मेरी प्रेरणा....


धीमे-धीमे से आती हो मेरे सीने में तुम
आकर दिल के भंवर में हिंडोले खाती हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम....

मैं नाज़रीन* हूं तुम्हारा
सुरम्य मेला हो तुम
वो बाग जहां शोख़-सब्ज़
कलियां खिलती हो
उस बाग की बागबां हो तुम..
* देखने वाला

मेरी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम..

दीपावली की दीपमाला हो तुम
वो आतिश नज़ारा-ए-हरसू* हो तुम
रंगों में घुली मनहर होली हो तुम
सर्दी में तपती लोहड़ी हो तुम
* चारों ओर की आतिशबाज़ी

मेरी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम..

हर दर्द में जो सुकून दे
वो मरमरी एहसास हो तुम
जिसकी मुझे दिली चाहत है
हां.. ऐसी ख़ास हो तुम

वो सौंधी सी महक
जो मेरा ही अंश है
वो शोशा*, वो महकती कस्तूरी हो तुम
* कोई विलक्षण बात

मेरी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम...

मेरी भाषा, मेरा अलंकार
मेरा पर्याय, मेरा तख़ल्लुस*
मेरे ह्रदय का स्पंदन हो तुम
* कवियों का उपनाम जैसे असहदुल्लाह ख़ान का तख़ल्लुस 'ग़ालिब' था

मेरी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम..

जिस प्रेरणा से पिरो सकूं
मैं कविताओं सरीखे मोती
मेरा कोई तस्सव्वुर
मेरा हर ख़्याल हो तुम
ऐसी प्रेरणा हो तुम
मेरी प्रेरणा हो तुम...


-पुनीत भारद्वाज

मैं भूल जाऊं तुम्हें.....JAVED AKHTAR



Song- मैं भूल जाऊं तुम्हें...
Lyricist- जावेद अख़्तर
Singer- जगजीत सिंह
Music- जगजीत सिंह
Album- सिलसिला







मैं भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भूलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
यहां तो दिल का ये आलम है
क्या कहूं..कम्बख़्त..
भूला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़्याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त* जो हममे कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भूलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं...........
* रिश्ता

चैन से जी रहे थे मगर...


इधर से गुज़री जब हवा तो बहार दे गई
चैन से जी रहे थे हम इक ख़ुमार दे गई


इक दिन बैठे थे हम तन्हा
सोच रहे थे काग़ज़-क़लम लिए
किसी की यादें बांहों में आ गिरी
और इक अशआर(शेर) दे गई
इधर से गुज़री जब हवा तो बहार दे गई.....

जाते-जाते बेकल नज़रें ढूंढती रही..
गलियों के मोड़ पे आवारा घूमती रही..
इक पल की मुलाक़ात कैसा इंतज़ार दे गई


चैन से जी रहे थे इक ख़ुमार दे गई.....


-पुनीत भारद्वाज

सिलसिले.......

कुछ किस्से ऐसे होते हैं आपकी ज़िंदगी में.. जो लगता है पूरी दुनिया में सिर्फ आपके साथ ही हुए हों... एक ऐसा किस्सा मेरी 22 बरस की ज़िंदगी में मेरे साथ भी हुआ। लेकिन किस्सागोई के इस कॉलम में मैं वो क़िस्सा अपने ही अंदाज़ में बताना चाहूंगा।
एक लड़की थी जिससे तक़रीबन डेढ़ साल पहले तक सिर्फ़ फोन पर ही बातें होती थी.. और कुछ रोज़ पहले तक मैने इतने पुराने इस साथी का चेहरा भी नहीं देखा था। पता नहीं था मगर सोचता था आखिर कैसी है वो...ज्यादा नहीं दिनभर वो तभी याद आती थी जब उसका कोई एसएमएस या फिर फोन आता था। हमारे बीच बातों के ऐसे सिलसिले होते थे के मेरे करीबी दोस्त इस अजनबी और अनूठे से रिश्ते को लेकर मेरा मज़ाक तक उड़ाने लगे । मुझे पागल कहने लगे थे मेरे दोस्त। और तब मैने अपनी ये नाराज़गी अपने जाने-पहचाने से उस अजनबी दोस्त से भी की.. जिसकी आवाज़ ही बस एक पहचान थी मेरे लिए...

"अजब है ये सिलसिला
ना देखा तुम्हें ना तुमसे कभी मिला
जाने इस रिश्ते को क्या नाम देते हैं
यार मुझको सभी पागल कहते हैं..."


मगर ये सिलसिला कुछ रोज़ पहले ही टूट गया...उसकी बीमारी तो ठीक थी लेकिन उसकी अचानक मुझसे मिलने की बेकरारी मुझे अजब लगी। क्योंकि उसने वो कहा जिसकी गुज़ारिश इससे पहले हमारे रिश्ते में नहीं हुई थी। मेरी और उसकी तरफ से इससे पहले कभी मिलने की कोशिश नहीं की गई। मन तो तब भी नहीं था मिलने का..लेकिन जो दोस्त मुझे पागल कहते थे..उनके लाख कहने पर मुझे उस अजनबी मगर जाने-पहचाने दोस्त से और ज़्यादा जान-पहचान बढ़ाने हॉस्पिटल जाना ही पड़ा। हम तीन दोस्त बाईक से निकल दिए..और मुझे थोड़ा डर, थोडी खुशी हो रही थी और साथ ही इस बात को लेकर काफी हद तक सुकून था कि कुछ लम्हों के बाद मैं अपने दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करके खड़ा होने वाला था। आखिर जिस शख़्स के लिए मेरे दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाते थे.. मैं उसी शख़्स से मिलने वाला था। सफ़र ज्यादा लंबा नहीं था... लेकिन सफ़र लंबा लगने लगा। क्योंकि एक लंबा सिलसिला जो टूटने वाला था। इस बीच कई बार मुझे लगा कि आखिर ये सब जो मैं कर रहा हूं.. क्या वाकई ठीक है (तौल-मौल की आदत है..आखिर आम-इंसान जो ठहरा) तब एकबारगी मन तो करा कि वापिस लौट जाउं। मगर वही किस्मत, भाग्य, नियती, DESTINY वगैरह-वगैरह।
आखिरकार इतने कशमकश भरे सफ़र के बाद बाईक वहीं रूकी जो उसकी DESTINY थी...जहां उसे रूकना चाहिए था.. वो हॉस्पिटल जहां मेरी बीमार दोस्त मेरा इंतज़ार कर रही थी। बाईक गुडगांव के उसी हॉस्पिटल के आगे रूकी। रात के 10 बजे थे। सबकुछ बिल्कुल नया था मेरे लिए..इसलिए थोड़ी उलझनें भी थी मन में। और इस बीच उस कम्बख़्त कशमकश का क्या करें जो पूरे सफ़र में मेरी बाईक की पिछली सीट पर बैठी मेरे साथ चल रही थी.. फिर हावी होती गई मुझ पर । जैसे-जैसे मैं उस अंजान चेहरे के नज़दीक जा रहा था..बढ़ती जा रही थी उलझनें। और तब हद ये हो गई कि बीमार दोस्त के रूम के आगे कई बार जाकर वापिस लौटना पड़ा...क्या कहूं लाज केवल लड़कियों का ही सामान नहीं है। और फिर शर्म के मारे दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करना तो दूर उनकी फब्तियां सुननी पड़ी। मन ही मन बैचेन दिल ने हौसला बढ़ाने के लिए दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियां गुनगुना ली। लो अब तो वो होना ही था जो मैं करने आया था। सब बंदिशें हटाकर दरवाज़ा खोला और सीधा दीदार हुआ उस चेहरे का। चेहरा आम था लेकिन मुझे खुशी बेहद थी। इतनी खुशी थी के दिल में दबानी पड़ी और पूरा माजरा तब शायद मेरी नज़रें ही बयान कर रही थी।

आखिर इक साल से भी लंबा सिलसिला जो ठहर गया था। वो चेहरा जिसकी आवाज़ में कोई जादू था और वो जादू भरी आवाज़ जो बेशक्ल थी अब तक... हां उसका चेहरा मुझे जो मिल गया था। उन लम्हों ने एक सिलसिला तो खत्म कर दिया मगर उन लम्हों की मेहरबानी रही कि एक सिलसिला और शुरू हो गया है...जो पता नहीं कब खत्म हो। शायद हो... या शायद कभी भी ना हो...
-पुनीत भारद्वाज

मेरी रातें और तेरी बातें.....


तुझसे भी दिलक़श तेरी बातें लगती हैं
जैसे चांद से प्यारी चांदनी रातें लगती हैं

बातें तेरी इधर-उधर की
बातें तेरी जहान भर की

बातें तेरी जिनमें तेरा क़िस्सा रहता है और वो बातें भी जिनमें मेरा कोई हिस्सा रहता है

और बातों ही बातों में जब बढ़ जाती हैं तेरी-मेरी बातें

तब तेरे बाद भी मुझसे लड़ती है, झगड़ती हैं और अपनी बात मनवाने पर मजबूर करती हैं तेरी बातें

और तब ये तेरी मीठी और शरारती बातें कुछ इस तरह करती हैं मुझपे अपना असर

के तेरे होंटों से गिरकर मेरे कमरे में खनकते रहते हैं तेरे अल्फ़ाज़ रात-भर*


तब बस रह जाती है

मेरी रातें और तेरी बातें


-पुनीत भारद्वाज


*आखिरी लाइन दोस्त की एक लाइन से प्रेरित है, जज़्बातों के करीब लगी इसलिए लिया इसे..

क्या कहूं...

ख़ुशबू कहूं,
आफ़ताब कहूं,
या उजले कोसे में लिपटा ग़ुलाब कहूं......


कोई दुआ कहूं,
या नमाज़ कहूं,
या मंदिरों में गूंजती ख़ुदा की आवाज़ कहूं......


इक मुक़्क़म्मल ख़्याल कहूं,
या फिर कोई अधूरा सवाल कहूं,
या अरमानों से भी उंचा परवाज़* कहूं.....
* उड़ान


शोख़ अदा कहूं,
या मस्त अंदाज़ कहूं,
या फिर वक़्त से बेअसर कोई रिवाज़ कहूं....




तुम ही
बताओ मैं तुम्हें क्या कहूं...


-पुनीत भारद्वाज

बस अकेले हम थे....


चांदनी रातें भी थी
फूल भी थे
और बहारों के मौसम थे
ये हमारी क़िस्मत थी के बस अकेले हम थे....

सितारों का साथ भी था
ख़ुशबू कोई फ़िज़ा में थी
मग़र फिर भी कई ग़म थे
ये हमारी क़िस्मत थी के बस अकेले हम थे...

चांद भी बुझ गया
रात फिर ढल गई
तन्हाईयों के शोर में हाथ से निकल गई
और जो बाकी रहे वो सब क़िस्से नम थे
ये हमारी क़िस्मत थी के बस अकेले हम थे....



-पुनीत भारद्वाज

ख्वाब जो हकीकत न हुए…...


मेरे एक ख्वाब को चेहरा मिल गया है
जब से तुम मिले हो मौसम बदल गया है
ख्वाब जो देखे थे छत पर बादलों के नीचे
अब न जाने क्यों लगने लगा की आसमान खुल गया है ।

अब पता नहीं क्या करुं मैं
ख्वाब जो देखा था वो अब पिघल गया है।

जब से तुम को देखा मौसम बदल गया है।।…..

धूप की चादर पर सर रखकर सोया था मैं
अब लगने लगा है वक्त मुझे निगल गया
मेरे एक ख्वाब को चेहरा मिल गया है।
जब से तुम मिले हो मौसम बदल गया है....

आज बरसों बाद नींद आई थी
लेकिन शायद ख्वाब था ये भी
एक लम्हा न जाने क्यों तुम्हारी गोद मे संभल गया है
मेरे एक ख्वाब को चेहरा मिल गया है।
जब से तुम मिले हो मौसम बदल गया है...

पिरोया था आज मैंने जिसे सिरहाने
दगाबाज़ निकला ये ख्वाब भी
जबसे देखा इसने तु्म्हें ये भी मुझ सा फिसल गया है
मेरे एक ख्वाब को चेहरा मिल गया है
जब से तुम मिले हो मौसम बदल गया है....



तुषार उप्रेती

ये रात कितनी सुहानी लगती है.......



ये रात कितनी सुहानी लगती है
दिन में तो हर शै बेमानी लगती है

इक खोया-सा सुक़ून देती है
कोई दादी-नानी की कहानी लगती है
ये रात कितनी सुहानी लगती है..



आती है चली जाती है इक इंतज़ार में
कोई बावरी दीवानी लगती है
ये रात कितनी सुहानी लगती है...
चांद सितारों की जगमगाहटें
सच्चे शायर की ज़ुबानी लगती है


पल-दो-पल में ही ढ़ल जाती है
मुझको मेरी पेशानी लगती है

क़ैद करना चाहता हूं इसको
ये मुझको मेरी नादानी लगती है


ये रात कितनी सुहानी लगती है
दिन में तो हर शै बेमानी लगती है




-पुनीत भारद्वाज

ब्लू लाईन का बुलबुला.....

सुबह उठकर कुल्ला करके जैसे ही अपन ने अख़बार खोला तो होश उड़ गये। सारी रात दोस्तों के साथ एग, पेग, लेग के चक्कर में हम ये भूल गये थे कि कमबख्त इस देश और शहर के लिये अपनी भी कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है। इसलिए तो सुबह-सुबह हाजरी लगाने से पहले अख़बार खोल कर बैठ गये। सोचा था चाय की चुस्कियों के बाद पेट अंदर से ऐंठेगा (ऐसा रोज़ ही नियमित तौर पर होता था) और हम आराम से जायके के साथ मज़े लेते हुए ख़बरों से खेलेंगें। यही तो मज़ा है ख़बरों से खेलने का , सारा तंत्र समझता है कि केवल उसे ही ख़बरों से खेलना आता है। लेकिन सही मायनों में पाठक ख़बरों के खूब चटखारे लेता है। आप उसे बताएं कि कालाहांड़ी में बच्चे भूख से मर रहे हैं और वो तो शिल्पा शेट्टी के फिगर को ताड़ रहा होता है। जब तक आप उसे ये बताते हैं कि दिल्ली में ब्लू – लाईन ने सात लोगों को एक ही झटके में कुचल डाला तब तक वो हाजरी लगाने चला जाता है।
लेकिन अब भला इस कमबख़्त नज़र से कौन सी खबर कहां छिपी है। जो अब छिपेगी। इसलिय़े हमारी भी नज़र पड़ गई एक ऐसे कार्टून पर जो हमें नहीं देखना चाहिए था। कार्टून कुछ ऐसा था कि ब्लू-लाईन बस लोगों को उनके घरों में घुस-घुस कर रौंद रही है और साथ में caption लिखा हुआ है….Still Searching for more victims….अपने तो हलक में निवाला ही अटक गया। रोज़ सुबह ब्लू लाईन हादसों की खबरें पड़ना आम बात थी। लेकिन इस एक अदद कैप्शन को पढ़ कर ऐसा लगा जैसा ब्लू लाईन मेरी कॉलोनी में घुस कर मेरा पता पूछ रही है। वैसे भी ब्लू लाईन को अगर सामने से बेतरतीबी से आते हुए आपने देखा हो तो उस पर अदृश्य अक्षरों मे लिखा पाया होगा। रौंद दूंगी। ठीक वैसे ही अदृश्य अक्षर जो हमारी सरकार के मुंह पर लिखे होते हैं जिन्हें पढ़ने में हमे पूरे पांच साल लग जाते हैं। खैर गलती अपनी भी नहीं। पढ़ने-लिखने का शौक कभी था भी नहीं। और सरकार की मिड़ डे मिल योजना तो पहले ही फेल हो चुकी है। इसलिए लालच भी नहीं रहा।
घबराइये नहीं बात अगर ब्लू लाईन की है तो हम उसी की बात करेंगे। मुझे याद है दिल्ली में ये बसें लाल रंग के साथ शुरु की गई थी और काफी हादसों के बाद ये फैसला लिया गया कि इसका रंग अशुभ है इसलिये इसे लाल से नीला कर दिया जाये तो हादसे कम हो जाएंगे। भई सरकार है लाजिक से नहीं समर्थन से चलती है। बच्चों को न्यूटन लॉ भले ही आज तक न समझा पाई हो लेकिन ये जरुर समझा देगी कि बस का रंग लाल से नीला कर देने से हादसे कम हो जाते हैं। खुद के मुंह में कालिख पुतने से तो अच्छा है कि बस पर नया रंग पोत दो। अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। अब सरकार डीटीसी के भरोसे चलेगी।

-तुषार उप्रेती

मामाजी......

उस दिन अचानक कई खौफ एक साथ मेरे ज़ेहन में लौट आये। मैं आज पूरे तीन सालों बाद उसी के इलाके में खड़ा था। लोग अनजाने चेहरों से ड़रते हैं। लेकिन मेरी खासियत है कि मुझे जाने-पहचाने चेहरों से ड़र लगता है।
यही जगह थी। यही पार्क था। जहां आखिरी बार मैंने उसे देखा था। उस दिन भी उसे कुछ कह न पाया। वो जानती थी। मैं जानता था। सिर्फ अल्फ़ाज़ तलाशने में देरी हो गई और पता ही न चला जिंदगी कब मेरी गिरफ्त से निकल भागी। वक्त, वक्त को धकेल कर जैसे आगे बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही आज घुम-फिर के जिंदगी ने वहीं ला पटका। जेब से फोन निकाला। ड़रते-ड़रते नंबर मिलाया। ऊंगलियां पहले से ही अपने प्रेमी नंबर से वाकिफ थी। अचानक से उससे जा लिपटी। और टेलिफोन की घंटी बजती चली गई।
‘हैलो’..।ओफ्फ ..वही मासूम आवाज़। ‘मैं बोल रहा हूं’..फिर कुछ देर चुप्पी छा गई।
ये जानने के लिए कि कहीं फोन का नेटवर्क जिंदगी की तरह द़गा न दे गया हो। मैंने चुप्पी को तोड़ते हुए कहा.. ‘पहचाना’ जवाब मिला ‘हां’।
ये लड़की बिल्कुल नहीं बदली। कभी कभी सोचता हूं प्यार की फितरत होती है, न बदलना।फिर वही रटे-रटाये मुहावरे जेहन में कौंधते हैं कि ‘जिंदगी परिवर्तन का नाम है’, ‘पानी की तरह बह जाती है’ वगैरह वगैरह। तो लगता है शायद बदल गई हो।
‘तुम्हारे इलाके मे खड़ा हूं मिलोगी मुझसे’ बिना कांफिडेंस के कहा तो डर सा लगा।
जवाब मिला ‘हां’
‘कहां’-मैंने पूछा।
‘वहीं जहां पहले मिलते थे’

वहीं जहां पहले मिलते थे। उसके इन शब्दों का मतलब मैं बखूबी जानता हूं। उसके इलाके में गलियों को निगलने वाली एक सड़क बनाई गई थी। वहीं पर पास में एक चाट-भंड़ार था। अक्सर वहीं मिलना हुआ करता था।

कुछ और कहने की हिम्मत न मुझमें थी, न उसमें। तो वक्त तय करके मैं अपना आफिशियल काम निबटाने चला गया।
..दिन के तीन बज चुके थे। इसलिए सड़क पर रिक्शा नहीं मिल रहा था। सबके सब कमबख्त सुस्ता रहे थे। ओटो पकड़ा और तयशुदा जगह पहुंचा।
वो पहले से मौजूद थी। मैं भी जाकर उसके साथ खड़ा हो गया। वो बोल रही थी मैं सुन रहा था। लेकिन शायद नहीं सुन रहा था। जब बातें अपनी मंजिल तक पहुंचने लगती तो मैं किसी पुराने किस्से को खोल बातों का रुख उस ओर मोड़ देता। पागल था, मैं। रेत को मुट्ठी में ज़ोर से दबाने से क्या वो आपकी हो जाती है। बातों मे सिर्फ इतना जान पाया कि वो अब शादीशुदा है। एक दो साल की छोटी बच्ची की मां भी है। लेकिन लगा बिल्कुल नहीं। वर्किंग वुमेन है न , शायद इसीलिये। किस्सों को ब्रेक लगा तब,जब एक आदमी ने उसका नाम पुकारा...अराधना....। कितना बेसुरा था उस मुंह से ये नाम। मैंने तो हमेशा इसे इबादत की तरह सुना था, पर ये क्या?
एक बंदा हमारे सामने खड़ा था। कहने की जरुरत नहीं वो उसका पति था। सारी बेफिक्री काफूर हो गई। मैंने थोड़ी देर के लिए खुद को जकड़न में पाया। पहला सवाल जो उस शख्स ने अपनी बीवी से नहीं मुझसे पूछा ...अमित राइट? यस , मैंने एक नकली मुस्कराहट से कहा।…. ‘तो जनाब आप हैं जो हमारी मोहर्तमा को कॉलेज में सताया करते थे’… बंदा बेबाकी से बोल गया। आखिर क्यों सताते थे इन्हें इतना?
‘अगर सताता नहीं तो मुझसे शादी न कर लेती आपसे क्यों करती?’ मैंने कुछ सहज होते हुए कहा।
फिर क्या था? जब इस इलाके में आया तो अकेला था,फिर दुकेला हुआ और अब तिकेला हो चुका था। यहां वहां की बाते हुईं। ठहाके लगे। बीच-बीच में कई बार चुप्पियों भी आईं। लेकिन कहते हैं न कि खून के रिश्ते समेटने आसान होते हैं। बेनाम रिश्ते समेटने बेहद मुश्किल। काफी देर तक वहीं खड़े रहे। रात हो चुकी थी। सड़क के कुत्ते ने भौंख कर हमें बताया कि अब राहगीरों का समय खत्म हो चुका है। मैंने भी दोनों मियां-बीवी से इज़ाज्त चाही। आगे बढ़ने ही वाला था कि उसके पति ने कहा...
‘ घर पर वान्या अकेली है। बहुत शरारती है। अगली बार आयें तो घर आइएगा। वो भी इसी बहाने अपने मामाजी से मिल लेगी’.. कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे किसी ने कोई अल्फ़ाज ज़मीन पर ज़ोर से पटक कर मेरे सर पर दे मारा हो।
हां,हां जरुर। कहता मैं आगे बढ़ गया। रास्ते में याद आया कि मेरे पास घर का पता तो है नहीं।
खैर मैं आगे बढ़ता जा रहा था । उसका इलाका पीछे छूटता जा रहा था। सारे इलाके में एक ही शब्द था जो गूंज रहा था, वो था मामाजी।............




तुषार उप्रेती.....

इशारे......





अब गलियां नहीं है, इसलिए नहीं है इशारे।
इशारे जो बिन अल्फ़ाज़ों के काफी कुछ कह जाते थे।

इशारे जिनके दम पर तुम ,

दूर होकर भी पास रह जाते थे।


इशारे जो झुकती नज़रों की तारीफ करते थे,
इशारे जो छज्जों से कूद मरते थे।



कोई हवा गर निकलती थी गली से

उन्हें चौखट पर चूम लेते थे इशारे।



इशारे जो जवानी की कहानी थे,

इशारे जो आंखों की ज़बानी थे।




इशारों ने एक दिन दिल की जुबां बयां कर दी
सारी दुनिया अपने खिलाफ कर दी




सुनते हैं उस दिन नालियों मे खून बहा था

शायद सबने ठीक कहा था

उस दिन बाज़ार में सरेआम निलाम हुए थे इशारे
कोई गली से पकड़कर खींच लाया था उन्हें बाहर

न जाने कौन था वो कायर

जो इशारों से जी चुराता था
जो दूर से ही इनके हालात पर मुस्कुराता था



लेकिन अब गलियां नही हैं न हैं वो इशारे

जो कुछ थे हमारे, कुछ थे तुम्हारे














तुषार उप्रेती

मैने दिल से कहा..... NEELESH MISRA




Song- मैने दिल से कहा...


Lyricist- नीलेश मिश्रा
Singer- के.के
Music- एम.एम. क़रीम
Film- रोग


मैने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी
नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही


बेचारा कहां जानता है
ख़लिश है ये क्या ख़ला है
शहर-भर की ख़ुशी से ये दर्द मेरा भला है
जश्न ये रास ना आए
मज़ा तो बस ग़म में आया है


मैने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी
नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही

कभी है इश्क़ का उजाला
कभी है मौत का अंधेरा
बताओ कौन भेस होगा
मैं जोगी बनूं या लुटेरा
कई चेहरे है इस दिल के
ना जाने कौन सा मेरा


मैने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी
नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही
हज़ारों ऐसे फ़ासले थे
जो तय करने चले थे
राहें मगर चल पड़ी थी
और पीछे हम रह गए थे
क़दम दो-चार चल पाए
किए फेरे तेरे मन के


मैने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी
नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही

क्या मुझे प्यार है... NEELESH MISRA


Song- क्या मुझे प्यार है...
Lyricist- नीलेश मिश्रा
Singer- के.के

Music- प्रतीम चक्रबर्ती
Film- वो लम्हें




क्यूं आजकल नींद कम ख़्वाब ज़्यादा है
लगता ख़ुदा का कोई नेक इरादा है
कल था फ़क़ीर आज दिल शहज़ादा है
लगता ख़ुदा का कोई नेक इरादा है
क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या
क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या



पत्थर के इन रस्तों पे
फूलों की इक चादर है
जबसे मिले हो हमको
बदला हर इक मंज़र है
देखो जहां में नीले-नीले आसमां तले
रंग नए-नए हैं जैसे घुलते हुए
सोए से ख़्वाब मेरे जागे तेरे वास्ते
तेरे ख़्यालों से है भीगे मेरे रास्ते
क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या

क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या


तुम क्यों चले आते हो
हर रोज़ इन ख़्वाबों में
चुपके से आ भी जाओ
इक दिन मेरी बाहों में
तेरे ही सपनें अंधरों में उजालों में
कोई नशा है तेरी आँख के प्यालों में
तू मेरे ख़्वाबों में जवाबों में सवालों में
हर दिन चुरा तुम्हें मैं लाता हूं ख़्यालों में
क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या
क्या मुझे प्यार है या
कैसा ख़ुमार है या


कुछ इस तरह.... SAYEED QUADRI

Song- कुछ इस तरह तेरी पलकें...
Lyricist- सईद क़ादरी
Singer- अतीफ़ असलम
Music- मिथुन
Album- दूरी
..





कुछ इस तरह तेरी पलकें
मेरी पलकों से मिला दे
आंसू तेरे सारे
मेरी पलकों पे सजा दे


तू हर घड़ी, हर वक़्त
मेरे साथ रहा है
हां ये जिस्म
कभी दूर, कभी पास रहा है
जो भी ग़म है ये तेरे
उन्हें तू मेरा पता दे


कुछ इस तरह तेरी पलकें
मेरी पलकों से मिला दे
आंसू तेरे सारे
मेरी पलकों पे सजा दे



मुझको तो तेरे चेहरे पे
ये ग़म नहीं जचता
जायज़ नहीं लगता
मुझे ग़म से तेरा रिश्ता
सुन मेरी गुज़ारिश
इसे चेहरे से हटा दे



कुछ इस तरह तेरी पलकें
मेरी पलकों से मिला दे
आंसू तेरे सारे
मेरी पलकों पे सजा दे.....

रिश्ते तो नहीं... SAYEED QUADRI



Song- रिश्ते तो नहीं
रिश्तों की परछाईयां मिले..

Lyricist- सईद क़ादरी

Singer- जेम्स
Music- प्रतीम चक्रबर्ती
Film- लाइफ़ इन ए मैट्रो



रिश्ते तो नहीं रिश्तों की परछाईयां मिले
ये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिले
इक छत के तले अजनबी हो जाते हैं रिश्ते
बिस्तर पे चादरों से चुप सो जाते हैं रिश्ते

ढूढें से भी इनमें नहीं गरमाईयां मिले
ये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिले

जिसको भी देखिए वो अधूरा सा है यहां
जैसे कहीं होगा वो आधा रखा हुआ

जो जब जहां जुड़े वहीं जुदाईयां मिले
ये कैसी भीड़ है बस यहां तन्हाईयां मिले

चूड़ियां...

कोयल कूकती है बहारों में कहीं
रूह भी जाग उठती है मज़ारों से कहीं
नैनों का तब आता है मौसम
बातें होती है इशारों में कहीं

और पापा की बेटी हो जाती है पराई
चूड़ियां खनकती है बाज़ारों में कहीं

वो शख़्स जो होए निसार तुम पर
होता है एक वो हज़ारों में कहीं...


-पुनीत भारद्वाज

भटकती सांसे...



सांस लो तो धुंआ निगलती हैं सांसे
अंगारों के आगोश में ऐसे पलती हैं सांसे

सांस छोड़ों तो धुंआ उगलती हैं सांसे
धुंएं के धागों पे जैसे चलती है सांसे


हर सांस के साथ सीने में अटकती हैं सांसे
इस अवारा शहर की आबो-हवा में बेसबब भटकती है सांसे


भागती हुई ज़िंदगियां रौंदती है ये सांसे
बसों में, सड़कों पर नंगे पांव दौड़ती है ये सांसे

अब तो इस क़ातिल शहर की बदनाम सड़कों पर
ज़हर पीने की आदत सी हो गई है

अब तो इस जानलेवा शहर में
जीने की आदत सी हो गई है




-पुनीत भारद्वाज

ये शहर ....








दुप्पटों ने अब लहराना बंद कर दिया है

हवाओं ने अब गुनगुनाना बंद कर दिया है

जब से जला है ये शहर

चांद ने मुस्कराना बंद कर दिया है


साहिल पर अब भी लौटती हैं लहरें

लोगों ने अब रेत के मकान बनाना बंद कर दिया है

जब से लुटी है मुन्नी की अस्मत

मां ने कहानी सुनाना बंद कर दिया है


मुंड़ेर पर अब भी बैठती है चिड़िया

हमने उन्हें दाना खिलाना बंद कर दिया है

जब से धोखा दिया अपनों ने

यारों ने शर्त लगाना बंद कर दिया है


बच्चे अब भी बागों मे खेलते हैं

उन्होंने भी दादी को मुंह चिड़ाना बंद कर दिया है

रात अब भी वैसी ही काली है

जुगनुओं ने टिमटिमाना बंद कर दिया


न जाने कैसा खौफ़नाक मंज़र था वो

यहां रिश्ते वही हैं

लोगों ने गले लगाना बंद कर दिया है


मैं चाहता था मांगूं ख़ुदा से

कुछ पल का सुकुं पर,
उसने भी अब आस्तिकों को
विश्वास दिलाना बंद कर दिया है


जब से जला है ये शहर

चांद ने मुस्कराना बंद कर दिया है ।



तुषार उप्रेती






ज़िंदगी की धूप में...


ज़िंदगी की धूप में झुलस गए हम
अब हमें इक किनारा ढूंढना होगा
उलझ गई है ज़िंदगी हमारी
सपना क्या है और सच कहां होगा ?


एक उम्मीद थी दिल में
'अपना' भी कोई 'अपना' होगा
कब तलक यूं ही राह तकेंगे हम उनकी
उनका भी तो कोई अपना होगा।


ख़ामोश ज़िंदगी, वक़्त की रफ़्तार
कौन अपना, कौन बेगाना होगा ?
बेवजह बह निकले भावनाओं के दरिया में
अब भंवर से बाहर निकलना होगा ।


सोच लिया है अब हमने,
एक भी आंसू ना बहाएंगे
जहां क़तरा-क़तरा आंसू के कर्ज़ चुकाएं
ज़िंदगी का किनारा वहां हम ढूंढ निकालेंगे...



- एंजेला अनिमा तिर्की