
ये शहर कितना अजीब है...

इक पगली लड़की के बिन...

तू बस नज़र के सामने रहे...

ख़्वाब...

हर रंग में उमंग है.... होली प्रोमो
हर रंग में उमंग है
हर रंग में तरंग है
रंगों भरी होली में..
हर तरफ़ हुड़दंग है
और जब इस हुड़दंग में
मिल जाए दिलों की मस्ती
तब भूलकर हर गिले-शिक़वे
रंगों में डूब जाए हर हस्ती..
आओ बिखेरे प्यार के रंग
मनाए होली इक-दूजे के संग...
- पुनीत भारद्वाज
मुआं कहीं का...
ख़ामोशी..

ऐ मेरे वतन के लोगों....

दिल का धागा बांध रे...

"है ख़ुदा तो है मज़हबमज़हब से ही मंदिर-मस्जिदमंदिर-मस्जिद में होते झगड़ेझगड़े भी तगड़े-तगड़े...इक ख़ुदा के फेर में क्यूं खुद है रोताना होता ख़ुदा तो तू ख़ुदा होता....."
चाहतें तमाम हैं...
हसरत की उड़ान...

साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है
सागर के आंचल में सूरज ने झपकी ली है.....
एक हाथ तो बढ़ाओ, आसमां पे फल लटक गए हैं
अपनी भूख मिटाओ, तारों के झुंड जो पक गए हैं
ये स्वाद में मीठे होंगे, ये बात तो पक्की ही है
साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है....
पेड़ों के पत्तों पे, किसने ये कोहरा बिखेरा
झूमते फूलों पे, ये रंग है किसने फेरा
ये कैसा करिश्मा है, ये बात गज़ब की है
साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है....
वो पंछी अपने घर से फिर से निकल पड़े हैं
हम भी उड़े आसमान में, क्यों सोच में पड़े हैं
ख्वाहिशों को पंख लगाएं, ये उड़ान हसरत की है
साहिल के कंधों पे लहरों ने थपकी दी है
सागर के आंचल में सूरज ने झपकी ली है....
इक कारवां खड़ा है...

बूंदों की सोहबत में बहे,
बादलों के कंधों पे चढ़े,
चांद के साए में जुगनूओं सा टिमटिमाएं
मंज़िलें....

" ख़ून में हरारत जिस्म में जान बाकी है
चंद लाल क़तरों में अभी कितने तूफ़ान बाकी है
हर हद तक करले ऐ वक़्त तू जितना भी सितम
हौसला अभी ज़िंदा है, अभी ख़ून भी है ग़रम
ऐ मौत ठहर थोड़ा इंतज़ार करलेअभी तो ज़िंदगी में बहोत काम बाकी हैं......"
हौसलों से ऊंची पर नहीं मगर
कट ही जाएगी, मिट ही जाएगी
दूरियां ये.. तू कुछ कर गुज़र......
जिंदगी का कैनवास...

तो रचा जिंदगी का कैनवास...
कांटें-गुलशन सभी से यारी,
कभी महुआ, कभी पलाश...
हर पल में है कितनी हलचल,
कैसे समेटूं सब एहसास...
इतने किस्से, कितनी यादें,
कुछ हैं खट्टी, कुछ हैं खास..
मुझे इतिहास बनाने दो...

इतिहास ओढ़ते हो, इतिहास बोलते हो...
गढ़े-मुर्दे उखाड़ते हो, किताबों-इबारतों से
सिर्फ़ तारीख़ें खंगालते हो...
जो बीत चुका है उसे
अब बीत भी जाने दो,
मुझे आज में आने दो ...
जानिबे-मंज़िल एक क़दम तो बढ़ाने दो...
इतिहास से मत डराओ मुझे इतिहास बनाने दो....
आज़ादी आतंकवाद के ख़िलाफ़....
- ये एक न्यूज़ फ़ीचर है जो मैने आज़ादी की 61वीं सालगिरह पर लाइव इंडिया चैनल के लिए बनाया...
वो ऐतिहासिक दिन..
जब हमें आज़ादी मिली।।
आज़ादी कुछ कहने की..
आज़ादी अत्याचार ना सहने की..
आज़ादी हिंदुस्तान में कहीं भी रहने की..
आज़ादी खुली हवा में सांस लेने की...
मगर अब.......
हर तरफ़ ख़ून है, लाशें हैं...बर्बादी है....
ज़रा सोचिए क्या हमें जीने की आज़ादी है....
बाय बाय MJ

माइकल जैक्सन का जाना......
आज सुबह कुछ धुनें कान में बजने लगीं...कुछ साज़ न चाहते हुए भी खामोश से बैठे थे...मैंने पूछा तो बोले “भाई माइकल जैक्सन ने हमेशा के लिये गुडबाय कह दिया है”.....माइकल जैक्सन का यूं जाना एक पूरी सदी के खत्म होने जैसा है....संगीत की एक पूरी सदी जो माइकल के संगीत को सुनकर बड़ी हुई और जिसने दुनिया को ब्लैक एंड वाइट का जामा पहनते-निकालते देखा वो आज सुबह सुबह ही रो पड़ी.....दिल्ली में गर्मी से लोग जल रहे थे....और मुंबई में बारिश से लोग रो रहे थे....किसी के पास ज्यादा वक्त नहीं था....किसी ने गाली दी...कहा “अच्छा हुआ साला मर गया...बच्चों को नहीं छोडा इसने”....किसी को माइकल की याद में रुलाई आ गई.....तो कोई इन सबसे परे टीवी पर मेरी तरह न्यूज के जरिये सुबह की पहली सच्चाई जान रहा था कि माइकल जैक्सन खत्म हो गया......किसी का बैड बॉय ..किसी का गुड बाय.....पर हर शख्स के पास एक राय जरुर थी, उस शख्स के बारे में जिसने आधी सदी तक संगीत को जिया....और जिसके संगीत को हम सबने अपने बचपने में...लडक्पन में पिया....ये आदमी कुछ खास था...ये चांद पर नहीं गया पर इसकी ख्याति चांद के पार तक जाती है....इसने चांद को ज़मीन पर लाकर लोगों को मून-वॉक करना सीखाया....मुझे याद है स्कूल में मेरा दोस्त हर जगह माइकल के इस अंदाज़ की नकल किया करता था और लोग उसकी इस अदा पर ताली पिटा करते थे...न जाने कितने आये और कितने निपट गये पर माइकल की थ्रिलर एल्बम का रिकार्ड फेवीकॉल की तरह वहीं ऊंचा पर जमा रहा…..आज सब के सब मायूस थे...सिर्फ वो फूल मुस्करा रहे थे जो मरने के बाद माइकल के सबसे ज्यादा नज़दीक थे...अलविदा दोस्त...
तुषार उप्रेती
हम मेहनतक़श हैं...

दौलत का शजर* हमेशा हरा नहीं होता, * पेड़
कभी क़िस्मत पर किसी का पहरा नहीं होता,
हम मेहनतक़श हैं, मिट्टी में भी सोना उगा देंगे,
मुक्क़मल मुसाफ़िरों के लिए सहरा, सहरा* नहीं होता। *रेगिस्तान
- पुनीत भारद्वाज
साक़ी पिलाए जा....

साक़ी पिलाए जा बेशक़ शाम हो जाए
जो होना है आज वो अंजाम हो जाए
मयक़शी के दौर सरे-आम हो जाए
शहर के रिंदों में अपना भी नाम हो जाए
क़हक़शाओं को छू आऊं, ग़ुरबत के ग़म भूल जाऊं
जितनी भी हसरतें हैं सब तमाम हो जाए
फिर दीदार नहीं होता...

जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता
पांच साल के बाद फिर तो आना ही होगा
गली-गली हर द्वार-द्वार पे जाना ही होगा
वोट मांगोगे हम देंगे, ये हर बार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता....
हाथ, कमल और हाथी सबके सब हैं पूरे खोटे
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता...

