बाय बाय MJ


माइकल जैक्सन का जाना......


आज सुबह कुछ धुनें कान में बजने लगीं...कुछ साज़ न चाहते हुए भी खामोश से बैठे थे...मैंने पूछा तो बोले “भाई माइकल जैक्सन ने हमेशा के लिये गुडबाय कह दिया है”.....माइकल जैक्सन का यूं जाना एक पूरी सदी के खत्म होने जैसा है....संगीत की एक पूरी सदी जो माइकल के संगीत को सुनकर बड़ी हुई और जिसने दुनिया को ब्लैक एंड वाइट का जामा पहनते-निकालते देखा वो आज सुबह सुबह ही रो पड़ी.....दिल्ली में गर्मी से लोग जल रहे थे....और मुंबई में बारिश से लोग रो रहे थे....किसी के पास ज्यादा वक्त नहीं था....किसी ने गाली दी...कहा “अच्छा हुआ साला मर गया...बच्चों को नहीं छोडा इसने”....किसी को माइकल की याद में रुलाई आ गई.....तो कोई इन सबसे परे टीवी पर मेरी तरह न्यूज के जरिये सुबह की पहली सच्चाई जान रहा था कि माइकल जैक्सन खत्म हो गया......किसी का बैड बॉय ..किसी का गुड बाय.....पर हर शख्स के पास एक राय जरुर थी, उस शख्स के बारे में जिसने आधी सदी तक संगीत को जिया....और जिसके संगीत को हम सबने अपने बचपने में...लडक्पन में पिया....ये आदमी कुछ खास था...ये चांद पर नहीं गया पर इसकी ख्याति चांद के पार तक जाती है....इसने चांद को ज़मीन पर लाकर लोगों को मून-वॉक करना सीखाया....मुझे याद है स्कूल में मेरा दोस्त हर जगह माइकल के इस अंदाज़ की नकल किया करता था और लोग उसकी इस अदा पर ताली पिटा करते थे...न जाने कितने आये और कितने निपट गये पर माइकल की थ्रिलर एल्बम का रिकार्ड फेवीकॉल की तरह वहीं ऊंचा पर जमा रहा…..आज सब के सब मायूस थे...सिर्फ वो फूल मुस्करा रहे थे जो मरने के बाद माइकल के सबसे ज्यादा नज़दीक थे...अलविदा दोस्त...


तुषार उप्रेती

हम मेहनतक़श हैं...



दौलत का शज़र हमेशा हरा नहीं होता,

कभी क़िस्मत पर किसी का पहरा नहीं होता,

हम मेहनतक़श हैं, मिट्टी में भी सोना उगा देंगे,

मुक्क़मल मुसाफ़िरों के लिए सहरा, सहरा नहीं होता।

- पुनीत भारद्वाज

अब तो सावन ऐसा आए..
















सावन की पहली बूंदों में
दिल्ली सारी धुल गई है
बस दिलों में मैल बाकी है
कम्बख़्त बारिश ये क्यों भूल गई है



















अब तो सावन ऐसा आए
जो दिलों की गर्द को धोके जाए

हर शाख़-शग़ूफ़ा यूं खिल जाए
के रोता चेहरा भी मुस्काए...




























अब तो सावन ऐसा आए
के रंज दिलों में रह न पाए

हर सूखा दरिया फिर भर जाए
और कोई न प्यासा कहलाए

अब तो सावन ऐसा आए......

साक़ी पिलाए जा....














साक़ी पिलाए जा बेशक़ शाम हो जाए
जो होना है आज वो अंजाम हो जाए

मयक़शी के दौर सरे-आम हो जाए
शहर के रिंदों में अपना भी नाम हो जाए

क़हक़शाओं को छू आऊं, ग़ुरबत के ग़म भूल जाऊं
जितनी भी हसरतें हैं सब तमाम हो जाए


- पुनीत भारद्वाज

फिर दीदार नहीं होता...


सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता
पांच साल के बाद फिर तो आना ही होगा
गली-गली हर द्वार-द्वार पे जाना ही होगा
वोट मांगोगे हम देंगे, ये हर बार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता....
















माना भोली जनता है पर सब जानती है पब्लिक
तख़्ते ढ़ह जाते हैं जब कुछ ठानती है पब्लिक
ना तोप से कम, ना एटम बम
वोटों से घातक और कोई हथियार नहीं होता
सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता.......

हाथ, कमल और हाथी सबके सब हैं पूरे खोटे
मौक़ापरस्त हैं सबके सब चाहे बड़े-मझौले-छोटे
गठबंधन से देश का बेड़ा पार नहीं होता
जनता के रखवालों का एतबार नहीं होता...
सत्ता पा जाने पे फिर दीदार नहीं होता.....
- पुनीत भारद्वाज
(कार्टून अभिषेक के हैं जो गूगल के ज़रिए लिए गए हैं)

इक उम्मीद...
























इक उम्मीद पे टिका है सारा जहां
उम्मीद है तो फिर है अंत कहां

उम्मीद है तो नींदों में ख़्वाबों का बसेरा है
उम्मीद के साथ कुछ ढूंढने निकलो तो पूरा संसार तेरा है

ग़र उम्मीद है तो कैसी भी कोई भी हद नहीं
ग़र उम्मीद है तो आसमां से आगे भी सरहद नहीं

उम्मीद पाने से पहले, उम्मीद खोने के बाद भी
उम्मीद हर मुस्कान में, उम्मीद रोने के साथ भी

उम्मीद है तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है
वो होगा नहीं नाउम्मीद कभी जिसे ख़ुद पे यकीं है

इक उम्मीद से हर दिन नया सूरज निकलता है
उम्मीद से धरती घूमती है, रात दिन में बदलता है
और उम्मीद से ही काले-स्याह आसमान में चांद भी आगे चलता है

क्योंकि इक उम्मीद पे टिका है सारा जहां
उम्मीद है तो फिर है अंत कहां

- पुनीत भारद्वाज

ज़िंदगी के मायने....


ज़िंदगी इक अजब तमाशा है

कभी नीम सी कड़वी

कभी मीठा बताशा है.......



कभी ज़ालिम है, ज़हर है, क़हर है ज़िंदगी

तो कभी इक सुनहरी सहर है ज़िंदगी



होंठों पे दबी हंसी सी है

पलकों में छिपी नमी सी है....

ज़िंदगी कहो तो एक दुआ-सलाम भी है


हिंदु की राम-राम, मियां का असलाम भी है



और कहते हैं ज़िंदगी जीने का नाम भी है

मगर ज़िंदगी वो इक नाम भी है

जिसके संग ज़िंदगी गुज़ार सकें

वो शख़्स भी आपकी ज़िंदगी ही है
जो आपकी ज़िंदगी संवार सके...




- पुनीत भारद्वाज


हौसला अभी ज़िंदा है.....



ख़ून में हरारत, जिस्म में जान बाकी है
चंद लाल क़तरों में अभी कितने तूफ़ान बाकी है...


हर हद तक करले ऐ वक़्त तू जितना भी सितम
हौसला अभी ज़िंदा है, अभी ख़ून भी है गरम


ऐ मौत ठहर थोड़ा इंतज़ार करले
अभी तो ज़िंदगी में बहुत काम बाकी है....


- पुनीत भारद्वाज

तूफ़ानों से अपनी यारी है......



ज़िंदगी तूफ़ानों में बीती सारी है
अब तो तूफ़ानों से अपनी यारी है



बारहा* डूबते-डूबते बचे हैं * बार-बार
बारहा मौजों में क़श्ती उतारी है

अब तो तूफ़ानों से अपनी यारी है...



आसमां तो फिर भी आसमां है
अब तो आसमां से भी आगे जाने की तैयारी है
अब तो तूफ़ानों से अपनी यारी है.....



जिसे चाहे अपना बना लें,
जिसे चाहे दिल से लगा लें,
इसे मेरा जुनून समझो या समझो कोई बीमारी है..

ज़िंदगी तूफ़ानों में बीती सारी है
अब तो तूफ़ानों से अपनी यारी है.............




-पुनीत भारद्वाज


अब कौन बनाए मंदिर-मस्जिद.....


"मंदिर-मस्जिद कौन बनाए
खड़ा करे कौन सवाल नया
मंदिर-मस्जिद में चैन अभी है
कौन करे बवाल नया"

मगर इक मूरत अपने ख़ुदा की
हमने भी बना के रखी है
जो ज़ालिमों के चंगुल से
बचा के रखी है
ना मंदिर में मेरे प्रभु,
ना मस्जिद में मेरे अल्लाह
वो मूरत तो हमने सीने
में छुपा के रखी है
दिल से लगा के रखी है
ज़ालिमों से बचा के रखी है......
- पुनीत भारद्वाज

कैसी ये क़शमक़श है..

ज़ेहन में न जाने कितनी सिलवटें हैं,
हर शाख़ पर बस ख़्यालों की लटे हैं,
क्या लिखूं, क्यूं लिखूं, कैसे लिखूं.......
अजीब सी क़शमक़श है,
क़ाग़ज़ कोरे का कोरा है, जाने क्यूं आज
क़लम भी बेबस है...

- पुनीत भारद्वाज

बंदूकें इतनी बिक गई हैं बाज़ारों में...























आंखें बंद करता हूं तो बेज़ुबान अंधेरा नज़र आता है...
आंखें खोलता हूं तो ख़ौफ़ का चेहरा नज़र आता है

शहर की फ़िज़ाओं में रंजिशें कुछ यूं घुल गई हैं...
अब तो महकता गुलशन भी वीरान सहरा नज़र आता है..

बंदूकें इतनी बिक गई है बाज़ारों में..
के अब तो सांसों पे भी किसी का पहरा नज़र आता है...

- पुनीत भारद्वाज


हर रंग में उमंग है.... होली प्रोमो

video

हर रंग में उमंग है

हर रंग में तरंग है

रंगों भरी होली में..

हर तरफ़ हुड़दंग है

और जब इस हुड़दंग में

मिल जाए दिलों की मस्ती

तब भूलकर हर गिले-शिक़वे

रंगों में डूब जाए हर हस्ती..

आओ बिखेरे प्यार के रंग

मनाए होली इक-दूजे के संग...

- पुनीत भारद्वाज

नारी शक्ति को सलाम.... वूमंस-डे प्रोमो

video

वो ममता की मूरत है,

तो कभी एक लाडली बेटी...

एक आदर्श बहू होने के साथ,

वो बंधी है राखी की डोर से...

कभी वो कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ती है,

तो कभी उस अबला को रहना पड़ता है दहलीज़ की मर्यादाओं में...

नारी की शक्ति पर टिका है सारा जहान

नारी के इन सब रूपों को हमारा सलाम

- पुनीत भारद्वाज

मंज़िलें....


रात-रात भर ढूंढते हैं हम
एक आशियाना और एक रहगुज़र


हम तो चल दिए आंखों में लिए
ख़्वाबों का एक लंबा सफ़र


" ख़ून में हरारत जिस्म में जान बाकी है
चंद लाल क़तरों में अभी कितने तूफ़ान बाकी है
हर हद तक करले ऐ वक़्त तू जितना भी सितम
हौसला अभी ज़िंदा है, अभी ख़ून भी है ग़रम
ऐ मौत ठहर थोड़ा इंतज़ार करले

अभी तो ज़िंदगी में बहोत काम बाकी हैं......"



अकेले थे हम, अकेले चल दिए
ख़ुद ही राही और ख़ुद ही हमसफ़र


हमने थाम ली डोर प्यार की
प्यार में ही अब कटेगा हर पहर..



मानते हैं ये के है कठिन डगर
हौसलों से ऊंची पर नहीं मगर
कट ही जाएगी, मिट ही जाएगी
दूरियां ये.. तू कुछ कर गुज़र......


-पुनीत भारद्वाज



आगे लगे और धुंआ उठे.....


आग लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे


सांसों से सांसे छू जाए
बातों ही बातों में तूफ़ान चले

आग लगे तो इस तरह लगे.....


मेरी धड़कनें तेरी धड़कनों से टकराए
मेरी धड़कनें तेरी धड़कनें बन जाएँ
जज़्बातों का सिलसिला कुछ इस तरह चले
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे....


मेरी बातों में इतना असर हो
ना तुझे दिन में चैन मिले,
ना रात में बसर हो
लफ़्ज़ होंटों से गिरे और कोई जादू करे
आगे लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे....


वो पल के जिसमें जन्नत नसीब होती है
रूह जिस्मों से निकलकर ख़ुदा के क़रीब होती है
आओ उस एक पल को आबाद करें


आग लगे तो इस तरह लगे
के निग़ाहें मिले और धुंआ उठे......



- पुनीत भारद्वाज




ये दुनिया संभल भी सकती है......




हर रोज़ नज़ारा लगता है
हर शाम किनारा सजता है
कोई प्यार का मारा रोता है
कोई पेट से भूखा हंसता है

वो जेब से खाली है लेकिन
वो दिल का मालिक है लेकिन
पर इससे भी क्या होता है
हर रात वो भूखा सोता है

तुम जीयो और जीने भी दो
ये नारा अब बकवास हुआ
कब तक ऐसे ही सोचेंगे
क्यूं जीते-जी तू लाश हुआ

क्यूं नफ़रत से बर्बाद रहें
चलो प्यार से दिल आबाद करें
हर बंदिश से आज़ाद करें
इस दुनिया को शादाब* करें * हरा-भरा

ये आग भड़क भी सकती है
ये शोला भी बन सकती है
तू एक ज़रा हुंकार तो भर
कोई आंधी भी चल सकती है

कैसे हो, क्यों हो भूलो तुम
हर मुश्क़िल का हल ढूंढों तुम
जो रस्ते में थक जाएगा
तो कैसे मंज़िल पाएगा

अब तो दिल से तूफ़ान उठे
और भीतर का भगवान उठे
ये दुनिया संभल भी सकती है
जो तुझमे छिपा इंसान उठे....





- पुनीत भारद्वाज

ढ़ाई आखर



















प्यार,प्रेम, इश्क़ कभी करके तो देख
ढ़ाई आखरों का फ़लसफ़ा कभी पढ़के तो देख


कबसे बस साहिल पे खड़ा है
माना आग का दरिया है, इक बार उतरके तो देख


अभी तो तुमने बस मेरी मोहब्बत देखी है

गर इंतिहा-ए-इश्क़ देखनी है तो मुझसे लड़के तो देख

- पुनीत भारद्वाज

ये दिल्ली है.........




ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.....


इस शहर में अब दिल कहां बसते हैं
बस चेहरों की एक भीड़ है
और भीड़ में जिस्म रिसते हैं
दिलवालों का ये शहर अब दिलों को तोड़ता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है.......









कई ख़्वाब संजोए थे इन आंखों ने
मगर इस शहर के मंज़र ने वो सब ख़्वाब छीन लिए
बंजर इन आंखों ने टूटे ख़्वाबों के ढेर से
आधे-अधूरे से ख़्वाब फिर से बीन लिए
पहले ख़्वाब दिखाता है, फिर ख़्वाबों को रौंधता है
ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है

जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है...








इक आंचल था जिसे छोड़कर मैं इस शहर की गोद में आया था
किसी के गले से लिपटने के बाद
मैंने इस शहर को गले से लगाया था
मगर जिसे अपना समझा, वो तो धोखा दे गया
अपनो से दूर कर ये शहर एक झूठा सपना दे गया
इक मां-बेटे के रिश्ते को तोड़ता है....




ये दिल्ली है ये मेरी रगों में दौड़ता है
जितना आगे बढ़ो उतना पीछे छोड़ता है






- पुनीत भारद्वाज

बावरा मन.....SWANAND KIRKIRE

Song- बावरा मन...
Lyricist- स्वानंद किरकिरे
Singer- स्वानंद किरकिरे
Music- शांतुनु मोइत्रा
Film- हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी..
Director- सुधीर मिश्रा


बावरा मन देखने चला एक सपना
बावरा मन देखने चला एक सपना

बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरी सी धड़कनें हैं बावरी हैं सांसें
बावरी सी करवटों से निंदियां दूर भागे
बावरे से नैन चाहे.. बावरे झरोखों से..
बावरे नज़ारों को तकना
बावरा मन देखने चला एक सपना

बावरे से इस जहां में बावरा एक साथ हो
इस सयानी भीड़ में बस हाथों में तेरा हाथ हो
बावरी सी धुन हो कोई, बावरा एक राग हो
बावरी सी धुन हो कोई, बावरा एक राग हो
बावरे से पैर चाहें....बावरे तरानों के...
बावरे से बोल पे थिरकना....

बावरा मन देखने चला एक सपना

बावरा सा हो अंधेरा, बावरी ख़ामोशियां
बावरा सा हो अंधेरा, बावरी ख़ामोशियां
थरथराती लौ हो मद्धम, बावरी मदहोशियां
बावरा एक घूंघट चाहे...हौले-हौले बिन बताए...
बावरे से मुखड़े से सरकना..

बावरा मन देखने चला एक सपना