ये शहर कितना अजीब है...

















अजनबी शामें हैं, अजनबी रातें
अजनबी से किस्सें, अजनबी बातें
पता भी नहीं कुछ, ख़ता भी नहीं कुछ
हमदम है या रक़ीब है
ये शहर कितना अजीब है...

ख़्वाबों की झिलमिल राहें यहां
देखती, चौंकती, काटती निग़ाहें यहां
गले लगाती है या गला घोंटना चाहती है
ना जाने किस मकसद से फैली बाहें यहां

कहीं दौर है तूफ़ानों सा
कहीं दरिया सी रवानी है
भागती, रौंधती, रेंगती ज़िंदगानी है
क्या कहूं.. कहने को दो लब और लंबी सी कहानी है

हर रोज़ सुलाता है
जगाता है,
फिर से सुलाता है
अपनी ऊंगलियों पे नचाता है....
दादागीरी मनवाता है....
फिर भी पता भी नहीं है
और ख़ता भी नहीं है
हमदम है या रक़ीब है...
सच में.. ये शहर कितना अजीब है...

- पुनीत भारद्वाज

इक पगली लड़की के बिन...




















इक पगली लड़की के बिन*
कैसे काटूं अपने दिन
लंबी हो गई सारी रातें
बोलो कैसे इनको काटें
करते हैं कभी ख़ुद से बातें
और कभी तारें गिन-गिन..

इक पगली लड़की के बिन
कैसे काटूं अपने दिन....

सूरज-चंदा आएं-जाएं
तकते हैं सब तेरी राहें
इस उम्मीद में के तू आ जाए
बोलो भला हम क्या बतलाएं
पूछे जो मेरे पलछिन........

इक पगली लड़की के बिन
कैसे काटूं अपने दिन....

- पुनीत भारद्वाज
*ये लाइन कुमार विश्वास की कविता की एक लाइन से प्रेरित है

तू बस नज़र के सामने रहे...



















जब भी आंखें खोलूं तुझे देखूं
सोते-जागते तुझे ही सोचूं..
अब ना हम ये दूरियों का ग़म सहें
तू बस नज़र के सामने रहे....

दिन-रात बस एक ही काम हो
चाहे सुबह, चाहे शाम हो
भले चैन ना, आराम हो
लबों पे बस तेरा नाम हो
ज़ुबां खोलूं... तो खुशबू बहे...
तू बस नज़र के सामने रहे....

जब भी कोई आहट हो.. तो तेरी हो
हंसी हो, खिलाखिलाहट हो.. बस तेरी हो
हर लम्हा तेरी आरज़ू में कटे,
और भी कोई चाहत हो.. तो बस तेरी हो...
इससे ज्यादा ना कुछ दिल मांगे
इससे आगे ना कुछ लब कहे.....
तू बस नज़र के सामने रहे....

- पुनीत भारद्वाज

ख़्वाब...









कल शब ख़्वाबों को टिमटिमाते देखा
गीता-कुरान को इक-दूजे से हाथ मिलाते देखा..

मंदिर के आसन पर बैठा था इक नमाज़ी
मस्जिद के द्वारे इक पुजारी को जाते देखा...

गली से गुज़र रहा था इक मस्त-कलंदर
बच्चों की भीड़ में ख़ुद को खिलखिलाते देखा...

होटलों के बाहर भूख से लड़ते भिखारी
होटलों के अंदर जिस्मों को आज़माते देखा....
- पुनीत भारद्वाज

हर रंग में उमंग है.... होली प्रोमो




हर रंग में उमंग है

हर रंग में तरंग है

रंगों भरी होली में..

हर तरफ़ हुड़दंग है

और जब इस हुड़दंग में

मिल जाए दिलों की मस्ती

तब भूलकर हर गिले-शिक़वे

रंगों में डूब जाए हर हस्ती..

आओ बिखेरे प्यार के रंग

मनाए होली इक-दूजे के संग...

- पुनीत भारद्वाज

मुआं कहीं का...


अजब सा मर्ज़ है.. ना दवा लगती है, ना दुआ....
ये दिल साला ख़ुदगर्ज़ है, ना जाने इसे क्या हुआ...

आवारा राहों पे निकल पड़ता है
खुद-ब-खुद ही चलता है
दिमाग से हरदम लड़ता है
बेबाक है, अल्हड़ है, बावला है मुआं....

ख्वाबों की खान है
असलियत से अंजान है
खुराफाती है, मगर इंसान है
जब जलता है तो छोड़ता है धुआं...

अजब सा मर्ज़ है.. ना दवा लगती है, ना दुआ....
ये दिल साला ख़ुदगर्ज़ है, ना जाने इसे क्या हुआ...

- पुनीत भारद्वाज

ख़ामोशी..


कहने को कुछ नहीं तो क्या ज़ेहन तो ज़िंदा है..
लब ख़ामोश हैं लेकिन धड़कनें ताबिंदा (रोशन) है..

अब तो सवाल भी पैदा नहीं होते सीने में,
कुछ जवाब हैं दिल में जो अब तक शर्मिंदा है...

- पुनीत भारद्वाज

ऐ मेरे वतन के लोगों....


ऐ मेरे वतन के लोगों.. ज़रा जी भर जी लो जवानी..
जो शहीद हुए है उनकी.. भाड़ में जाए कुर्बानी.....

- पुनीत भारद्वाज
(A comment on today's generation including me)

दिल का धागा बांध रे...













धर्म-धागे बांधे रे बंधु
दिल का धागा बांध रे
गा ले प्रेम राग रे.....

हर सुबह तू जागे रे बंधु
अब तो सचमुच जाग रे
ख़ुद से ना तू भाग रे.....

पोथी-पत्रा बांचे रे बंधु
थोड़ा भीतर झांक रे
छत पे बोले काग रे......

काबा-कलिसा जावे रे बंधु
रब तो तोरे पास रे
करले पूरी प्यास रे.......

तेज़ सबसे भागे रे बंधु
चल तू सबके साथ रे
थामके हाथ रे

धर्म-धागे बांधे रे बंधु
दिल का धागा बांध रे
गा ले प्रेम राग रे.....

"है ख़ुदा तो है मज़हब
मज़हब से ही मंदिर-मस्जिद
मंदिर-मस्जिद में होते झगड़े
झगड़े भी तगड़े-तगड़े...

इक ख़ुदा के फेर में क्यूं खुद है रोता
ना होता ख़ुदा तो तू ख़ुदा होता....."

- पुनीत भारद्वाज
(मिर्ज़ा ग़ालिब के क़लाम से प्रेरित)

चाहतें तमाम हैं...



















चाहतें तमाम हैं, कभी सब्र तो हो...
ये कौन सा मुक़ाम है, कोई ख़बर तो हो..

यूं तो रोज़ उठते हैं ये हाथ मगर....
बस दुआ देना इनका काम है, कभी असर तो हो..

मुद्दतों रहे हैं इंसानों के बीच.....
यहां कौन इंसान है, कोई ज़िक्र तो हो..

- पुनीत भारद्वाज

हसरत की उड़ान...


















साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है
सागर के आंचल में सूरज ने झपकी ली है.....

एक हाथ तो बढ़ाओ, आसमां पे फल लटक गए हैं
अपनी भूख मिटाओ, तारों के झुंड जो पक गए हैं
ये स्वाद में मीठे होंगे, ये बात तो पक्की ही है

साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है....


पेड़ों के पत्तों पे, किसने ये कोहरा बिखेरा
झूमते फूलों पे, ये रंग है किसने फेरा
ये कैसा करिश्मा है, ये बात गज़ब की है

साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है....


वो पंछी अपने घर से फिर से निकल पड़े हैं
हम भी उड़े आसमान में, क्यों सोच में पड़े हैं
ख्वाहिशों को पंख लगाएं, ये उड़ान हसरत की है

साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है
सागर के आंचल में सूरज ने झपकी ली है....

- पुनीत भारद्वाज

इक कारवां खड़ा है...





















किस ग़म का मुलम्मा (परत) चढ़ा है,
कौन कम्बख़्त है जो पीछे पड़ा है।
चलो किसी रोज़ हवा से खेल लें,
इन कंक्रीट के जंगलों में जीना मुश्क़िल बड़ा है...

बूंदों की सोहबत में बहे,
बादलों के कंधों पे चढ़े,
कुदरत के रंगों में नहाए,
चांद के साए में जुगनूओं सा टिमटिमाएं
कदम बढ़ाओ, इक कारवां खड़ा है.....
- पुनीत भारद्वाज

मंज़िलें....


रात-रात भर ढूंढते हैं हम
एक आशियाना और एक रहगुज़र


हम तो चल दिए आंखों में लिए
ख़्वाबों का एक लंबा सफ़र


" ख़ून में हरारत जिस्म में जान बाकी है
चंद लाल क़तरों में अभी कितने तूफ़ान बाकी है
हर हद तक करले ऐ वक़्त तू जितना भी सितम
हौसला अभी ज़िंदा है, अभी ख़ून भी है ग़रम
ऐ मौत ठहर थोड़ा इंतज़ार करले

अभी तो ज़िंदगी में बहोत काम बाकी हैं......"



अकेले थे हम, अकेले चल दिए
ख़ुद ही राही और ख़ुद ही हमसफ़र


हमने थाम ली डोर प्यार की
प्यार में ही अब कटेगा हर पहर..



मानते हैं ये के है कठिन डगर
हौसलों से ऊंची पर नहीं मगर
कट ही जाएगी, मिट ही जाएगी
दूरियां ये.. तू कुछ कर गुज़र......


-पुनीत भारद्वाज



जिंदगी का कैनवास...


तरह-तरह के रंग उकेरें,
तो रचा जिंदगी का कैनवास...

कांटें-गुलशन सभी से यारी,
कभी महुआ, कभी पलाश...

हर पल में है कितनी हलचल,
कैसे समेटूं सब एहसास...

इतने किस्से, कितनी यादें,
कुछ हैं खट्टी, कुछ हैं खास..
- पुनीत भारद्वाज

मुझे इतिहास बनाने दो...

















इतिहास ओढ़ते हो, इतिहास बोलते हो...
गढ़े-मुर्दे उखाड़ते हो, किताबों-इबारतों से
सिर्फ़ तारीख़ें खंगालते हो...


जो बीत चुका है उसे
अब बीत भी जाने दो,
मुझे आज में आने दो ...
जानिबे-मंज़िल एक क़दम तो बढ़ाने दो...


इतिहास से मत डराओ मुझे इतिहास बनाने दो....



-पुनीत भारद्वाज
(पाश से प्रेरित कविता)

आज़ादी आतंकवाद के ख़िलाफ़....

    • ये एक न्यूज़ फ़ीचर है जो मैने आज़ादी की 61वीं सालगिरह पर लाइव इंडिया चैनल के लिए बनाया...





15 अगस्त 1947..

वो ऐतिहासिक दिन..
जब हमें आज़ादी मिली।।



आज़ादी कुछ कहने की..

आज़ादी अत्याचार ना सहने की..

आज़ादी हिंदुस्तान में कहीं भी रहने की..

आज़ादी खुली हवा में सांस लेने की...



मगर अब.......



हर तरफ़ ख़ून है, लाशें हैं...बर्बादी है....


ज़रा सोचिए क्या हमें जीने की आज़ादी है....





- पुनीत भारद्वाज

बाय बाय MJ


माइकल जैक्सन का जाना......


आज सुबह कुछ धुनें कान में बजने लगीं...कुछ साज़ न चाहते हुए भी खामोश से बैठे थे...मैंने पूछा तो बोले “भाई माइकल जैक्सन ने हमेशा के लिये गुडबाय कह दिया है”.....माइकल जैक्सन का यूं जाना एक पूरी सदी के खत्म होने जैसा है....संगीत की एक पूरी सदी जो माइकल के संगीत को सुनकर बड़ी हुई और जिसने दुनिया को ब्लैक एंड वाइट का जामा पहनते-निकालते देखा वो आज सुबह सुबह ही रो पड़ी.....दिल्ली में गर्मी से लोग जल रहे थे....और मुंबई में बारिश से लोग रो रहे थे....किसी के पास ज्यादा वक्त नहीं था....किसी ने गाली दी...कहा “अच्छा हुआ साला मर गया...बच्चों को नहीं छोडा इसने”....किसी को माइकल की याद में रुलाई आ गई.....तो कोई इन सबसे परे टीवी पर मेरी तरह न्यूज के जरिये सुबह की पहली सच्चाई जान रहा था कि माइकल जैक्सन खत्म हो गया......किसी का बैड बॉय ..किसी का गुड बाय.....पर हर शख्स के पास एक राय जरुर थी, उस शख्स के बारे में जिसने आधी सदी तक संगीत को जिया....और जिसके संगीत को हम सबने अपने बचपने में...लडक्पन में पिया....ये आदमी कुछ खास था...ये चांद पर नहीं गया पर इसकी ख्याति चांद के पार तक जाती है....इसने चांद को ज़मीन पर लाकर लोगों को मून-वॉक करना सीखाया....मुझे याद है स्कूल में मेरा दोस्त हर जगह माइकल के इस अंदाज़ की नकल किया करता था और लोग उसकी इस अदा पर ताली पिटा करते थे...न जाने कितने आये और कितने निपट गये पर माइकल की थ्रिलर एल्बम का रिकार्ड फेवीकॉल की तरह वहीं ऊंचा पर जमा रहा…..आज सब के सब मायूस थे...सिर्फ वो फूल मुस्करा रहे थे जो मरने के बाद माइकल के सबसे ज्यादा नज़दीक थे...अलविदा दोस्त...


तुषार उप्रेती

हम मेहनतक़श हैं...



दौलत का शजर* हमेशा हरा नहीं होता, * पेड़

कभी क़िस्मत पर किसी का पहरा नहीं होता,

हम मेहनतक़श हैं, मिट्टी में भी सोना उगा देंगे,

मुक्क़मल मुसाफ़िरों के लिए सहरा, सहरा* नहीं होता। *रेगिस्तान

- पुनीत भारद्वाज

साक़ी पिलाए जा....














साक़ी पिलाए जा बेशक़ शाम हो जाए
जो होना है आज वो अंजाम हो जाए

मयक़शी के दौर सरे-आम हो जाए
शहर के रिंदों में अपना भी नाम हो जाए

क़हक़शाओं को छू आऊं, ग़ुरबत के ग़म भूल जाऊं
जितनी भी हसरतें हैं सब तमाम हो जाए


- पुनीत भारद्वाज

फिर दीदार नहीं होता...


सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता
पांच साल के बाद फिर तो आना ही होगा
गली-गली हर द्वार-द्वार पे जाना ही होगा
वोट मांगोगे हम देंगे, ये हर बार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता....
















माना भोली जनता है पर सब जानती है पब्लिक
तख़्ते ढ़ह जाते हैं जब कुछ ठानती है पब्लिक
ना तोप से कम, ना एटम बम
वोटों से घातक और कोई हथियार नहीं होता
सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता.......

हाथ, कमल और हाथी सबके सब हैं पूरे खोटे
मौक़ापरस्त हैं सबके सब चाहे बड़े-मझौले-छोटे
गठबंधन से देश का बेड़ा पार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता...
सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता.....
- पुनीत भारद्वाज
(कार्टून अभिषेक के हैं जो गूगल के ज़रिए लिए गए हैं)