाता है....
फिर भी पता भी नहीं है
और ख़ता भी नहीं है
हमदम है या रक़ीब है...
सच में.. ये शहर कितना अजीब है...

- पुनीत भारद्वाज