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कुछ आवाज़ें


आज मन हुआ कि कान
में एक सुऱाख करुं
इसे शोर सुनाई देता है
पर पचा नहीं पाता ये
वो महीन आवाज़ें

ये चीखों को निगल जाता है
पर पेड़ के पत्तों की सांय-सांय
को समझता नहीं,

ये गालियां बरर्दाश़्त करता है
पर पहचानता नहीं मां की आवाज़

कभी जब कोई रोता है अकेले में
ये अनसुनी करता है सिसकियां

जब कभी दुहाई देता है
कोई किसी संबंध की
तब दोनों कान टालते हैं
दुहाई को भी...

इसलिए मन होता है
कि सुऱाख करुं कान में...

ताकि वो कम-से-कम
अपनी आवाज़ तो सुन सके
और मेरे पास लोगों के
सवालों के जवाब में
कहने के लिए इतना तो हो
कि मैं एक कान से सुनकर
दूसरे कान से निकाल देता हूं

इसलिए मैं करना चाहता हूं
सिर्फ एक सुऱाख.....

तुषार उप्रेती



कत्ल

सन्नाटा वहीं है
लोग आगे बढ़ गये हैं,


धूल वैसे ही लेटी है
शव उसमें सड़ गये हैं,


कत्ल तो किया था उसने
वो दोष मुझ
पर मढ़ गये.......



तुषार उप्रेती

शायर औऱ नज़्में


वो जो सपनों को झांकते हुए देखता था
वो जो आसमान की गिरेबान में सरेआम पत्थर फेंकता था
वो शायर अब नहीं रहा,
बची हैं तो बस ये नज़्में....

जो सुकून में बैठी किसी के लबों को
चूम रही हैं,
खुदगर्ज़ हैं साली
जब वो जिंदा था तब उसके दर्द पर
फाहे डालती थी...
अब उसकी गैर-मौजूदगी में सरगोशियां करती हैं...


तुषार उप्रेती

गुस्सा

एक बारीख सी सांस ने अभी अभी
पिया है गर्म सा गुस्सा
नथूनों में एक जलन सी हो रही है
ये सांस भीतर ही भीतर
फुफकार रही है..

चीभ पर गालियों से छाले पड़े हैं
अंदर ही अंदर मैं अपने ज़हर से मर रहा हूं

धड़कनें अब पूछ कर धड़क रही हैं
दिमाग में बसी यादों से खून रिस रहा है
शरीर पर जख्मों से बना एक मिनार तैयार है


एक बारीक सी सांस ने अभी अभी
पिया है गर्म सा गुस्सा....



तुषार उप्रेती

लकीरें...




लकीरें हैं,लकीरों का क्या ?
साहिल पर खींचे तो लेहरों को रोकती हैं लकीरें
पेशानी पर खींचे तो किस्मत का मुंह नोचती हैं लकीरें



दहलीज़ पर खींचे तो सीता का अपहरण कराती हैं लकीरें
पत्थर पर खींचे तो जीवन और मरण कराती हैं लकीरें
कभी कभी सोचता हूं कि क्या ये लकीरों का दोष है ?
कोई जिंदगी में एक ही लकीर नापता है



तो कोई लकीरों से रास्ते तलाशता है।



हर कोई एक लकीर के सामने
दूसरी लकीर खींचकर खुद को बड़ा मानना चाहता है।
कोई लकीरों से किसी का नाम काटता है



तो कोई लकीरों को मिलाकर नाम लिखता है



दुल्हन के हाथों पर खींचे लकीरें मेंहदी होती है



तो विध्वा की मांग की लकीरें सपना खोती हैं
आखिर क्या हैं ये लकीरें और कहां से आई
हैं
आप भी तलाशना और मैं भी तलाश रहा हूं



लकीर से लकीर जोड़कर नये सपने बना रहा हूं







तुषार उप्रेती








धमाके के बाद ...









ये साल भी कुछ यूं गुजर गया


जैसे बांझ हो गई धरती के


ऊपर से गुजर जाते हैं- बादल ।




हंसते हुए उसकी विवशता पर.....
ये साल भी कुछ यूं गुजर गया


जैसे गुजरती हैं ट्रेंने बदहाल गांव के


प्लेटफार्म से हंसते हुए उन


अनाथ से खड़े मुसाफिरों पर.....



ये साल भी कुछ यूं गुजर गया


जैसे गुजरते हैं पक्षी,हर शाम हमारे


बंद मकानों के ऊपर से हंसते हुए


हमारी उन कैद कर ली गई आकांक्षाओँ पर.....



ये साल भी कुछ यूं गुजर गया


जैसे गुजर जाते हैं गाड़ीवान वैश्याओं की गली से...


हंसते हुए उनकी उन प्रताड़नाओं पर...



ये साल भी कुछ यूं गुजर गया


जैसे गुजर गये थे पप्पू,छोटी, अल्का, दीनू,


चाचा,नानी, मां, बाप, बेटे-बेटियां पोते पोतियां


औऱ भी न जाने कितने संबंध


हंसते हुए धमाके के बाद


शुरु हुई हकीकतों पर.....



तुषार उप्रेती