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फैशन का पैशन!



मधुर भंडारकर ने अपनी फिल्मों मे कहानी कहने का एक नया तरीका इजाद किया है....एक जमे जमाये माहौल में एक नये किरदार को फीट कर दीजिए...कहानी अपने आप आगे बढ़ जाएगी....चांदनी बार के माहौल में तब्बू को फीट किया गया...सत्ता के माहौल में रवीना टंडन को फीट किया... पेज थ्री के माहौल में कोंकणा को फीट किया गया...कॉरपोरेट के माहौल में बिपाशा को फीट किया गया.....सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल ऐसी फिल्म थी जिसमें सब कुछ पहले से तय था....और अब फैशन के माहौल में प्रियंका चोपड़ा को फिट किया गया...इन सारी फिल्मों मे नए किरदार के पुराने माहौल में फिट होने के बाद क्या क्या घटनाएं घटती हैं..इसी को मधुर भंडारकर अपनी फिल्मों मे आगे बढा़ते हैं...यहां गौर करने की बात ये भी है कि मधुर की फिल्मों मे सेट्रैंल कैरेक्टर ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं...जो कहीं न कहीं..कभी न कभी...शोषण का शिकार होती हैं...
अब बात करते हैं फैशन की...मधुर का रिसर्च तगड़ा है...लेकिन रिसर्च जब ज्यादा पक्का हो जाता है तो निर्देशक के सामने ये समस्या खड़ी हो जाती है कि क्या फिल्म में हो और क्या नहीं...फैशन की स्क्रिप्ट अच्छी है..लेकिन लंबी है.....
इसे मधुर की काबिलियत ही कहेंगे कि सारे किरदारों से उन्होंने काम ले लिया है..चाहे रोल छोटा हो या फिर लंबा...हर कोई फिल्म में सही जगह आता है और चला जाता है....तकनीकी तौर पर मधुर भंडारकर की ये सबसे पक्की फिल्म है...शाट्स सलेक्शन अच्छा है...बैकग्राउंड म्यूजिक में सलीम सुलेमान ने चक-दे वाली थीम को पकड़े रखा है...जहां तक एक्टिंग का सवाल है कंगना राणौत ने बाज़ी मारी है...उन पर तो वैसे भी गैंगस्टर और वो लम्हे करने के बाद बेवड़ी होने की जैसे छाप सी लग गई है...प्रियंका चोपड़ा का काम साधारण है जबकि कहानी उनके इर्द-गिर्द ही बुनी गई है...
हालाकि सारी फिल्म देखने के बाद एक भी ऐसा किरदार नहीं है..जो आपको याद रह जाये....फिल्हाल इतना ही कहेंगे कि फैशन में मधुर का पैशन तो दिखता ही है....


तुषार उप्रेती

ROCK ON...


कुछ किताबें जिंदगी में अधूरी छूट जाती हैं..वक्त की हवा के साथ जब भी उस किताब के पन्ने फड़फड़ाते हैं तो हर किसी को यही लगता है कि अगर उसने ये किताब पूरी पड़ी होती तो शायद आज कहानी कुछ और होती....बतौर निर्देशक अभिषेक कपूर ROCK ON से पहले आर्यन नाम से बॉक्सिंग पर एक फिल्म बना चुके हैं...उसका हाल क्या हुआ था...ये बताने की जरुरत नहीं...लेकिन इस बार जेसन वेस्ट के कमाल के कैमरा वर्क के साथ अभिषेक ने ROCK ON से एक नई जमीन तैयार की है...हॉलीवुड में रॉक की दिवानगी को लेकर कई फिल्में बनी हैं जिसमें JAck BlacK की कॉमेडी फिल्म School of ROck जैसी हलकी-फुलकी फिल्मों की भी लंबी कतार है...लेकिन मुंबईया इंडस्ट्री में 1960 के दशक से THE BEATLES और ROLLING STONES का असर दिखना शुरु हो गया था...ये रॉक बैंड अपने आप में कैसे क्रांतिकारी आंदोलन बन गये...इसे ROCK ON देखने का बाद ज्यादा समझा जा सकता है..क्योंकि ये पहली भारतीय फिल्म होगी जो रॉक के जुनून और उसके जोश की कहानी को आधार बना कर तैयार की गई है...चार दोस्त..रॉक का जुनून..जीत की भूख..कामयाबी का नशा..तकरार..प्यार..दोस्ती..फ्लैशबैक..औऱ भी न जाने कितने शब्द इस फिल्म की जमीन को तैयार करने में काम आये होंगे...लेकिन किसी भी फिल्म में निर्देशक के सपने को नई शक्ल देते हैं उसके अभिनेता...औऱ ROCK ON में ये काम किया है अर्जुन रामपाल(joe)..ल्युक कैनी(rob) ...पूरब कोहली(kd)...प्राची देसाई(sakshi)..शहाना गोस्वामी(debbie) और फरहान अख्तर ने...(aditya shroff)
हर किरदार यहां अपनी जिंदगी से लड़ रहा है Joe Mascarenhas(अर्जुन रामपाल) को सिर्फ गिटार बजाना आता है..और कुछ नहीं आता सिर्फ यही एक किरदार है जो पूरी फिल्म में शुरु से आखिर तक संघर्ष करता रहता है...संगीत के लिए..संगीत के साथ..वो सही मायनों में कलाकार है...बाकी सब अपनी जिंदगी से समझौता कर लेते हैं...ROB (ल्युक कैनी) एक संगीतकार के हाथ के नीचे काम करने लगता है...ADITYA (फरहान अख्तर) एक सफल बिजनैस मैन बन जाता है..तो वहीं KD( पूरब कोहली) अपने पिता की ही दुकान का नौकर हो जाता है...हर कोई एक खामोश जिंदगी जी रहा है...औऱ 10 साल पुरानी जिंदगी की परछाई से बाहर आना चाहता है...जब उनका एक बैंड था...अपना संगीत था..जिसका नाम MAGIK हुआ करता था...लेकिन फिल्म के तीन छुपे रुस्तम और हैं वो हैं इसके संगीतकार..शंकर एहसान औऱ लॉय जिन्होंने रॉक की नब्ज़ को भारतीय क्लेवर में बखूबी ढ़ाला है...इसके अलावा दीपा भाटिया की एडिटिंग भी कमाल है...इस फिल्म को देखने के बाद लगा कि 1960 --से 2008 तक यानी पूरे चालीस सालों का वक्त लगा रॉक को हिंदुस्तानी फिल्म में ढ़लने के लिए...बात सिर्फ इतनी है कि कहानियां बहुत हैं पर जोखिम उठाना हर किसी के बस की बात नहीं..बतौर निर्माता औऱ कलाकार फरहान अख्तर इसमें कामयाब हुए हैं...अब उन्हें औऱ अभिषेक को कोई फिसड्डी नहीं कहेगा...



तुषार उप्रेती

सफर एक कहानियां तीन....मीनाक्षी..


बतौर चित्रकार एम.एफ हुसैन ने अपनी कूची से कई चित्र बनाए हैं...उन्हें समझना बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी मजदूर की कूची से पुती दिवार में चित्रकारी ढूंढना...लेकिन हुसैन की चित्रकारी की तरह ही उनकी फिल्म मीनाक्षी में भी कुछ बात जरुर है..जो लंबे समय तक फिल्म से बांधे रखती है..रंगों का खेल सिनेमाई कैनवस पर उन्होंने बखूबी किया है..संतोष सीवन ने बतौर सिनेमाटोग्राफर इसमें उनका बखूबी साथ दिया है.. हर दृश्य अपने आप में नई पेंटिंग सा लगता है... हुसैन ने रेगिस्तान से लेकर प्राग तक अपने अनुभव का उम्दा इस्तेमाल किया है.
हर शहर की अपनी दास्तान होती है..जहां किरदार भी लगभग वैसे ही होते हैं..बदलते हैं तो सिर्फ चेहरे..ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि आजकल समस्याएं ग्लोबल हो गई हैं जिसने हर जगह के लोकलाइट को अपनी पकड़ में ले रखा है..जैसे शहर अलग-अलग हैं पर अकेलापन वही है..
इस फिल्म में लेखक रघुवीर यादव से लेकर, मीनाक्षी तब्बू और कार मैकेनिक कुणाल कपूर तक सभी की एक ही समस्या है अकेलापन..लेखक सोचता है कि उसकी कहानी में किरदार अब बासी हो चुके हैं..इसलिए वो एक ऐसी कहानी तलाशता है जिसमें कुछ नयापन हो..मुलाकात होती है इत्र बेचने वाली तब्बू से..जो अपनी जिंदगी को इतना दिलचस्प समझती है कि उसके मुताबिक उसका जीवन लेखक के लिए उपन्यास लिखने का एक सब्जेक्ट हो सकता है..दूसरी तरफ मैकेनिक मियां हैं जो बचपन के थपेड़ों से अब तक उबर नहीं पाये हैं..बनना चाहते थे म्यूज़िशियन औऱ बन गये कार मैकेनिक..
इधर उधर किरदारों की तलाश में भटकते लेखक को लगता है कि अपने आसपास के वातावरण से किरदारों को चुन कर उन्हें कहानी के सांचे में ढालना बेहद मुश्किल है..फिर भी वो नयेपन के लिए ये चुनौती स्वीकार करता है..अंतत: होता ये है कि किरदार लेखक से ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं..और लेखक कि जिंदगी की कहानी लिखने लगते हैं..ये है क्या..समझने में देर लगेगी फिल्म देखिए धन्य हो जाएंगे...





तुषार उप्रेती

ये फिल्म फ्लॉप क्यों नहीं हुई..जब वी मेट


कुछ दोस्तों ने कहा था कि ये फिल्म मत देखो..बकवास है..इसलिए नहीं देखी थी। लेकिन जब बाज़ार में 39रुपये में वीसीडी आई तो खुद को रोक नहीं पाया।। कब से बेचैनी थी कि आखिर जब वी मेट में ऐसा क्या है जो वो फ्लॉप नहीं हो पाई(जैसा कि सब कह रहे थे कि वो बकवास फिल्म है, शाहिद-करीना का पब्लिसिटी स्टंट है)। इम्तियाज़ अली का बतौर निर्देशक ये दूसरा प्रयास है जो उनकी कलात्मक ईमानदारी की गवाही देता है। गवाही इसलिए की कहानी में एक चोट खाया आशिक है, जो ट्रेन में गीत(करीना) से मिलता है, दोनों का मिलन ही कैसे उनकी किस्मत बदल देता है…ये हज़ारों हिंदी फिल्मों में आप देख चुके हैं। लेकिन पूरी फिल्म में दर्शक बैठ कर दोनों कैरेक्टरर्स के सफर का गवाह बना रहता है।
लोग हमेशा फिल्म खत्म होने के बाद उसके सितारों को याद रखते हैं औऱ ये भूल जाते हैं कि एक्टर हमेशा निर्देशक की कहानी का एक चेहरा होता है। फिल्म का असली बाप उसका स्क्रिप्ट राईटर औऱ डॉयरेक्टर ही होता है। बात सिर्फ इतनी होती है कि कौन सा कलाकार निर्देशक की सोच को कितनी गहराई से जीने का माद्दा रखता है...इस लिहाज से फिल्म में इम्तियाज़ अली यानी निर्देशक हावी है। शाहिद-करीना ने अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। शाहिद कपूर अगर लटके-झटकों की दुनिया से बाहर निकलने का साहस दिखायें तो दर्शक जल्द ही उनके भीतर एक नया सुपरस्टार देखेंगे....करीना कपूर की खासियत ये है कि वो किसी भी किरदार को अपने व्यक्तित्व
से जोड़कर उसे निभाती हैं। ये ‘चमेली’ में हम देख चुके हैं।
जहां तक संगीत की बात है उसमें ताज़गी है। जैसा कि प्रीतम से उम्मीद की जा सकती थी उन्होंने कर दिखाया है।
‘ये इश्क हाय बैठे बिठाए’ गाने में बजती पहाड़ी लोक-धुनों को आप महसूस कर सकते हैं....
अंतत; इतना ही कि अगर एक बार ये समझना चाहते हैं कि रोमांटिक फिल्म क्या होती है तो जब वी मेट जरुर देखिए। खुद देखिए और फैसला करिए कि ये फिल्म फ्लॉप क्यों नही हुई?


तुषार उप्रेती



तारे ज़मीन पर....tare zameen per







मां-बाप ज़रा गौर फरमायें...क्या वो अपने बच्चों को पाल रहे हैं? या फिर अपने सपनों को...
बचपन उस महीन रेशे की तरह होता है जो अगर धीरे धीरे खुले तो जिंदगीभर ओढ़ने को चादर बन सकती है और अगर उसे छींचा जाये तो वो टूटकर बिखर जाता है।
कुछ ऐसे ही अंदाज़ मे तारे ज़मीन पर की कहानी को फिल्म के कैनवस पर उतारा गया है। कैनवस इसलिए की उसमें एक मासूम बच्चे का बचपन है, जो अपने आसपास के माहौल से, प्रकृति की चित्रकारी से जिंदगी से सबक सीखना चाहता है। उसे एक मेहनत-कश मजदूर के हाथों दिवार को पेंट होते देखना पसंद है, उसे मछलियां पकड़ना पसंद है, उसे पतंग लूटने में मज़ा आता है, उसे स्कूल बंक करना अच्छा लगता है...यानि वो सबकुछ उसे अच्छा लगता है जो उसके नार्मल होने की निशानी है। लेकिन उसके मां-बाप की समस्या है कि उन्हें घर में एक चैंपियन चाहिए जो अंड़े-बॉनविटा के दम पर आकाश की ऊंचाई नाप ले....जैसा कि गाने से स्पष्ट है......
ये टॉनिक सारे पीते हैं
ये ऑमलट पर ही जीते हैं
दुनिया का नारा जमे रहो....

सिर्फ इतना कहना काफी होगा कि तीसरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे के कंधों पर जब महत्वकांक्षाओं का बोझ लादा जाता है तो उसका बचपन टूटकर बिखरने लगता है.......
इशान अवस्थी के रोल में दर्शिल सफारी और उसकी मां के रुप में तिस्का चोपड़ा का काम लाजवाब है। ऐसा लगता है मां सबकुछ समझते हुए बच्चे के मुंह से लॉलिपोप छीन रही है....उसे चैंपियन बनाने के चक्कर में उसे कमतर इंसान बना रही है। जो उसकी आंख से संवेदना के आंसू सूखा रही है।
बेहतर फिल्मों की एक खासियत होती है कि उसमें खामोशी भी आपको बोर नहीं करती बल्कि उसका भी दर्शक से एक रिश्ता बन जाता है। आमिर खान की ये कोशिश उनके भीतर छूपे कलाकार की इमानदारी है। कई दृश्यों मे बूढ़े लगते हैं फिर भी फिल्म काफी कुछ समझाती है। खासकर अपने संगीत औऱ गीतों के माध्यम से...शंकर-एहसान-लॉय उस्ताद हो गये हैं तो प्रसून जोशी शब्दों से झनकार बिखेरना जानते हैं। जो लोग कहते हैं कि कैमरा झूठ बोलता है उन्हें अमोल गुप्ते (क्रियेटिव डॉयरेक्टर) की तारे ज़मीन पर किये गए रिसर्च पर ध्यान देना चाहिए...कैमरा झूठ नहीं बोलता बल्कि हम उसे सच नहीं बोलने देते। जिंदगी के कई सत्यों मे से एक सच ये भी है कि बचपन फिर नहीं लौटता....वो बहती नदी की तरह है,उसे रोकेंगे तो वो गंदा होगा औऱ वक्त से पहले अपनी मौत मरेगा...शायद किसी ने ठीक कहा है.....

कोई स्कूल की घंटी तो बजा दे , ये बच्चा अब मुस्कराना चाहता है........


तुषार उप्रेती

क्यों खोया चांद..khoya khoya chand review


कोई भी निर्देशक अपने समय का साक्षी होता है,हांलाकि मौजूदा फिल्मी दुनिया को देखकर ये कहना थोड़ा मुश्किल है। बावजूद इसके कहना पड़ेगा कि सुधीर मिश्रा ने अपने समय को बखूबी देखा है, जिया है,और फिल्मों में उसे उतारने की ईमानदार कोशिश वो करते ही रहते हैं।

हज़ारों ख्वाइशें ऐसी में ये कोशिश 70 के दशक की राजनीतिक चालाकियों को सामने लाने में बखूबी कामयाब रही थी...और 2007 में 50-60 के दशक की फिल्मी दुनिया को पर्दे पर दोबारा जिंदा रखने मे भी सुधीर मिश्रा कामयाब हुए हैं..लेकिन इस बार ये कामयाबी उन्हें ज्यादा दूर तक नहीं ले जा रही...पहली नज़र मे फिल्म अच्छी है...थोड़ी बोझिल भी...सुधीर मिश्रा की शुरु से ही ये खासियत रही है कि उनके पात्र एक आम इंसान की तरह ‘आईडियलिज़्म’ और ‘रियलीज़्म’ के बीच झूलते रहते हैं..और फिर अंत में जीत रियलीज़्म की होती है..इसलिए उनकी फिल्मों मे कोई बड़ा नायक पैदा नहीं होता जो अपनी फरस्ट्रेशन किसी को गोली मारकर मिटाये...बल्कि बड़े बनने की ख्वाइश में जिंदगी के हर कदम पर परत दर परत धोखा खाता वो आदमी होता है,जो अंत मे खुद से ये सवाल पूछता है कि जिस सहर की मुझे उम्मीद थी ये वो तो नहीं ,ये वो तो नहीं...अगर आपने ‘हज़ारों ख्वाइशें ऐसी’ और ‘जाने भी दो यारों’ को ठीक से देखा है तो इतना तो है कि ‘खोया खोया चांद’ का अंत आपको पसंद नहीं आयेगा..खोया खोया चांद अचानक से बीच में खत्म हो जाती है...हांलाकि फिल्म बीच में कई दफे काफी लंबी नज़र आती है। कुछ दृश्यों का फिल्मांकन गज़ब का है खासकर शाइनी और सोहा के समंदर किनारे टहलने वाले दृश्य में थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा कि वाकई में 'पोएट्री ऑन सेल्युलाइड़' वाली बात सही होती है।
अभिनय की बात करें तो शाइनी आहूजा को अपनी संवाद अदायगी पर मेहनत करनी चाहिए। सोहा अली खान के अंदर अभिनय की तमाम संभावनाएं होने के बावजूद संघर्षरत लड़की की वो तड़प गायब है। सोनिया जहान की अगर बात करें तो उनकी अदाएं बेहद मादक हैं। बला की खूबसूरत तो वो हैं ही। लेकिन फिल्म के तीन कलाकार ऐसे हैं जिनका कद समय के साथ बढ़ता जा रहा है। ये बंदे हैं...रजत कपूर, जो वक्त के साथ बेहतर होते जा रहे हैं, विनय पाठक, जो कम बजट की फिल्मों की खोज हैं और सोरभ शुक्ला, जिनके अभिनय को नापने वाला बैरोमीटर बनाना मुश्किल होता जा रहा है। इस फिल्म में अपनी पंजाबियत को संवादों के लच्छों मे लपेट कर फेंकने मे सौरभ शुक्ला दर्शकों को हर बार स्क्रीन पर आते ही प्रभावित करते हैं....
संगीत फिल्म का मधुर है ,लेकिन क्वालिटी को और निखारा जा सकता था। स्वानंद किरकिरे के गीतों मे ताज़गी है,आवाज़ मे कव्वालों वाला अंदाज़ है। जिसे शांतनु मोइत्रा ने पहचाना है।
अंत मे खोया खोया चांद को बनाकर सुधीर मिश्रा ने खुद के साथ तो न्याय कर लिया है। लेकिन शायद इस बीच उनके हाथ से दर्शकों की नब्ज़ छूट गई है। वो अपना खास दर्शक वर्ग विकसित कर पाने के बावजूद सफल नहीं कहलांएगें...क्योंकि फिल्मों मे जिन लोगों के दर्द की कहानी आप सुना रहे हैं वो दर्द जब तक सबको तकलीफ न पहुंचाये तक तक आप खुद को सफल नहीं कह सकते....खैर खोया खोया चांद के बारे में इतना ही कहना बेहतर होगा कि..


जो चेहरा चांद हो सकता था
वो महज़ भीड़ बनकर रह गया......
तुषार उप्रेती

पिक्चर अभी बाकी है..ॐ शांति ॐ


सांवरिया देखी तो ओम शांति ओम देखने के लिए जीभ लपलपाने लगी। खैर अपन भी घुस गये टिकट लेकर रात का आखिरी शो देखने। इस बार टिकट खुद खरीदा। महंगा नही लगा। वजह, साथ में था पसंदीदा दोस्त जिससे अपनी खूब पटती है।
खैर फिल्म शुरू हुई और कब खत्म हुई पता ही नहीं चला। बीच में इंटरवल का ब्रेक भी बेमानी लग रहा था। समझ आया कि शाहरुख खान अपनी किस्मत का बुलंद सितारा क्यों है? वजह है इंडियन आडियंस का उसके साथ हर रोल में कनेक्ट होना। साधारण शक्ल,जो उसे आम लोगों से जोड़ती है और आंखों से तकलीफें बयां करने की काबिलियत। इसलिए वक्त बीतता गया और शाहरुख का सफर आसान होता चला गया। पहली बार विदेशी अंदाज़ में बदन तराशा और दर्दे डिस्को भी किया। लेकिन माया मेमसाहब और डुप्लिकेट में शाहरुख पहले भी अपने तन की सूखी हड्डियां दिखा चुके हैं।
फिल्म शुरु होते ही रोलर कोस्टर राइड़ शुरु हो जाती है। शिरीश कुंडुर ने एडिटिंग में कहर ढ़ा दिया है। कई दृश्य चौंकाते हैं। खासकर दीपिका पादुकोन का वो गाना जिसमें आप उन्हें बिना झिझक के राजेश खन्ना ,सुनील दत्त,जितेंद्र के साथ नाचने गाते देख सकते हैं। काफी अर्से बाद किसी फिल्म में लगा कि लाइटिंग कमाल की है। दास्तान गाने में आप ये महसूस कर सकते हैं। रंगमंच की तरह फिल्मों मे भी लाइटिंग का खास मतलब होता है। रेड़,ग्रीन और येलो लाइट के अपने मतलब होते हैं। फऱाह खान की कोरियोग्राफी से प्रभावित हुआ।
खल रही थी तो सिर्फ एक बात की कहानी वही घिसीपिटी या फूहड़ थी। 2007 में आप आडियंस को भूत और पुर्नजन्म की कहानी सुनाकर साबित क्या करना चाहती है? या फिर खालिस मनोरंजन और मार्केटिंग के नाम पर आप लोगों को बरगलाना चाहती हैं। बात सिर्फ इतनी सी है कि लोगों को सपने दिखाओ और अपने बड़े से पेट में पैसा गड़प कर जाओ। सिम्पल है यार। मार्केटिंग फंड़ा। फिर चाहे इसके लिए आपको मनोज कुमार का मज़ाक उड़ाना पड़े या तमाम इंडस्ट्री को एक ही गाने में नचाना पड़े।
दीपिका पादुकोण को दो किरदारों मे एक साथ उतारना गले की फांस बन सकता था। लेकिन बंदी में कान्फिड़ेंस है। निभा गई है। शाहरुख खान के साथ कई सालों से हम सपने देखते आए हैं। राजू बन गया जन्टिलमैन और चमत्कार में उसके साथ हम हंसने रोने के सिद्धस्त हो चुके थे। ओम शांत ओम में उसने जूनियर आर्टिस्ट बन कर मेरे आपके बड़ा होने के सपने को भुनाया है। मैं हूं ना मे भी कहानी नहीं थी और ओम शांति ओम में भी कहानी नही प्रजेंटेशन ज्यादा है। पैसा फेंक तमाशा देख। दृश्यों का फिल्मांकन अच्छा है। आग लगने पर शाहरुख का दीपिका को बचाने की कोशिश करना और ओके के रुप में अपनी मां से मिलने वाला सीन थोड़ी देर के लिए आंखें गीली कर सकता है। इसलिए रुमाल लेकर जाएं।
फिल्म में मेहमान कलाकार के रुप में आये अक्षय कुमार ने दिल जीत लिया है। फराह को अक्षय से सीखना चाहिए की मजाक खुद का भी बनाकर लोगों को हंसाया जा सकता है। गीत भी फिल्म की जरुरत के हिसाब से हैं। लेकिन अंत में रोमांच के बाद भी जब फिल्म देखकर बाहर आया तो सिर्फ यही जेहन में घुम रहा था कि बड़ा बनने के सिर्फ दो ही तरीके होते हैं या तो किसी बड़े आदमी के घर में पैदा होने की एप्लिकेशन दे दो या फिर दूसरों को नीचा दिखाकर खुद बड़े बन जाओ। अगर यही फिल्म है तो मैं कहूंगा....पिक्चर अभी बाकी है...........

मस्ती,मजा,मनोरंजन,मुनाफा,मार्केटिंग और निर्देशक की मनमानी यही है ओम शांति ओम। अंत में अपनी पूरी टीम को दर्शकों से परिचित करना अच्छा प्रयास था।.....


तुषार उप्रेती





सांवरिया का बांवरिया ....





हौसला तो पहले ही पस्त हो चुका था। फिर भी सांवरिया देखने की हिम्मत जुटाई क्योंकि पी.वी.आर का डेढ़ सौ वाला टिकट हमारे बॉस ने खरीद दिया । और दोनों गुरू चेला पहुंच गए भंसाली का ब्लू मैजिक देखने। पहली नज़र मे कहूं तो कमाल के सेट्स और सिनेमाटोग्राफी है। पहली नज़र मे जिस शहर से वास्ता हुआ वो फेयरीटेल की दुनिया का कोई शहर लगा। अपन झेल गये। फिर जब शहर की झलक मिली तो वो अलादिन के कार्टून का रुमानी शहर आग्रबां लगा। आंखें चौंधियाई। एक बार फिर रणबीर ने जब सोनम के साथ गाना गाया तो लगा ये भारत में बसे वैनिस का दृश्य है। जहां गौंड़ोलाज़ चलते हैं। अपन हज़म कर गये। लेकिन एक बात फिर भी हजम नही हो रही थी वो थी कहानी का एक ही जगह पर अटक जाना।
कहानी दो किरदारों के बीच ऐसे अटकी है कि उसे निगलने वाली कोई गोली भंसाली ने नहीं दी। अपन तो खिचखिच को विक्स के साथ दूर करने के आदी हैं। लेकिन भंसाली चूक गये। ऐसा लगता है कि फिल्म को म्यूजिकल टच देकर भंसाली ने ब्लैक में गाने न फिल्मा पाने की भड़ास निकाली है।
गाने मधुर हैं। दिलचस्प फिल्मांकन है। लेकिन हर पांच मिनट में अगर गाना आ जाये तो कानों मे तेल ड़ालने की नौबत आ जाती है। हर गाने पर आसपास बैठे लोगों की गालीगलौज से जी उकताया भी। फिर भी अपन झेल गये।
लेकिन फिल्म को मैं बुरा नहीं कहूंगा। देखने लायक है। सारी फिल्म में मुझे कपूर खानदान का दबदबा नज़र आया। बंदे(रणवीर) का नाम है रणवीर राज और बंदा जिस क्लब का लीड़ सिंगर है उसका नाम है आर.के बार। कहे बिना समझ आये तो वो कहना ही क्या? बंदे के नाम से लेकर काम में खानदानी ठाठबाठ है। ये अलग बात है कि बंदा गरीब है और अनाथ भी। लेकिन बंदा मस्त है। एक्टिंग भी मस्त है। शुरूआत में रणबीर का राजकपूर की तरह जी,जी करना और बाप ऋषि कपूर की तरह “तुमने कभी किसी से प्यार किया है” वाला संवाद बोलना आपको बताएगा कि क्यों करिश्मा और करीना के होने के बावजूद भी रणबीर भाई को कपूर खानदान का वारिस कहा जा रहा था।
फिर भी तमाम आलोचनाओं और बाज़ार मूल्य पर पिटने के बावजूद भी इस फिल्म ने रणवीर कपूर की प्रतिभा को उभारा है। आप उसे सुंदर चेहरे वाला मॉड़ल नहीं कह सकते। भले ही उसके नाचने में शशि कपूर और शम्मी कपूर झलकते हों , भले ही वो राजकपूर की तरह टोपी पहनता हो। फिर भी वो रोना,हंसना से लेकर तमाम बॉलीवुड़ नुमा मसालों से लैस है। हांलाकि बंदा कहीं कहीं ऋतिक रोशन की जाने-अनजाने में नकल भी कर गया है।
सोनम कपूर की अगर बात करें तो उन्हें अपने पिता अनिल से कुछ सीखना चाहिए। खासकर हंसना और रोना क्योंकि ये दोनों काम भी वो ठीक से नहीं कर पाई हैं। मासूमियत है। लेकिन मेकअप से पुती। हांलाकि भावहीन चेहरा उसका भी नहीं। थोड़ा और तराशने की जरुरत है। ..
फिल्म में मुगले-ए-आज़म की बेगम पारा भी हैं तो वहीं पृथ्वीराज कपूर के साथ काम कर चुकी ज़ौहरा सेहगल ने भी अपने जौहर बखूबी दिखाए हैं। सलमान खान और रानी मुखर्जी ने रोल और स्क्रिप्ट के मुताबिक अपना काम कर दिया है। रानी की लचक कायम है। खासकर वैश्याओं वाली लचक को मंगल पांड़े और लागा चुनरी में दाग में निभाने के बाद इस किस्म के किरदारों में उन्हें परेशानी नहीं होती।
अब बात संजय लीला भंसाली की। साहब हैं बड़े आदमी हैं। फिर भी मर्दों की प्यार के लिए कसक को समझते हैं। हम दिल दे चुके सनम , देवदास, खामोशी और सांवरिया में उनके नायक विरह में हैं। सोच अच्छी है। लेकिन दूर नहीं जाती। समाज के ताने-बाने में फिट नहीं होती। इसलिए इस बार सांवरिया को खारिज कर दिया गया। इंडियन आडियंस है भई। फिल्मी सीन में नायिका का भागना और नायक का उसे फॉलो करना देवदास के लिए फिल्माये गये दृश्यों को दुबारा ताज़ा करता है।
खैर अपन तो इतना ही कहेंगे कि अगर पॉपकॉन खाना है तो फिल्म मत देखिये। अगर किसी रचनाकार की कैनवस पर सजी म्यूजिकल पेंटिंग देखना चाहते हैं तो..सांवरिया हा हा हा.....बांवरिया..हा..हा हा हा.....





-तुषार उप्रेती

यादों के झरोखे से...


संगीत की दुनिया में किशोर दा एक ऐसे नाम हैं...जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने वक्त को आवाज़ दी। आभास कुमार गांगुली यानी किशोर कुमार के गले की दुनिया आज भी कायल है...आज यानि 13 अक्टूबर 1987 के दिन इस फनकार ने दुनिया से विदाई ली थी...


नटखट चुलबुले और बदमाश कुछ ऐसे ही थे अपने किशोर दा। जिन्होंने कभी अपनी एक्टिंग से मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाई तो कभी अपनी आवाज़ के जादू से सबको अपना दिवाना बना लिया।
सही मायनों में अगर कहें तो किशोर कुमार की आवाज़ ने हर दशक में किसी मासूम से चेहरे को राजेश खन्ना बना दिया। उन्हें चिंगारियों से अपने लिये आग जलाना सिखाया। तो दूसरी तरफ नौजवानों को बताया कि प्यार दिवाना होता है,मस्ताना होता है।वहीं किसी नौजवान को उन्होनें समाज की ऊंच-नीच भरी रस्मों को न मानने के लिये मनाया। दरअसल किशोर कुमार की खासियत ही ये थी कि उनकी आवाज़ में हर मौसम को बयां करने की ताकत थी। फिर चाहे वो प्यार की खामोशी हो, या फिर हसीनों के दिवानेपन में झूमता जमाना।
आज भले ही वो हमारे बीच न हों पर उन जैसे मुकद्दर के सिकंदर की वो आवाज़ आज भी कानों में गूंजती सी है।

तुषार उप्रेती

दिल दोस्ती के अलावा कुछ एक्सेक्ट्रा

हुआ यूं कि घूमते घामते हम तीनों दोस्तों ने सिगरेट के सुट्टों के बाद अचानक ये प्लैन बना लिया कि दिल दोस्ती और एक्सेक्ट्रा देख ली जाए। मेरे अलावा किसी को भी फिल्म में दिलचस्पी नहीं थी। मेरी दिलचस्पी का निजी कारण था। ये फिल्म मेरे ही कॉलेज में शूट की गई है। खैर पहली नज़र में फिल्म बंडल ,बोगस और बेफिजूल जान पड़ी। लेकिन धीरे धीरे इसने हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण की पोल खोलनी शुरु की तो अचंभा हुआ। इस फिल्म में निर्देशक से लेकर किरदार तक हर कोई एक कनफ्यूजन में जी रहा है। इमाद शाह जो फिल्म में अपूर्व का किरदार निभा रहे हैं वो फिल्म के सूत्रधार हैं। जिनकी पंचलाईन है WHEN YOU ARE YOUNG YOU BELIEVE POSSIBILITIES ARE ENDLESS. ठीक इसी तरह अपूर्व जीवन की गुत्थियों को सुलझा रहा है,परेशानी है तो बस इतनी कि उसके सामने SEX जीवन की सबसे बड़ी उलझन है। सही मायनों मे कहें तो साला ठरकी है। या फिर जहां मिले दो, वहीं गये सो। उसका ये रास्ता दिल्ली की जीबी रोड़ से लेकर एक वर्जिन स्कूली लड़की के बिस्तर तक ले जाता है। और आखिर में वो अपने दोस्त की गर्लफ्रेंड़(निकिता आनंद) के साथ भी सोता है। जिसकी भनक उसके दोस्त संजय मिश्रा (श्रेयस तलपड़े) को लग जाती है । जो कॉलेज प्रेसिडेंट बनने के चक्कर में अपनी गर्लफ्रेंड़ से कुछ दूर सा हो चुका है। फिल्म के आखिर में श्रेयस का चीखपुकार मचाना कुछ अजीब लगता है। शायद इसलिए कि फिल्म का सूत्रधार इमाद है। निर्देशक मनीश तिवारी दरअसल यहीं पर थोड़ा चूक गये हैं। फिल्म में सबसे ज्यादा जो चीज़ अखरती है तो वो है इसका बैकग्रांउड स्कोर। फिर भी निर्देशक जो प्रूव कर पाये वो ये कि ये दो अलग किस्म के हिंदुस्तानियों की कहानी है।
-तुषार उप्रेती

नीली आसमानी छतरी...ब्लू अंब्रेला

गैंगस्टरों के जीवन पर फिल्म बनाना , हॉकी क्रिकेट पर फिल्म बनाना या फिर लव स्टोरी को कैमरे से गूंथना मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री को बखूबी आता है। लेकिन एक छतरी जैसी बेहद साधारण चीज़ को केंद्र में रखकर एक मनोरंजक फिल्म बनाने के लिये सबसे पहले तो जिगरा चाहिये। फिर अगर फिल्म बच्चों के कोमल मन की भावनाओं को उकेरती हो तो ये बाढ़ में कागज़ की कश्ती तैराने जैसा होगा। इसलिए सबसे पहले तो विशाल भारद्वाज के हौंसले की तारीफ करनी होगी जिनकी विषय की बारिक समझ ने न सिर्फ जोखिम उठाया बल्कि एक उम्दा फिल्म भी बनाई। वैसे कैमरे के काव्यलोक में समाने के लिये तो रस्किन बांड ने अपनी कहानी में पहले ही काफी गुंजाइश छोड़ रखी थी। जिसका फायदा विशाल को सीधा मिला । लेकिन उसे भारतीयता के जामे में कैसे पिरोया जा सकता है ये कोई विशाल से सीखे। खैर ब्लू अंब्रेला साहित्य को कैमरे में उतारने की तमाम संभावनाओं के साथ फिल्माई गई है। बशर्ते आप उसे एक रसिया की दृष्टि से देखें न कि समीक्षक की। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाके में छोटी हसरतों के साथ जीता जागता एक बड़ा गांव। यहां ये समझना बेहद मुश्किल है कि बड़े यहां बच्चे हैं या बच्चे अपनी तमाम शरारतों के बावजूद बड़े हो चुके हैं। कम से कम ब्लू अंब्रेला देखकर तो यही लगा। जहां एक सौ चौंसठ रुपयों की एवज में गांव की एक मात्र परचून की दुकान का मालिक खतरी बच्चे की दूरबीन मार लेता है। तो वहीं फिल्म के अंत में बिनिया(श्रेया शर्मा) का खतरी(पंकज कपूर) को अपनी छतरी देना बच्चों के संवेदनशील मन की ओर सीधा इशारा है। खैर फिल्म में इसके अलावा भी बहुत सी दिलचस्प गुस्ताखियां हैं जो कुछ पल के लिये ही सही पर दर्शक को गुदगुदाती हैं और पहाड़ी जीवन पर उसकी समझ की गुत्थियों को सुलझाती हैं। जैसे पहाड़ों पर जीविका कमाने के लिये पर्यटन का होना आम बात है लेकिन उस पर्यटन को किसी खास दुकान तक खींच कर लाना एक बिज़नेस माइंड है। जिसमें दुकानदार और हाईवे से गुजरने वाली बसों के कंडक्टर बराबर के भागीदार हैं।
खैर फिल्म में जैसे दृश्यों को फिल्माया गया है वो प्रकृति कैमरे में कैद करने का नया व्याकरण रच गया है। रही बात अभिनय की तो पंकज कपूर की प्रतिभा को परखने के लिये आज तक कोई यंत्र बना ही नहीं। पहले चालाक दुकानदार और बाद में गांव द्वारा बहिष्कृत होने के किरदार को उन्होंने बखूबी जिया है। बाल कलाकार के रुप में श्रेया शर्मा में अभिनय की असीम संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं। गुलज़ार को तो वैसे भी चड्डी पहन के फूल खिला है लिखने की वजह से बच्चों की नब्ज़ पकड़नी आती है इसलिये इस फिल्म में भी गाने काफी अच्छे हैं। जो मस्ती और चुलबुलेपन को बरकरार रखते हैं। खैर फिर भी जो लोग ये कहते हैं कि भारत में बच्चों के लिये फिल्में नहीं बनती है उन्हें इस फिल्म के सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने से जलन हो सकती है।


- तुषार उप्रेती

फिल्म बनाने का अनूठा अंदाज़…जॉनी गद्दार

अगर मैं आपसे कहूं की फिल्म की शुरुआत में ही अगर आप को बता दिया जाये कि आप जो फिल्म देखने जा रहे हैं, उसमें फलां शख्स कातिल है तो क्या फिर भी आप निर्देशक की प्रतिभा पर यकीन करते हुए उस फिल्म को देखेंगे। यकीन मानिय़े इस सवाल का जवाब आपको जॉनी गद्दार में मिलेगा। यहां गीतकार से लेकर फिल्म के निर्देशक तक एक भी ब्रैंड नेम नहीं है..। न तो निलेश मिश्रा और जयदीप साहनी के गीतों में गुलज़ार सी ताज़गी है और न ही नील नितिन मुकेश का इंतज़ार सांवरिया के रणबीर कपूर की तरह हो रहा है। बावजूद इसके निर्देशक श्रीराम राघवन ने जॉनी गद्दार के जरिये कहानी कहने का एक नया तरीका इजाद किया है.। जहां निर्देशक ने खालिस कहानी कही है वो भी बिना कोई सफाई दिये। अंग्रेजी में अगर कहें तो just do it ,no explanation. इस फिल्म की शुरुआत से ही छायांकन आपके दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है। पात्र ठीक वैसा ही अभिनय करते हैं जैसा कि निर्देशक चाहता है। हां, जहां तक बैकग्रांउड स्कोर की बात है तो उसमें शंकर ,एहसान,लॉय की जोड़ी ने एक खास किस्म की स्वायत्ता ले ली है। इसलिए तो हर दृश्य में जिस तरह से पुरानी थ्रिलर फिल्मों के संगीत का रिमिक्स कानों में घोला गया है। वो कहानी की मांग के मुताबिक माहौल बनाता है। अगर फिल्म के अलग अलग पहलुओं पर बात करें तो छायांकन में मुरलीधरन ने गज़ब ढ़ा दिया है। कैसे एक साधारण से बातचीत के सीन को भी कैमरे के एक नये कोण से तराशकर मज़ेदार बनाया जा सकता है ये उन्हें बखूबी आता है। इसलिये फिल्म इंटरवल तक आपको खुद से चिपटाये रखती है। इंटरवल के बाद अभिनेता अपने फार्म में और भी धाकड़ होते गये हैं। खासकर नील नितिन मुकेश जिनके तराशे हुए नैन नक्शों को भूलकर अब तक आप ये समझ चुके होते हैं कि ये आदमी सिर्फ सही मौके की फिराक में है और अगर इसे ये मौका मिल गया तो वो हमारी इंडस्ट्री के जमे-जमाये नायकों के पसीने छुड़ा सकता है। जहां तक बात धर्मेंद्र की है वो तो फिल्म में its not about age ,its about mileage वाला संवाद बोलकर स्क्रीन पर अपनी धाक पहले ही जमा लेते हैं। विनय पाठक भी खोसला का घोंसला और भेजा-फ्राई के बाद इस बार भी सही गेंद(संवाद) पर सही टाईमिंग करके चौका मारने के अभ्यस्त हो गये हैं। रही बात रिमी सेन की तो उनका इस्तेमाल फिल्म में एक मकसद से किया गया है। मकसद जॉनी की गद्दारी का औऱ फिल्म के सारे खेल का। आप चाहें तो उन्हें फिल्म का सबसे वेस्ट मैटिरियल कह सकते हैं या फिर कहानी को बुनने में मदद करने वाली सूई जो तीखापन लिये है। पर अफसोस जब हीरो इतना हैंडसम हो तो हिरोइन सोच समझ के चुननी चाहिये। ये श्रीराम राघवन को समझना होगा। नहीं तो वो उम्दा फिल्म बनाते जायेंगे और दर्शक उसे नकारते जायेंगे। आखिर बेहतर फिल्म को बेहतर बाज़ार मुहैया कराने में निर्देशक का भी योगदान होना चाहिये।
-तुषार उप्रेती

श्याम बेनेगल: सिनेमा जगत के दादा

अंकुर, मंथन, भूमिका, निशांत जैसी बेहतरीन फिल्मों के
जरिए हिंदी सिनेमा में नई इबारत लिखने वाले श्याम बेनेगल को भारतीय फिल्मों का
सर्वोच्च सम्मान दादासाहब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। बेनेगल को 2005
के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। भले ही कुछ देर से ही सही लेकिन इस बार का ये
पुरस्कार श्याम बेनेगल को दिया जाना इस पुरस्कार की साख को
और बढ़ा देता है...

  • एक नजर बेनेगल के फिल्मी सफर पर...
    अगर कहें कि सिनेमा एक प्रतीकात्मक माध्यम है तो कहना पडेगा कि श्याम बेनेगल की फिल्में प्रतीकों में बात करती है। सन् 1973 में अंकुर फिल्म के जरिये उन्होंने सेल्युलायड की दुनिया में कदम रखा था। अंकुर का वो द्रश्य आज भी उतना ही दमदार लगता है जिसमें एक बच्चा जमींदार के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ जमींदार के घर की खिड़की पर पत्थर दे मारता है।अंकुर का वो बच्चा दरअसल और कोई नहीं खुद श्याम बेनेगल का ही एक रुप है।और वो पत्थर बालीवुड की झूठी और फरेबी दुनिया के राजमहल की खिडकी पर मारा गया था।यह अहसास दिलाने के लिए कि रंगीन और चमकदार कांच के दायरे के इस ओर धूल,धूप और धुएँ से भरी एक दुनिया और भी है,जिसमें नायक नायिकाओं के लिए जीवन का मतलब जडों के इर्द-गिर्द नाचकर इज़हार -ए -मोहब्बत करना ही नहीं है।

    दरअसल श्याम बेनेगल की फिल्में अपने आप में एक आंदोलन की शुऱुआत हैं..जहां समाज के हर वर्ग का चेहरा हमें झांकता हुआ मिलता है...फिर चाहे बात मंडी की रुकमिनी बाई की हो ...
    जिसके कोठे में हर वक्त कोई न कोई हलचल मची रहती है..या फिर इंसानियत के बूते जिंदा रहने वाली मम्मो की..इतना ही नहीं बल्कि भूमिका में तो एक औरत की जिंदगी से जुडे कई पहलुओं पर श्याम बेनेगल ने बिना किसी झिझक के रोशनी डाली....वो भी तकनीक के हर छोटे बडे पहलुओं पर ध्यान देते हुए ..इसलिए उनकी हर फिल्म अपने आप में एक कलासिक का दर्जा पा गई है....

    शायद यही वजह है कि दादा साहेब फालके पुरस्कार पाने के बावजूद भी श्याम बेनेगल रुकने का नाम नही लेने वाले बल्कि भारत की एक नए सिरे से खोज करने के लिए वो बुद्द के जीवन पर एक फिल्म बनाने का विचार कर रहे हैं...दरअसल इन बीते चौंतीस सालों में श्याम बेनेगल की फिल्मों ने जिंदगी के हर लम्हे को छू डाला है.....
    -तुषार उप्रेती

ये आग लगने से पहले क्यों बुझी ?

धुआं उठा तो आग भी होगी,पर ये वक्त से पहले क्यों और कैसे बुझ गई थोड़ा खोपड़ी खुझाते हुए सोचें तो समझ आयेगा।
मुनाफा, मार्केटिंग और मनोरंजन(निश्चित तौर पर यहां हम एक खास तबके के मनोरंजन की बात कर रहे हैं) में हमेशा अव्वल रहने वाले रामू कैंप पर इस बार लोगों ने कैंची चला दी है। ‘शोले’ ‘आग’ पकड़े उससे पहले ही रामू के अरमानों पर किसी ने मानो पानी डाल दिया हो..पहले दिन ही रामगोपाल वर्मा की आग सिर्फ 50 प्रतिशत का बिज़नेस करते हुए हांफने लगी है। ये एक देसी बनारसी पहलवान की तरह चारों खाने चित्त हो गई है। जो लंगोट बांध कर तो अखाड़े में पूरे दम-खम से उतरता है लेकिन उसका लंगोट जल्द ही उतार लिया जाता है।
-तुषार उप्रेती

किसने चक-दिया इंडिया...




किसी ने ठीक कहा है कि आने वाले समय में स्किप्ट ही असली स्टार होगी ...यानि फिल्मों में चेहरे नहीं कहानी ज्यादा बिकेगी..शायद तब कहीं जाकर हम जैसे चवन्नी-छाप लेखकों का कुछ भला हो।इस बात को हम सुभाष घई के उस ऐलान से जोड़ कर देख सकते हैं ,जिसमें उन्होंने घोषणा कर डाली है कि वो एक उम्दा स्किप्ट लिखने वाले को एक करोड रुपये देंगे..।
अब बात करते हैं हाल-फिल्हाल में रिलीज हुई फिल्म चक-दे इंडिया की इसमें भी वो सब-कुछ है जो यशराज फिल्मों से आज से पहले एक्सेप्ट करना थोडा मुश्किल था। कहां हाथ में भारी भरकम थाल लिये चालिस हज़ार का लेहंगा पहने टेसुए बहाती वो औरतें जो कभी खुशी कभी गम के बड़े बड़े ढ़कोसले करती भारतीयता का ढ़ोग रचती थी...और कहां साधारण सी दिखने वाली वो महिलाएं जो हॉकी की एबीसीडी एक नये कोच के साथ ,नये तरीके से सीखने की जुगत में लगी पड़ी हैं।
साफ तौर पर कहें तो चक-दे इंडिया यशराज बैनर की फिल्म है ही नहीं ये पूरी तरह से शिमीत अमीन की फिल्म है..जो इससे पहले अब तक छप्पन जैसी यथार्थवादी फिल्म बनाकर साबित कर चुके हैं कि उनमें कहानी कहने का एक अदभुत और नया साहस कूट-कूट के भरा हुआ है.....

- तुषार उप्रेती