
कठपुतली...

Why So Serious....
आसमान
Conditions Apply...


प्यार*
ज़िंदगी के मायने....

कभी नीम सी कड़वी
कभी मीठा बताशा है.......
कभी ज़ालिम है, ज़हर है, क़हर है ज़िंदगी
तो कभी इक सुनहरी सहर है ज़िंदगी
होंठों पे दबी हंसी सी है
पलकों में छिपी नमी सी है....
ज़िंदगी कहो तो एक दुआ-सलाम भी है
हिंदु की राम-राम, मियां का असलाम भी है
और कहते हैं ज़िंदगी जीने का नाम भी है
मगर ज़िंदगी वो इक नाम भी है
जिसके संग ज़िंदगी गुज़ार सकें
वो शख़्स भी आपकी ज़िंदगी ही है
Iron Lady Promo
शुभ दीपावली (प्रोमो)
ख़ुशियों के रॉकेट
मुस्कुराहटों की फुलझड़ी
प्यार का अनार
खिलखिलाहटों की लड़ी
आनंद की आतिशबाज़ी में बनी रहे आपकी खुशहाली
आपके जीवन को इस बार कुछ यूं रोशन करे दीवाली
अंधकार की अमावस में हो उजाले का उल्लास
इस प्रकाश पर्व पर महालक्ष्मी करें आपके घर वास
और सुख-सृमद्धि सदा रहे आपके आस-पास
"शुभ दीपावली"
- पुनीत भारद्वाज
Happy Diwali..

हर धर्म की जात, हर जात की बात
उजालों की दीवाली में खुशी के रॉकेट छोड़ तू
खुशी की उस रोशनी में अपना अक़्स खोज तू
वो अक़्स जो मुस्कुराहट की चांदनी से बना हो
वो अक़्स जो खिलखिलाहट की दीवानगी से बना हो
उससे आंखें मिलाने सीख ले,ज़िंदगी की घड़ी-दो-घड़ी में हंसना-हंसाना सीख ले..
हर दिल में एक रावण ज़िंदा है...

साल-ओ-साल चल रहे इस सिलसिले में
रावण और ख़ूंखार बनकर लौट आता है
और मर्यादा पुरूषोत्तम राम तो वहीं के वहीं रह गए हैं,
बस मंदिरों में एक मूरत बनकर,
उतने बेजान जितनी निर्जीवता एक पत्थर में होती है
आज राम का वजूद नहीं है
मगर ये सच है
कि आज हर दिल में एक रावण ज़िंदा है...
आओ दशहरा कुछ यूं मनाएंइस बार अपने भीतर के रावण को जलाएं
अब कौन बनाए मंदिर-मस्जिद.....

"मंदिर-मस्जिद कौन बनाए
खड़ा करे कौन सवाल नया
मंदिर-मस्जिद में चैन अभी है
कौन करे बवाल नया"
मगर इक मूरत अपने ख़ुदा कीहमने भी बना के रखी हैजो ज़ालिमों के चंगुल सेबचा के रखी हैना मंदिर में मेरे प्रभु,ना मस्जिद में मेरे अल्लाहवो मूरत तो हमने सीने
में छुपा के रखी हैदिल से लगा के रखी हैज़ालिमों से बचा के रखी है......
ये दिल्ली है.........

ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.....
इस शहर में अब दिल कहां बसते हैं
बस चेहरों की एक भीड़ है
दिलवालों का ये शहर अब दिलों को तोड़ता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.......

कई ख़्वाब संजोए थे इन आंखों ने
मगर इस शहर के मंज़र ने वो सब ख़्वाब छीन लिए
बंजर इन आंखों ने टूटे ख़्वाबों के ढेर से
आधे-अधूरे से ख़्वाब फिर से बीन लिए
पहले ख़्वाब दिखाता है, फिर ख़्वाबों को रौंदता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है...

इक आंचल था जिसे छोड़कर मैं इस शहर की गोद में आया था
किसी के गले से लिपटने के बाद
मैंने इस शहर को गले से लगाया था
मगर जिसे अपना समझा, वो तो धोखा दे गया
अपनो से दूर कर ये शहर एक झूठा सपना दे गया
इक मां-बेटे के रिश्ते को तोड़ता है....
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है
अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......

ना किसी का बंधु
ना किसी का भाई
हे रामजी अबके इतना तो कीजो
अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......
ना गिरिजा-गुरुद्वारे
मंदिर, ना मसजिद
ना बुद्ध, ना जैन
मोमिन, ना पंडित
ना वेद-विधि में
ना सबद, ना ज्ञान
ना किसी पुस्तक में
ना गीता, कुरान
हे रामजी अबके इतना तो कीजो
अबके कभी मोहे जनम ना दीजो......
ये शहर कितना अजीब है...

इक पगली लड़की के बिन...

तू बस नज़र के सामने रहे...

ख़्वाब...

हर रंग में उमंग है.... होली प्रोमो
हर रंग में उमंग है
हर रंग में तरंग है
रंगों भरी होली में..
हर तरफ़ हुड़दंग है
और जब इस हुड़दंग में
मिल जाए दिलों की मस्ती
तब भूलकर हर गिले-शिक़वे
रंगों में डूब जाए हर हस्ती..
आओ बिखेरे प्यार के रंग
मनाए होली इक-दूजे के संग...
- पुनीत भारद्वाज
मुआं कहीं का...
ख़ामोशी..


