बनना ही पड़ेगा सरपंच...



कई बार प्यादे से शतरंज जीत लिया जाता है... प्यादा आठ खाने फलांगता है और सरपंच बन जाता है... केवल प्यादा ही सरपंच बन सकता है... घोड़ा, वज़ीर, ऊंट, हाथी... ताकतवर सरपंच नहीं बन पाता... वो जो होता है वही रहता है... प्यादा धीरे धीरे दौड़ता है... कदम कदम चलता है.... और इसीलिए सबसे ज्यादा ख़तरा उसी को रहता है... जिसे देखो बेचारे गरीब को मारने की जुगत भिड़ाता है... उसके मरने का ज्यादा ग़म तो मालिक को भी नहीं होता... बाकी को बचाने को प्यादा शहीद कर दिया जाता है... तेज़ का जमाना है... टूट पड़ने का ज़माना है... घोड़ा बचाना है, प्यादा तो अड़ाना ही पड़ता है... ऊंट बचाना ज़रूरी है, और प्यादे का काम ही है... घर के हाथी के लिये शहादत देना... वैसे उसकी शहादत का ज्यादा मोल नहीं होता... प्यादे की ओर ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं होती... वो सरकता रहता है... आठ घरों तक... बस आठ घरों तक... फिर प्यादा शेर हो जाता है... वज़ीर बन जाता है... प्यादे को सब मारते हैं वो किसी को सीधे नहीं मार सकता... इसलिए तिरछा मारता है... प्यादा मज़बूर है... आठवें घर तक पहुंचना है... फिर प्यादा बड़े काम का हो जाता है... प्यादे का अहोदा बढ जाता है...वो राजा को बचाने लगता है... अकेले दम पर खेल जीत लेता है... प्यादा हमेशा फ़ायदेमंद होता है... प्यादा होता है तो वज़ीरों को बचाता है... वज़ीर बन गया तो राजा को... प्यादा सस्ता होता है... उसके लिये ज्यादा नहीं खर्चना पड़ता... उसे जाने पर शोर नहीं मचता... उसे चिल्ला चिल्ला कर अपनी कीमत बताने का अधिकार नहीं होता... प्यादे को घिसना पड़ता है... उसे आठ खाने लांघने होते हैं... प्यादे को अपनी कीमत बतानी नहीं दिखानी होती है... वज़ीर बनके... सरपंच बनके... शतरंज की बिसात बिछी है... लगता है अब बनना ही पड़ेगा सरपंच...।

यादों के झरोखे से...


संगीत की दुनिया में किशोर दा एक ऐसे नाम हैं...जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने वक्त को आवाज़ दी। आभास कुमार गांगुली यानी किशोर कुमार के गले की दुनिया आज भी कायल है...आज यानि 13 अक्टूबर 1987 के दिन इस फनकार ने दुनिया से विदाई ली थी...


नटखट चुलबुले और बदमाश कुछ ऐसे ही थे अपने किशोर दा। जिन्होंने कभी अपनी एक्टिंग से मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाई तो कभी अपनी आवाज़ के जादू से सबको अपना दिवाना बना लिया।
सही मायनों में अगर कहें तो किशोर कुमार की आवाज़ ने हर दशक में किसी मासूम से चेहरे को राजेश खन्ना बना दिया। उन्हें चिंगारियों से अपने लिये आग जलाना सिखाया। तो दूसरी तरफ नौजवानों को बताया कि प्यार दिवाना होता है,मस्ताना होता है।वहीं किसी नौजवान को उन्होनें समाज की ऊंच-नीच भरी रस्मों को न मानने के लिये मनाया। दरअसल किशोर कुमार की खासियत ही ये थी कि उनकी आवाज़ में हर मौसम को बयां करने की ताकत थी। फिर चाहे वो प्यार की खामोशी हो, या फिर हसीनों के दिवानेपन में झूमता जमाना।
आज भले ही वो हमारे बीच न हों पर उन जैसे मुकद्दर के सिकंदर की वो आवाज़ आज भी कानों में गूंजती सी है।

तुषार उप्रेती

अपने-अपने हिस्से का आसमान..saregamapa




कुछ वक्त पहले तक न जाने ये शख्स देश के किस कोने में रहता था लेकिन अब इसे सारा देश जानता है।मशहूर रियेलिटी टीवी शो सारेगामापा में पश्चिम बंगाल के औनीक धर की प्रतिभा ने उन्हें 2007 का विजेता बनवा दिया। इतना ही नहीं बल्कि इस टैलेंट हंट शो में उनके साथ मुकाबला करने वाले कई प्रतियोगियों ने भी अपने अपने हिस्से की शोहरत कमा ली है।
कुछ नाम जो कुछ समय पहले तक गुमनामी के अंधेरे में जी रहे थे। महज़ एक मंच पर आने के बाद रातों रात लोगों की जुबां पर आ गये । यानि अगर कहें कि प्रतिभा को सही वक्त पर मौका दिया जाए तो हर कोई अपने हिस्से का आसमान खोज लेता है। लेकिन प्रतियोगिता में भावनाएं अपनी जगह हैं और फैसले के अपने मायने। इसलिए सारेगामापा में हर कोई अपने हिस्से की शोहरत कमाता गया और अपनी अपनी प्रतिभा का परचम लहराता गया। हांलाकि रेस में एक का जीतना और दूसरे का हारना तय होता है फिर भी ऑनिक धर ने तकरीबन 3करोड़ 65 लाख वोट के साथ जीत का सेहरा अपने सिर बांध लिया। इसके साथ ही उन्हें 50 लाख का यूनिवर्सल का कांट्रेक्ट और शेर्वले कार दिया जाना उनके आगे के सफर को थोड़ा आसान जरुर बना देगा। दूसरी ओर हैं वो लोग जो कॉम्पिटिशन की रेस में भले ही पीछे छूट गये हों पर जिंदगी की रेस में अभी उनके पास कई मौके बचे हैं। क्योंकि वैसे भी किसी ने ठीक कहा है कि जिंदगी का असली मज़ा उसके सफर में है मंजिल की खामोशी में नहीं। कुछ नाम जो कुछ समय पहले तक गुमनामी के अंधेरे में जी रहे थे। महज़ एक मंच पर आने के बाद रातों रात लोगों की जुबां पर आ गये । यानि अगर कहें कि प्रतिभा को सही वक्त पर मौका दिया जाए तो हर कोई अपने हिस्से का आसमान खोज लेता है। लेकिन प्रतियोगिता में भावनाएं अपनी जगह हैं और फैसले के अपने मायने। इसलिए सारेगामापा में हर कोई अपने हिस्से की शोहरत कमाता गया और अपनी अपनी प्रतिभा का परचम लहराता गया। हांलाकि रेस में एक का जीतना और दूसरे का हारना तय होता है फिर भी ऑनिक धर ने तकरीबन 3करोड़ 65 लाख वोट के साथ जीत का सेहरा अपने सिर बांध लिया। इसके साथ ही उन्हें 50 लाख का यूनिवर्सल का कांट्रेक्ट और शेर्वले कार दिया जाना उनके आगे के सफर को थोड़ा आसान जरुर बना देगा। दूसरी ओर हैं वो लोग जो कॉम्पिटिशन की रेस में भले ही पीछे छूट गये हों पर जिंदगी की रेस में अभी उनके पास कई मौके बचे हैं। क्योंकि वैसे भी किसी ने ठीक कहा है कि जिंदगी का असली मज़ा उसके सफर में है मंजिल की खामोशी में नहीं।
तुषार उप्रेती

आज सुबह....


कुछ मटमैले से ख्वाब
आज सुबह लम्हों से टकरा गये
ठीक उसी पल तुम याद आ गये ,
ख्वाब जो कभी गंगा नहाया करते थे,
ख्वाब जो कभी तुम्हारे नाम की डुबकी लगाया करते थे।


आज सुबह , हां आज सुबह
लम्हों ने राहों मे रोक लिया उन्हें
घर की दहलीज़ लांघने पर मां ने टोक दिया उन्हें,


वो आज भी लड़ते हैं मुझसे
तुम्हारा नाम ले लेकर आ जुड़ते हैं मुझसे,
मैं फिर भी अनसुनी करता हूं उनकी पुकार
फिर भी तहे-दिल- से हूं उनका शुक्रगुज़ार


लेकिन आज , सुबह हां आज सुबह

पगड़ड़ियों पर खेलते हुए लम्हों ने देख लिया उन्हें ,
तब से सारे शहर में शोर मचा है
शहर की इस भीड़ में खुश रहकर भला कौन बचा है।

लेकिन आज सुबह, हां आज सुबह
मेरे कमरे में फटी कमीज़ लिये एक ख्वाब खड़ा था,
बेशक ये इस शहर से लड़ मरा था।

तब से शहर में कर्फू लगा है
शहर सोया है
खवाब जगा है


-तुषार उप्रेती

कुछ ख्व़ाब...


कुछ ख्वाब जो कल रात तुम्हारे
सिरहाने बैठ कर तुम्हें चूम रहे थे
आज सुबह से लापता हैं।
कोई कहता है उन्हें तुम्हारे हुस्न के
जादू ने डस लिया है।


कोई कहता है उन्हें तुम्हारी

बाहों ने कस लिया है।
कब खोलोगी तुम ये बाहें
ताकि सासें ले सकें ये ख्वाब,


ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे बालों के

तुम्हारे जिस्म को चूमने पर

सांस लेता है सारा ज़माना,
हर किसी के दिल में

तुम्हारे लिये बसा है एक अफ़साना


फिर भी हर कोई ख्वाब देखता है

तुम्हारी मुस्कुराहट का,
और

ख्वाब हैं जो कमबख्त

तुम्हारे इशारों पर मुस्कुरा रहे हैं।
-तुषार उप्रेती

बोल ना हल्के-हल्के... GULZAR

Song- बोल ना हल्के-हल्के..
Lyricist- गुलज़ार
Singer- राहत फ़तेह अली ख़ान, महालक्ष्मी अय्यर
Music- शंकर-एहसान-लॉय

Film- झूम बराबर झूम

ये गाना सुनने के लिए यहां क्लिक करें...

धागे तोड़ लाओ चांदनी से नूर के
घूंघट ही बनालो रोशनी से नूर के
शरमा गई तो आगोश में लो
हो सांसों से उलझी रहे मेरी सांसे

बोल ना हल्के-हल्के
बोल ना हल्के-हल्के
होंठ से हल्के-हल्के
बोल ना हल्के.....

आ नींद का सौदा करें
इक ख़्वाब दें इक ख़्वाब लें
इक ख्वाब तो आंखों में है
इक चांद के तकिए तले
कितने दिनों से ये आसमां भी
सोया नहीं है
इसको सुला दें...

बोल ना हल्के-हल्के
होंठ से हल्के-हल्के...

उम्रें लगीं कहते हुए
दो लफ़्ज़ थे इक बात थी
वो इक दिन सौ साल का
सौ साल की वो रात थी
कैसा लगे जो चुपचाप दोनों
हो..पल-पल में पूरी सदियां बीता दें

बोल ना हल्के-हल्के
होंठ से हल्के-हल्के...

धागे तोड़ लाओ चांदनी से नूर के
घूंघट ही बनालो रोशनी से नूर के
शरमा गई तो आगोश में लो
हो सांसों से उलझी रहे मेरी सांसे

बोल ना हल्के-हल्के
बोल ना हल्के-हल्के
होंठ से हल्के-हल्के
बोल ना हल्के.....


चक दे इंडिया... JAIDEEP SAHNI

Song- चक दे इंडिया..
Lyricist- जयदीप साहनी
Singer- सुखविंदर सिंह, सलीम मर्चेंट,
मैरिएन-डी क्रूज़
Music- सलीम-सुलेमान
Film- चक दे इंडिया
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कुछ करिए
कुछ करिए
नस-नस मेरी ख़ौले..
होए कुछ करिए



कुछ करिए
कुछ करिए
बस-बस बड़ा बोले..
अब कुछ करिए



हो.. कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डबे, करिए या मरिए
हे.. कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डूबे, करिए या मरिए



चक दे..
हो चक दे इंडिया
चक दे..
हो चक दे इंडिया

nowhere to run nowhere to hide

this is the time to do it now

गूंजों में गलियों में
रातों में फलियों में
महलों में बीजों में
ईदों में तीजों में
रेतों के दानों में
फ़िल्मों के गानों में
सड़कों के गड्डों में
बातों के अड्डों में



हुंकारा आज भर लें
दस-बारह बार कर लें
रहना ना यार पीछे
कितना भी कोई खींचे
टस है ना
मस है जी
ज़िद है तो
ज़िद है जी
पिसना यूं ही
पिसना यूं ही
बस करिए...



कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डूबे, करिए या मरिए
हे.. कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डूबे, करिए या मरिए



चक दे..
हो चक दे इंडिया
चक दे..
हो चक दे इंडिया



nowhere to run nowhere to hide
this is the time to do it now

लड़ती पंतगों में
भिड़ती उमंगों में
खेलों के मेलों में
बलखाती रेलों में
गानों के मीठे में
फक्कड़ में चींटें में
ढूढों तो मिल जाए
पत्ता वही जो मैं
रंग ऐसा आज निखरे
और खुल के आज बिखरे
मान गए ऐसी बोली
रग-रग में जल के बोली
टस है ना
मस है जी
ज़िद है तो
ज़िद है जी
पिसना यूं ही
पिसना यूं ही
पिसना यूं ही
बस करिए...



कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डूबे, करिए या मरिए
हे.. कोई तो चल ज़िद फ़ड़िए
डूबे, करिए या मरिए



चक दे..
हो चक दे इंडिया
चक दे..
हो चक दे इंडिया

जब भी सिगरेट जलती है.. GULZAR

Song- जब भी सिगरेट जलती है
Lyricist- गुलज़ार
Singer- अदनान सामी
Music- विशाल भारद्वाज
Film- नो स्मोकिंग
ये गाना सुनने के लिए यहां क्लिक करें..

hey!! i wana tell u abt this thing
this stick call da cigratte yeah hhh

हुमम फिर तलब-तलब है तलब-तलब
बेसबब-बेसबब फिर तलब है तलब


शाम होने लगी है
शाम होने लगी
लाल होने लगी है
लाल होने लगी


जब भी सिगरेट जलती है
मैं जलता हूं
आग पे पांव पड़ता है
कम्बख़्त धुंए में चलता हूं....


जब भी सिगरेट जलती है
मैं जलता हूं


फिर किसी ने जलाई एक दियासलाई-2
आसमां जल उठा है
शाम ने राख उड़ाई
उबले जैसा सुलगता हूं
कम्बख़्त धुएं में जलता हूं...

लंबे धागे धुंए के -2
सांस सिलने लगी हैं
प्यास उधड़ी हुई है
होंठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है
शाम होने लगी
लाल होने लगी है
लाल होने लगी


हर बार धुंआ जो निगलता हूं
कम्बख़्त धुंए में चलता हूं
जब भी सिगरेट जलती है
मैं जलता हूं
आग पे पांव पड़ते हैं
कम्बख़्त धुंए पे चलता हूं


जब भी सिगरेट जलती है
मैं जलता हूं

ख़ूंख़ार ज़िंदगी...


ज़िंदगी इक दौड़ है...

आगे हिरण है,

पीछे शेर है,

जीने की

और जीने ना देने की

इक मुसलसल (लगातार) होड़ है

ज़िंदगी इक दौड़ है....



शेर भूखा है,

वहशी है,

दरिंदा है;

हिरण को खाना चाहता है

और वो हिरण तो बस जीना चाहता है



इक शेर है,

इक हिरण है,

इक होड़ है,

ज़िंदगी इक ख़ूंख़ार दौड़ है....
- पुनीत भारद्वाज

ऑपरेशन थ्री स्टार–एक करारा तमाचा



अरविंद गौड के निर्देशन में काफी पहले एक नाटक देखा था नाम ठीक से याद नहीं। लेकिन अपनी उस भूल को जल्द ही मैंने ऑपरेशन थ्री स्टार देख कर मिटा लिया। वैसे ये नाटक Dario fo के An accidental death of an anarchist का हिंदी adaptation है। जिसके लिये अमिताभ श्रीवास्तव का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए। लेकिन नाटक में असली औकात तो निर्देशक की नज़र आती है। जिन्होंने हास्य व्यंग्य के तालमेल से इस नाटक को ज्यादा प्रासंगिक बना दिया है।
इंडिया हैबिटैट सेंटर में अस्मिता (अरविंद गौड़ का ग्रुप) सोसाइटी की ओर से इस नाटक में crimes of the state की मंशा का पर्दाफाश किया गया है। यानि जब राज्य अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है तो हालात कैसे बेकाबू हो जाते हैं।
खैर नाटक में ज्यादा दृश्य परिवर्तनों की गुंजाइश नहीं थी और न ही ज्यादा ढ़ोल नगाड़े के तमाशे की जिसे निर्देशक ने बखूबी समझा है। तभी तो पीयूष मिश्रा के गानों को सही जगह पर इस्तेमाल किया गया है। जहां तक मंच सज्जा की बात की जाये तो वो और बेहतर हो सकती थी लेकिन हमें थियेटर की सीमाओं को समझना होगा। जहां बिना प्रायोजकों के नाटक खेलकर जिंदगी बसर करना खासा जोखिम भरा काम होता है।
नाटक में कहानी सिर्फ इतनी है कि एक आतंकवादी पुलिस हैडक्वार्टर की बिल्डिंग से कूद कर आत्महत्या कर लेता है और उसके बाद कैसे एक पागल ये साबित करता है कि ये किस कदर पुलसिया ढ़ोग है। वो आतंकवादी नहीं बल्कि एक रेलवे कर्मचारी था,जिसे झूठे इल्ज़ाम में फंसाकर फाईल बंद करने का समाधान तलाशा जा रहा था। लेकिन नाटक की असली ताकत उसके एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़ में होती है (कम से कम इस नाटक की तो) । दिलचस्प पहलुओं की अगर बात करें तो इस पूरे घटनाक्रम को मंचित करते समय निर्देशक ने जैसे न्याय-व्यवस्था से लेकर उमा खुराना तक के प्रकरण को सामने रखा है। वह पल भर के मनोरंजन के साथ सारे तंत्र की बखूबी धज्जियां उड़ाता है। दरअसल आज व्यांगयकार के सामने जो सबसे बड़ी समस्या ‘नंगों के कपड़े उतारने’ की है।उसे निर्देशक ने समझते हुए दर्शकों की नब्ज़ को पकड़े रखा है। पागल के किरदार में संदीप श्रीवास्तव ने प्रभावित किया। जहां तक अंत की बात है इसमें भी निर्देशक की दूरदर्शिता दिखाई दी। दो अंत देकर निर्देशक ने बहस की संभावनाओं के मुंह पर भी करारा तमाचा दे मारा है। इसलिये आलोचक गुर्राते रहेंगे। रसिया लोग मज़ा ले सकते हैं।

-तुषार उप्रेती

चेहरे....


शहर की इस भीड़ में ढूंढ़ता हूं एक चेहरा
और

चेहरों की इस भीड़ में हर चेहरा
इश्तेहार लगता है
जहां चेहरे इश्तेहार हो गये

वहां रिश्ते बाज़ार हो गये
लोग घरों की तलाश में क्यों भटकते हैं यहां ?

यहां जेबें भरी हैं लोग बेरोज़गार हो गये
मैं फिर भी तसल्ली से जी रहा था

इस उम्मीद में कि होगी सहर
पर ना जाने कब इस भीड़ में

हम भी होशियार हो गये।

तुषार उप्रेती

दिल दोस्ती के अलावा कुछ एक्सेक्ट्रा

हुआ यूं कि घूमते घामते हम तीनों दोस्तों ने सिगरेट के सुट्टों के बाद अचानक ये प्लैन बना लिया कि दिल दोस्ती और एक्सेक्ट्रा देख ली जाए। मेरे अलावा किसी को भी फिल्म में दिलचस्पी नहीं थी। मेरी दिलचस्पी का निजी कारण था। ये फिल्म मेरे ही कॉलेज में शूट की गई है। खैर पहली नज़र में फिल्म बंडल ,बोगस और बेफिजूल जान पड़ी। लेकिन धीरे धीरे इसने हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण की पोल खोलनी शुरु की तो अचंभा हुआ। इस फिल्म में निर्देशक से लेकर किरदार तक हर कोई एक कनफ्यूजन में जी रहा है। इमाद शाह जो फिल्म में अपूर्व का किरदार निभा रहे हैं वो फिल्म के सूत्रधार हैं। जिनकी पंचलाईन है WHEN YOU ARE YOUNG YOU BELIEVE POSSIBILITIES ARE ENDLESS. ठीक इसी तरह अपूर्व जीवन की गुत्थियों को सुलझा रहा है,परेशानी है तो बस इतनी कि उसके सामने SEX जीवन की सबसे बड़ी उलझन है। सही मायनों मे कहें तो साला ठरकी है। या फिर जहां मिले दो, वहीं गये सो। उसका ये रास्ता दिल्ली की जीबी रोड़ से लेकर एक वर्जिन स्कूली लड़की के बिस्तर तक ले जाता है। और आखिर में वो अपने दोस्त की गर्लफ्रेंड़(निकिता आनंद) के साथ भी सोता है। जिसकी भनक उसके दोस्त संजय मिश्रा (श्रेयस तलपड़े) को लग जाती है । जो कॉलेज प्रेसिडेंट बनने के चक्कर में अपनी गर्लफ्रेंड़ से कुछ दूर सा हो चुका है। फिल्म के आखिर में श्रेयस का चीखपुकार मचाना कुछ अजीब लगता है। शायद इसलिए कि फिल्म का सूत्रधार इमाद है। निर्देशक मनीश तिवारी दरअसल यहीं पर थोड़ा चूक गये हैं। फिल्म में सबसे ज्यादा जो चीज़ अखरती है तो वो है इसका बैकग्रांउड स्कोर। फिर भी निर्देशक जो प्रूव कर पाये वो ये कि ये दो अलग किस्म के हिंदुस्तानियों की कहानी है।
-तुषार उप्रेती

नीली आसमानी छतरी...ब्लू अंब्रेला

गैंगस्टरों के जीवन पर फिल्म बनाना , हॉकी क्रिकेट पर फिल्म बनाना या फिर लव स्टोरी को कैमरे से गूंथना मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री को बखूबी आता है। लेकिन एक छतरी जैसी बेहद साधारण चीज़ को केंद्र में रखकर एक मनोरंजक फिल्म बनाने के लिये सबसे पहले तो जिगरा चाहिये। फिर अगर फिल्म बच्चों के कोमल मन की भावनाओं को उकेरती हो तो ये बाढ़ में कागज़ की कश्ती तैराने जैसा होगा। इसलिए सबसे पहले तो विशाल भारद्वाज के हौंसले की तारीफ करनी होगी जिनकी विषय की बारिक समझ ने न सिर्फ जोखिम उठाया बल्कि एक उम्दा फिल्म भी बनाई। वैसे कैमरे के काव्यलोक में समाने के लिये तो रस्किन बांड ने अपनी कहानी में पहले ही काफी गुंजाइश छोड़ रखी थी। जिसका फायदा विशाल को सीधा मिला । लेकिन उसे भारतीयता के जामे में कैसे पिरोया जा सकता है ये कोई विशाल से सीखे। खैर ब्लू अंब्रेला साहित्य को कैमरे में उतारने की तमाम संभावनाओं के साथ फिल्माई गई है। बशर्ते आप उसे एक रसिया की दृष्टि से देखें न कि समीक्षक की। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाके में छोटी हसरतों के साथ जीता जागता एक बड़ा गांव। यहां ये समझना बेहद मुश्किल है कि बड़े यहां बच्चे हैं या बच्चे अपनी तमाम शरारतों के बावजूद बड़े हो चुके हैं। कम से कम ब्लू अंब्रेला देखकर तो यही लगा। जहां एक सौ चौंसठ रुपयों की एवज में गांव की एक मात्र परचून की दुकान का मालिक खतरी बच्चे की दूरबीन मार लेता है। तो वहीं फिल्म के अंत में बिनिया(श्रेया शर्मा) का खतरी(पंकज कपूर) को अपनी छतरी देना बच्चों के संवेदनशील मन की ओर सीधा इशारा है। खैर फिल्म में इसके अलावा भी बहुत सी दिलचस्प गुस्ताखियां हैं जो कुछ पल के लिये ही सही पर दर्शक को गुदगुदाती हैं और पहाड़ी जीवन पर उसकी समझ की गुत्थियों को सुलझाती हैं। जैसे पहाड़ों पर जीविका कमाने के लिये पर्यटन का होना आम बात है लेकिन उस पर्यटन को किसी खास दुकान तक खींच कर लाना एक बिज़नेस माइंड है। जिसमें दुकानदार और हाईवे से गुजरने वाली बसों के कंडक्टर बराबर के भागीदार हैं।
खैर फिल्म में जैसे दृश्यों को फिल्माया गया है वो प्रकृति कैमरे में कैद करने का नया व्याकरण रच गया है। रही बात अभिनय की तो पंकज कपूर की प्रतिभा को परखने के लिये आज तक कोई यंत्र बना ही नहीं। पहले चालाक दुकानदार और बाद में गांव द्वारा बहिष्कृत होने के किरदार को उन्होंने बखूबी जिया है। बाल कलाकार के रुप में श्रेया शर्मा में अभिनय की असीम संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं। गुलज़ार को तो वैसे भी चड्डी पहन के फूल खिला है लिखने की वजह से बच्चों की नब्ज़ पकड़नी आती है इसलिये इस फिल्म में भी गाने काफी अच्छे हैं। जो मस्ती और चुलबुलेपन को बरकरार रखते हैं। खैर फिर भी जो लोग ये कहते हैं कि भारत में बच्चों के लिये फिल्में नहीं बनती है उन्हें इस फिल्म के सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने से जलन हो सकती है।


- तुषार उप्रेती

सईंया-सईंया....(कैलाश खेर) KAILASH KHER

Song- सईंया-सईंया..
Lyricist- कैलाश खेर
Singer- कैलाश खेर
Music- कैलासा बैंड (कैलाश-परेश-नरेश)
Album- झूमो रे..
बहुत कम लोग जानते हैं कि कैलाश खेर गाने भी लिखते हैं। कैलाश के पास केवल जादूई आवाज़ ही नहीं है वो रूहानी कलम के भी फ़नकार है। उन्होंने अपनी पहली एलबम 'कैलासा' के लिए भी लिखा है और उनकी नई एलबम 'झूमो रे..' में भी उनके गाए गीत, उन्ही के लिखे हुए हैं। आपको उनका एक ख़ूबसूरत गाना तो याद ही होगा- 'तेरे नाम से जी लूं, तेरे नाम से मर जाउँ'

आपके लिए पेश है कैलाश खेर का लिखा और उन्हीं का गाया एक गाना...

ये गाना सुनने के लिए आप यहां क्लिक करें।



"हीरे-मोती मैं ना चाहूं, मैं तो चाहूं संगम तेरा..
मैं तो मेरी सईंया तू है मेरा..

तू जो छू ले प्यार से आराम से मर जाऊं,
आजा चंदा बाहों में
तुझ में ग़ुम हो जाऊं
मैं तेरे नाम में खो जाऊँ
सईंया... सईंया..

मेरे दिन खुशी से झूमें, गाए रातें
पल-पल मुझे डूबाए जाते-जाते
जीत-जीत हारूं, ये प्राण-प्राण वारूं
हो.. ऐसे मैं निहारूं
तेरी आरती उतारूं
तेरे नाम से जुड़ें हैं सारे नातें
सईंया....

बनके माला प्रेम की तेरे तन पे झर-झर जाऊं
बैठूं नईया प्रीत की संसार से तर जाऊं
तेरे प्यार से तर जाऊं
सईंया.....

ये नरम-नरम नशा है बढ़ता जाए
कोई प्यार से घुंघटिया देता उठाए
अब बावरा हुआ मन
जग हो गया है रोशन
ये नई-नई सुहागन
हो गई है तेरी जोगन
कोई प्रेम की पुजारन मंदिर सजाए
सईंया... सईंया....

हीरे-मोती मैं ना चाहूं
मैं तो चाहूं संगम तेरा
मैं ना जानूं, तू ही जाने
मैं तो तेरी, तू है मेरा................ "

कशमकश..


कौन हूं मैं,
क्या है मेरे मायने...



लाखों की भीड़ में लावारिस पड़ा सामान सा लगता हूं
शक़ होता है कभी कि जानवर हूं या इंसान हूं...



इक नौकरी है साली,
घोड़े की तरह
नाक में नाल डली है,
उसे कोई दो हाथ खींचते दिखाई देते हैं
आज तक चेहरा नहीं दिखा उस माई-बाप का..



डर लगता है जिस दिन थककर बैठ गया तो
रेस से निकाल दिया जाउंगा
डर लगता है उस दिन से
जब हारा हुआ कहलाउंगा...



इसलिए दौड़ता रहना चाहता हूं
इस अंधी दौड़ में

थक गया हूं फिर भी दौड़ रहा हूं...

-पुनीत भारद्वाज

क्षितिज....


कितनी भागम-भाग है यहां,
नफ़रतों से ना जाने कितने दिल चाक (ज़ख़्मी) हैं यहां
सबको अपनी ही फ़िक्र है;
किसको किसकी क़द्र है
जब हम इंसानों की ज़िंदगी यहां कुछ ऐसे चलती है..
ऐसे में दूर कहीं क्षितिज पर ये ज़मीन
फ़ुर्सत में आसमां से गले मिलती है......

-पुनीत भारद्वाज

वंदे मातरम (महबूब) MEHBOOB

Song- वंदे मातरम...
Lyricist- महबूब
Singer- ए. आर. रहमान

Music- ए. आर. रहमान
Album- मां तुझे सलाम

महबूब उस गीतकार का नाम है जिन्हें अपने काम के मुताबिक उतना नाम नहीं मिल पाया जिसके वो हक़दार है। महबूब वो नाम है जो आवाज़ तक गया ही नहीं। महबूब ने 'हम दिल दे चुके सनम' के लिए 'तड़प-तड़प के ' लिखा है वहीं युवा के 'कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद' को महबूब ने फ़िल्म के बैकग्राउंड के मुताबिक बांग्ला अंदाज़ में बख़ूबी पेश किया। इसके अलावा वे रंगीला, दौड़, लकीरें, बॉंम्बे, तक्षक जैसी कई फ़िल्मों के लिए गीत लिख चुके हैं। ए. आर. रहमान की भी पसंद हैं महबूब। रहमान का गाया और महबूब का लिखा एक शानदार गीत....


यहां-वहां सारा जहां देख लिया है....
कहीं भी तेरा जैसा कोई नहीं है
अस्सी नहीं, सौ दिन दुनिया घूमा है
नहीं कहीं तेरा जैसा कोई नहीं
मैं गया जहां भी, बस तेरी याद ही
जो मेरे साथ थी
मुझको तड़पाती-रूलाती
सब से प्यारी तेरी सूरत
प्यार है बस तेरा, प्यार ही
मां तुझे सलाम, मां तुझे सलाम
अम्मा तुझे सलाम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम

जनम-जनम तेरा ही दीवाना मैं
झूमू-नांचूं, गाऊं तेरे प्यार का तराना मैं
जीना नहीं सोच नहीं दुनिया की दौलत नहीं
बस लूटूंगा तेरे प्यार ख़ज़ाना मैं
इक नज़र जब तेरी होती है प्यार की
दुनिया तब तो मेरी चमके-दमके-महके रे
तेरा चेहरा सूरज जैसा, चांद सी ठंड है प्यार में
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम

तेरे पास ही मैं आ रहा हूं
अपनी बाहें खोल दे
ज़ोर से मुझको गले लगा ले
मुझको फिर वो प्यार दे
तू ही तो ज़िंदगी है, तू ही मेरी मोहब्बत है
तेरे ही पैरों में जन्नत है
तू ही दिल, तू जान, अम्मा
मां तूझे सलाम, मां तूझे सलाम
अम्मा तूझे सलाम, मां तूझे सलाम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम
वंदे मातरम, वंदे मातरम......

महबूब का एक और गाना

बेजान दिल को
बेजान दिल को
बेजान दिल को तेरे इश्क़ ने ज़िंदा किया
फिर तेरे इश्क़ ने ही इस दिल को तबाह
किया

तड़प-तड़पके इस दिल से आह निकलती रही

मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया

तो लुट गए हां लूट गए

तो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में...

अजब है इश्क़ यारा

पल-दो-पल की ख़ुशियां

ग़म के ख़ज़ानें मिलते हैं

फिर मिलती हैं तन्हाईयां

कभी आंसू, कभी आहें

कभी शिक़वे, कभी नालें

तेरा चेहरा नज़र आए

तेरा चेहरा नज़र आए मुझे दिन के उजालों में

तेरी यादें तड़पाएं

तेरी यादें तड़पाएं रातों के अंधेरों में

तेरा चेहरा नज़र आए

मचल-मचलके इस दिल से आह निकलती रही

मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया

तो लुट गए हां लुट गएतो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में

अगर मिले ख़ुदा तो

पूछूंगा ख़ुदाया

जिस्म मुझे देके मिट्टी का

शीशे-सा दिल क्यों बनाया

और उसपे दिया फ़ितरत के वो करता है मोहब्बत वाह रे वाह तेरी क़ुदरत

वाह रे वाह तेरी क़ुदरत, उसपे दे दिया क़िस्मत

कभी है मिलन, कभी फ़ुरक़त

कभी है मिलन, कभी फ़ुरक़त है यही क्या वो मोहब्बत

वाह रे वाह तेरी क़ुदरत

सिसक-सिसकके इस दिल से आह निकलती रही

मुझको सज़ा दी प्यार की ऐसा क्या गुनाह किया

तो लुट गए, हां लुट गएतो लुट गए हम तेरी मोहब्बत में

वादियों से लौटकर....



उस दिन बुधवार था पलकों ही पलकों में सारा दिन निकल गया। जो पलकें कभी फुर्सत के कुछ पल तलाशती थी, वो आज इस जुगत में थी की कब दो दिनों के लिये हम सब दिल्ली के कॉन्क्रिट के जंगल से विदा लेकर उस प्राकृतिक जंगल के आगोश में समा जायें जो यहां से तकरीबन तीन सौ किलोमीटर दूर मसूरी की ठंडी वादियों में बसा हुआ था। बस बहुत हुआ अब अपनी नई नवेली नौकरी को पहली बार हम ऑफिस की दहलीज़ पर छोड़े चले जा रहे थे। शायद यही फर्क होता है नौकरी और छोकरी में; मन में उदासी कम उमंग ज्यादा थी। चार दोस्त, एक गाड़ी और ठंड़ी हवा के झोंके बस रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला। रास्ते भर कई तरह की बाते हुईं- गुजरात के दंगों से लेकर लड़कियों की वर्जिनिटी तक...
शायद किसी ने ठीक कहा है जिंदगी का असली मज़ा सफऱ में हैं मंजिल की खामोशी में नहीं। वापिस आये तो अपना शहर पराया लग रहा था। मानो उसने किसी और के साथ घर बसा लिया हो।
- मित्र मंडली

फिल्म बनाने का अनूठा अंदाज़…जॉनी गद्दार

अगर मैं आपसे कहूं की फिल्म की शुरुआत में ही अगर आप को बता दिया जाये कि आप जो फिल्म देखने जा रहे हैं, उसमें फलां शख्स कातिल है तो क्या फिर भी आप निर्देशक की प्रतिभा पर यकीन करते हुए उस फिल्म को देखेंगे। यकीन मानिय़े इस सवाल का जवाब आपको जॉनी गद्दार में मिलेगा। यहां गीतकार से लेकर फिल्म के निर्देशक तक एक भी ब्रैंड नेम नहीं है..। न तो निलेश मिश्रा और जयदीप साहनी के गीतों में गुलज़ार सी ताज़गी है और न ही नील नितिन मुकेश का इंतज़ार सांवरिया के रणबीर कपूर की तरह हो रहा है। बावजूद इसके निर्देशक श्रीराम राघवन ने जॉनी गद्दार के जरिये कहानी कहने का एक नया तरीका इजाद किया है.। जहां निर्देशक ने खालिस कहानी कही है वो भी बिना कोई सफाई दिये। अंग्रेजी में अगर कहें तो just do it ,no explanation. इस फिल्म की शुरुआत से ही छायांकन आपके दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है। पात्र ठीक वैसा ही अभिनय करते हैं जैसा कि निर्देशक चाहता है। हां, जहां तक बैकग्रांउड स्कोर की बात है तो उसमें शंकर ,एहसान,लॉय की जोड़ी ने एक खास किस्म की स्वायत्ता ले ली है। इसलिए तो हर दृश्य में जिस तरह से पुरानी थ्रिलर फिल्मों के संगीत का रिमिक्स कानों में घोला गया है। वो कहानी की मांग के मुताबिक माहौल बनाता है। अगर फिल्म के अलग अलग पहलुओं पर बात करें तो छायांकन में मुरलीधरन ने गज़ब ढ़ा दिया है। कैसे एक साधारण से बातचीत के सीन को भी कैमरे के एक नये कोण से तराशकर मज़ेदार बनाया जा सकता है ये उन्हें बखूबी आता है। इसलिये फिल्म इंटरवल तक आपको खुद से चिपटाये रखती है। इंटरवल के बाद अभिनेता अपने फार्म में और भी धाकड़ होते गये हैं। खासकर नील नितिन मुकेश जिनके तराशे हुए नैन नक्शों को भूलकर अब तक आप ये समझ चुके होते हैं कि ये आदमी सिर्फ सही मौके की फिराक में है और अगर इसे ये मौका मिल गया तो वो हमारी इंडस्ट्री के जमे-जमाये नायकों के पसीने छुड़ा सकता है। जहां तक बात धर्मेंद्र की है वो तो फिल्म में its not about age ,its about mileage वाला संवाद बोलकर स्क्रीन पर अपनी धाक पहले ही जमा लेते हैं। विनय पाठक भी खोसला का घोंसला और भेजा-फ्राई के बाद इस बार भी सही गेंद(संवाद) पर सही टाईमिंग करके चौका मारने के अभ्यस्त हो गये हैं। रही बात रिमी सेन की तो उनका इस्तेमाल फिल्म में एक मकसद से किया गया है। मकसद जॉनी की गद्दारी का औऱ फिल्म के सारे खेल का। आप चाहें तो उन्हें फिल्म का सबसे वेस्ट मैटिरियल कह सकते हैं या फिर कहानी को बुनने में मदद करने वाली सूई जो तीखापन लिये है। पर अफसोस जब हीरो इतना हैंडसम हो तो हिरोइन सोच समझ के चुननी चाहिये। ये श्रीराम राघवन को समझना होगा। नहीं तो वो उम्दा फिल्म बनाते जायेंगे और दर्शक उसे नकारते जायेंगे। आखिर बेहतर फिल्म को बेहतर बाज़ार मुहैया कराने में निर्देशक का भी योगदान होना चाहिये।
-तुषार उप्रेती

हम तो ऐसे हैं भइया.. (स्वानंद किरकिरे) SWANAND KIRKIRE

Song- हम तो ऐसे हैं भइया...
Lyricist- स्वानंद किरकिरे
Singer- श्रेया घोषाल, सुनिधी चौहान,
स्वानंद किरकिरे, प्रणब बिस्वास
Music- शांतुनु मोइत्रा
Film- लागा चुनरी में दाग
Director- प्रदीप सरकार


स्वानंद किरकिरे इससे पहले परिणीता, एकलव्य, मुन्नाभाई एमबीबीएस, लगे रहो मुन्नाभाई, हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी.. जैसी फ़िल्मो के गाने भी लिख चुके हैं। आईए, आपको उनके लिखे एक ठेठ बनारसी गाने से रू-ब-रू कराते हैं...

ये गाना सुनने के लिए आप यहां क्लिक करें....


जेब में हमरी दुई रूपैया
दुनिया को रखें ठेंगे पे भैया
सुख-दुख को खूंटी पे टांगे
और पाप-पुण्‍य चोटी से बांधे
नाचे हैं हम ता-ता थैया
हम तो ऐसे हैं भैया
ये अपना पैशन/टश्‍न है भैया ।।


एक गली में बम-बम भोले
दूजी गली में अल्‍ला-मियां
एक गली में गूंजें अज़ानें
दूजी गली में बंसी बजईया ।।


सबकी रगों में लहू बहे हैं
अपनी रगों में गंगा मैया
सूरज और चंदा भी ढलता
अपने इशारों पे चलता
दुनिया का गोल-गोल पहिया ।। हम तो ऐसे हैं भैया ।।


आजा बनारस में रस चख ले आ
गंगा में जाके तू डुबकी लगा
रबड़ी के संग-संग चबा ना ले उंगली
माथे पे भंग का रंग चढ़ा
चूना लगई ले,पनवा चबई ले
उसपे तू ज़र्दे का तड़का लगई ले
पटना से अईबे, पैरिस से अईबे
गंगा में हर कोई नंगा नहइबे
जीते जी तो कोई काशी ना आए
चार-चार कांधों पे वो चढ़के आए ।।
हम तो ऐसे हैं भईया
ये अपनी नगरी है भईया ।।


दीदी अगर तुझको होती जो मूंछ
मैं तुझको भईया बुलाती तू सोच
अरे छुटकी अगर तुझको होती जो पूंछ
मैं तुझको गैया बुलाती तू सोच
दीदी ने ना जाने क्‍यों छोड़ी पढ़ाई
घर बैठे अम्‍मां संग करती है लड़ाई
अम्‍मां बेचारी बीच में है आई
रात दिन सुख-दुख की चलती सलाई
घर बैठे-बैठे बाप जी हमारे
लॉटरी में ढूंढते हैं किस्‍मत के तारे
मंझधार में हमरी नैया
फिर भी देखो मस्‍त हैं हम भैया ।।
हम तो ऐसे हैं भैया ।।


दिल में आता है यहां से
पंछी बनके उड़ जाऊं
शाम ढले फिर दाना लेकर
लौटके अपने घर आऊं ।।
हम तो ऐसे हैं भैया ।।हम तो ऐसे हैं भैया ।।