आसमान



















मुझे नफ़रत है ऊंची-ऊंची इमारतों से....
कम्बख़्त मेरे और मेरे आसमान के बीच आ जाती हैं....

काश ऐसी भी कोई जगह होती....
जहां सिर्फ मैं होता,
इक क्षितिज होता,
बारिश होती, खुली हवाएं होती और दूर तक फैला आसमान होता...

जहां तक मेरी निग़ाहें जाती...
वहां तक जाने का मेरा भी अरमान होता ...

- पुनीत भारद्वाज

2 टिप्‍पणियां:

Rama Kataria ने कहा…

I was too disappointed with myself today for not finishing my work according to the deadline I set for myself. Even worse, I'm still not doing it, toooo lazy.
and u know better what I do when I'm upset. I turn to your blog.
and it gives me respite, I forget everything!!!!

infact, I was chatting with a friend of mine online when he asked me what am I doing?
and I did the translation of this poem of yours for him as well!
Poor him, don't know Hindi.

I have one complain though!
I wonder how can people stop writing when they know their work has power to uplift the spirits of many people?!

Puneet Bhardwaj ने कहा…

आजकल ज़िंदगी को एक नई दिशा देने में मशरूफ़ हूं। जिस दिन लगेगा कि ज़िंदगी को नई दिशा मिल गई है, उस दिन से फिर से इस ब्लॉग पर लिखा करूंगा। और सबसे पहले तुम्हें बताऊंगा।