
मेरी प्रेरणा हो तुम..
जो मेरा ही अंश है
मेरी प्रेरणा हो तुम..


Song- मैं भूल जाऊं तुम्हें...
Lyricist- जावेद अख़्तर
Singer- जगजीत सिंह
Music- जगजीत सिंह
Album- सिलसिला

कुछ किस्से ऐसे होते हैं आपकी ज़िंदगी में.. जो लगता है पूरी दुनिया में सिर्फ आपके साथ ही हुए हों... एक ऐसा किस्सा मेरी 22 बरस की ज़िंदगी में मेरे साथ भी हुआ। लेकिन किस्सागोई के इस कॉलम में मैं वो क़िस्सा अपने ही अंदाज़ में बताना चाहूंगा।
मगर ये सिलसिला कुछ रोज़ पहले ही टूट गया...उसकी बीमारी तो ठीक थी लेकिन उसकी अचानक मुझसे मिलने की बेकरारी मुझे अजब लगी। क्योंकि उसने वो कहा जिसकी गुज़ारिश इससे पहले हमारे रिश्ते में नहीं हुई थी। मेरी और उसकी तरफ से इससे पहले कभी मिलने की कोशिश नहीं की गई। मन तो तब भी नहीं था मिलने का..लेकिन जो दोस्त मुझे पागल कहते थे..उनके लाख कहने पर मुझे उस अजनबी मगर जाने-पहचाने दोस्त से और ज़्यादा जान-पहचान बढ़ाने हॉस्पिटल जाना ही पड़ा। हम तीन दोस्त बाईक से निकल दिए..और मुझे थोड़ा डर, थोडी खुशी हो रही थी और साथ ही इस बात को लेकर काफी हद तक सुकून था कि कुछ लम्हों के बाद मैं अपने दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करके खड़ा होने वाला था। आखिर जिस शख़्स के लिए मेरे दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाते थे.. मैं उसी शख़्स से मिलने वाला था। सफ़र ज्यादा लंबा नहीं था... लेकिन सफ़र लंबा लगने लगा। क्योंकि एक लंबा सिलसिला जो टूटने वाला था। इस बीच कई बार मुझे लगा कि आखिर ये सब जो मैं कर रहा हूं.. क्या वाकई ठीक है (तौल-मौल की आदत है..आखिर आम-इंसान जो ठहरा) तब एकबारगी मन तो करा कि वापिस लौट जाउं। मगर वही किस्मत, भाग्य, नियती, DESTINY वगैरह-वगैरह।
आखिरकार इतने कशमकश भरे सफ़र के बाद बाईक वहीं रूकी जो उसकी DESTINY थी...जहां उसे रूकना चाहिए था.. वो हॉस्पिटल जहां मेरी बीमार दोस्त मेरा इंतज़ार कर रही थी। बाईक गुडगांव के उसी हॉस्पिटल के आगे रूकी। रात के 10 बजे थे। सबकुछ बिल्कुल नया था मेरे लिए..इसलिए थोड़ी उलझनें भी थी मन में। और इस बीच उस कम्बख़्त कशमकश का क्या करें जो पूरे सफ़र में मेरी बाईक की पिछली सीट पर बैठी मेरे साथ चल रही थी.. फिर हावी होती गई मुझ पर । जैसे-जैसे मैं उस अंजान चेहरे के नज़दीक जा रहा था..बढ़ती जा रही थी उलझनें। और तब हद ये हो गई कि बीमार दोस्त के रूम के आगे कई बार जाकर वापिस लौटना पड़ा...क्या कहूं लाज केवल लड़कियों का ही सामान नहीं है। और फिर शर्म के मारे दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करना तो दूर उनकी फब्तियां सुननी पड़ी। मन ही मन बैचेन दिल ने हौसला बढ़ाने के लिए दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियां गुनगुना ली। लो अब तो वो होना ही था जो मैं करने आया था। सब बंदिशें हटाकर दरवाज़ा खोला और सीधा दीदार हुआ उस चेहरे का। चेहरा आम था लेकिन मुझे खुशी बेहद थी। इतनी खुशी थी के दिल में दबानी पड़ी और पूरा माजरा तब शायद मेरी नज़रें ही बयान कर रही थी।
आखिर इक साल से भी लंबा सिलसिला जो ठहर गया था। वो चेहरा जिसकी आवाज़ में कोई जादू था और वो जादू भरी आवाज़ जो बेशक्ल थी अब तक... हां उसका चेहरा मुझे जो मिल गया था। उन लम्हों ने एक सिलसिला तो खत्म कर दिया मगर उन लम्हों की मेहरबानी रही कि एक सिलसिला और शुरू हो गया है...जो पता नहीं कब खत्म हो। शायद हो... या शायद कभी भी ना हो...-पुनीत भारद्वाज

बातें तेरी जिनमें तेरा क़िस्सा रहता है और वो बातें भी जिनमें मेरा कोई हिस्सा रहता है
और बातों ही बातों में जब बढ़ जाती हैं तेरी-मेरी बातें
तब तेरे बाद भी मुझसे लड़ती है, झगड़ती हैं और अपनी बात मनवाने पर मजबूर करती हैं तेरी बातें
और तब ये तेरी मीठी और शरारती बातें कुछ इस तरह करती हैं मुझपे अपना असर
के तेरे होंटों से गिरकर मेरे कमरे में खनकते रहते हैं तेरे अल्फ़ाज़ रात-भर*
तब बस रह जाती है
मेरी रातें और तेरी बातें
-पुनीत भारद्वाज
*आखिरी लाइन दोस्त की एक लाइन से प्रेरित है, जज़्बातों के करीब लगी इसलिए लिया इसे..
ख़ुशबू कहूं,तुम ही
बताओ मैं तुम्हें क्या कहूं...


सुबह उठकर कुल्ला करके जैसे ही अपन ने अख़बार खोला तो होश उड़ गये। सारी रात दोस्तों के साथ एग, पेग, लेग के चक्कर में हम ये भूल गये थे कि कमबख्त इस देश और शहर के लिये अपनी भी कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है। इसलिए तो सुबह-सुबह हाजरी लगाने से पहले अख़बार खोल कर बैठ गये। सोचा था चाय की चुस्कियों के बाद पेट अंदर से ऐंठेगा (ऐसा रोज़ ही नियमित तौर पर होता था) और हम आराम से जायके के साथ मज़े लेते हुए ख़बरों से खेलेंगें। यही तो मज़ा है ख़बरों से खेलने का , सारा तंत्र समझता है कि केवल उसे ही ख़बरों से खेलना आता है। लेकिन सही मायनों में पाठक ख़बरों के खूब चटखारे लेता है। आप उसे बताएं कि कालाहांड़ी में बच्चे भूख से मर रहे हैं और वो तो शिल्पा शेट्टी के फिगर को ताड़ रहा होता है। जब तक आप उसे ये बताते हैं कि दिल्ली में ब्लू – लाईन ने सात लोगों को एक ही झटके में कुचल डाला तब तक वो हाजरी लगाने चला जाता है।
अब गलियां नहीं है, इसलिए नहीं है इशारे। इशारे जो झुकती नज़रों की तारीफ करते थे, इशारे जो छज्जों से कूद मरते थे। कोई हवा गर निकलती थी गली से उन्हें चौखट पर चूम लेते थे इशारे। इशारे जो जवानी की कहानी थे, इशारे जो आंखों की ज़बानी थे। इशारों ने एक दिन दिल की जुबां बयां कर दी सारी दुनिया अपने खिलाफ कर दी सुनते हैं उस दिन नालियों मे खून बहा था शायद सबने ठीक कहा था उस दिन बाज़ार में सरेआम निलाम हुए थे इशारे कोई गली से पकड़कर खींच लाया था उन्हें बाहर न जाने कौन था वो कायर जो इशारों से जी चुराता था जो दूर से ही इनके हालात पर मुस्कुराता था लेकिन अब गलियां नही हैं न हैं वो इशारे जो कुछ थे हमारे, कुछ थे तुम्हारे |

Lyricist- नीलेश मिश्राSong- मैने दिल से कहा...
Song- क्या मुझे प्यार है...
Lyricist- नीलेश मिश्रा
Singer- के.के
Music- प्रतीम चक्रबर्ती
Film- वो लम्हें
Song- कुछ इस तरह तेरी पलकें...
Lyricist- सईद क़ादरी
Singer- अतीफ़ असलम
Music- मिथुन
Album- दूरी..

Song- रिश्ते तो नहीं
रिश्तों की परछाईयां मिले..
Lyricist- सईद क़ादरीSinger- जेम्स
Music- प्रतीम चक्रबर्ती
Film- लाइफ़ इन ए मैट्रो
- ये गाना सुनिए
रिश्ते तो नहीं रिश्तों की परछाईयां मिलेये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिलेइक छत के तले अजनबी हो जाते हैं रिश्तेबिस्तर पे चादरों से चुप सो जाते हैं रिश्तेढूढें से भी इनमें नहीं गरमाईयां मिलेये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिलेजिसको भी देखिए वो अधूरा सा है यहांजैसे कहीं होगा वो आधा रखा हुआजो जब जहां जुड़े वहीं जुदाईयां मिलेये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिले



दुप्पटों ने अब लहराना बंद कर दिया है हवाओं ने अब गुनगुनाना बंद कर दिया है जब से जला है ये शहर चांद ने मुस्कराना बंद कर दिया है साहिल पर अब भी लौटती हैं लहरें लोगों ने अब रेत के मकान बनाना बंद कर दिया है जब से लुटी है मुन्नी की अस्मत मां ने कहानी सुनाना बंद कर दिया है मुंड़ेर पर अब भी बैठती है चिड़िया हमने उन्हें दाना खिलाना बंद कर दिया है जब से धोखा दिया अपनों ने यारों ने शर्त लगाना बंद कर दिया है बच्चे अब भी बागों मे खेलते हैं उन्होंने भी दादी को मुंह चिड़ाना बंद कर दिया है रात अब भी वैसी ही काली है जुगनुओं ने टिमटिमाना बंद कर दिया न जाने कैसा खौफ़नाक मंज़र था वो यहां रिश्ते वही हैं लोगों ने गले लगाना बंद कर दिया है मैं चाहता था मांगूं ख़ुदा से कुछ पल का सुकुं पर, उसने भी अब आस्तिकों को विश्वास दिलाना बंद कर दिया है जब से जला है ये शहर चांद ने मुस्कराना बंद कर दिया है । तुषार उप्रेती |
