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दीदी आई लव यू ...



सुबह उठा, मुंह हाथ थोया, दांत मांजे, तो देखा कि कुछ लम्हे मेरे पीछे नंगे पांव आने को बेताब हैं। मैंने उन्हें समझाया पर वो नहीं माने। बस अड्डे तक वो मेरा पीछा करते हुए आ गये... हमें टिकट लेना पड़ा पर उनकी मौज थी। बस धुंएं का लच्छा बनाती हुई मेरठ जा पहुंची। शहर छोटा है, लेकिन हर बार खबरों की दुनिया में किसी हादसे के गले में हाथ डालकर स्टाइलिश इंट्री लेता है। चारों ओर से अस्त-व्यस्तता। जैसे छोटे शहर में आकर बड़े शहर के लोग खुद को बड़ा समझने लगते हैं। हम भी सुपिरीओरिटी काम्पलेक्स से छाती फुलाए रिक्शे में जा बैठे। भाई साहब मेरठ कैंट जाना है। जवाब मिला बीस रुपये। एक बार में मान जायें तो मिडिल क्लास कैसे? पता था कैंट के २० रुपये ही लगते हैं। अजी हम भी दिल्ली के पालिका बाज़ार के बंदें हैं। बारगेंन तो खूब किया पर लगे २० रुपये ही। दो आदमी। एक छोटा बैग। और ऊपर से बिन बुलाए लम्हों का बोझ। कमबख्तों से कहा कि जूते खरीद लो। हरामी हैं, कहने लगे सेल नहीं लगी। वैसे भी इस शहर की तपिश नंगे पांव पर चलने वाला ही मेहसूस कर सकता है। रिक्शे वाला खींचता रहा औऱ रिक्शा आगे बढ़ता रहा। उतरे पर लम्हे हमसे पहले ही पुल पार करके नानी की गोद में जा बैठे। मैंने कान पकड़कर उन्हें दूर हटाया। नानी के पांव छुए मौसी को गले लगाया औऱ बेहन से जा लिपटा। रिश्तों के मायने छोटे शहर में नज़र आते हैं। छोटा शहर जो हर वक्त बैठकर ख्वाब बुनता रहता है। यहां बड़े ख्वाब औऱ छोटी हसरतें होती हैं। खूब फोटो खींचे। सबसे छोटी बहन का सबसे लाडला भाई जो हूं। इसलिए मुफ्त में ही ये काम कर दिया। लम्हों के हमशक्लों को फोटो में कैद किया। मामा के सखत हाथों के मुलायम पराठें खाये। यकीन मानिए कुछ पराठों को खाया जाता है औऱ कुछ से जूझा जाता है। देसी परांठा है भईया। शहर में हम इसका अल्पविकसित रुप परांठी खाते हैं। जितना फर्क लंगोट और लंगोटी में होता है। बस उतना ही फर्क परांठे और परांठी में होता है। शाम को तैयार होना था। ना जाने ये लम्हे अपने लिए कहां से लिबास ढ़ूढ़ लाये। सुंदर लग रहे थे। मैंने भी मेरठ में ही शापिंग कर ली थी। इसलिए तैयार हुआ। जैसा कि उम्मीद थी दूल्हे को मैंने ही गोद में उठाया। सबसे हट्टा-कट्टा जो हूं। रस्मों औऱ कस्मों को अंजाम दिया जाता रहा। औऱ पता ही न चला कब शादी हो गई। कल तक जिसके कान मरोड़ा करता था। वो बहन अब विदा होने को थी। आंसू आंखों से झांक रहे थे। जोर से उसे गले लगाया। और कहा दीदी आई लव यू...


उसने कभी अपने हाथ से मेरी कलाई पर राखी नहीं बांधी । न वो मेरी सगी बहन थी। फिर भी मेरे खून में रिश्तों की पैदाइश जैसी थी। बड़े होने पर मां के बाद जिस बहन को सबसे नज़दीक पाया वो यही थी। मैं खुश था उसे उसकी पसंद का लड़का मिला। बस लम्हे थे जो रो रहे थे.....

तुषार उप्रेती




हैलो-हाय.....





वो लड़कियां बेहद खुशनसीब होती हैं। जिनके नाम से उनके गली-मोहल्ले गुलज़ार हुआ करते हैं। ऐसा मैं नहीं मेरे ही कुछ उम्रदराज दोस्त कहा
करते थे।



वो बाग जहां बचपन में हम क्रिकेट खेला करते थे, अब वहां यारों का मज़मा लगता था। बैठकें होती। शर्तें लगती। हर हफ्ते का यही रुटीन । हर हफ्ते हमारे मोहल्ले का नाम किसी नई लड़की के नाम पर रखा जाता। कल तक जिसे हम कन्नू मोहल्ला कहते थे वो सोमवार से पूनम मोहल्ला कहलाएगा। बैठकबाजों के उस्ताद सुमित भाई जब ये घोषणा करते तो बहुत शोर होता, सीटियां बजती और हुल्लड़बाजियां होती।
मैं हमेशा दूर से ही अपने इन दोस्तों को हाथ हिलाकर आगे बढ़ जाता। कई बार इशारे होते,आवाज़ें लगती,पर मैं हाय हेलौ से ज्यादा नहीं रुक पाता।
उस्ताद अपन से इस बात के लिए ख़फा रहते। उस्ताद....हां यही असली नाम था उनका। आठवीं तक पढ़े।फिर मन उक्ता गया। तो इधर-उधर घूम कर लोगों की लौंडियों को हांकने लगे। एक दिन बाप ने सरेआम कनपट्टी पर दे मारा,.तो सोया हुआ आत्मसम्मान जागा और रोज़ाना सुबह दस से शाम पांच तक चूड़ियों की दुकान पर लुगाइयों को चूड़ियां पहनाते। काम मुनासिब न सही,पर दिलचस्प था। इसलिए करते रहे। लेकिन शाम पांच बजे घर आकर उस्ताद अपनी उस्तादी न दिखाएं,ये कैसे हो सकता है?
बाग के टपरे(टिला)पर मजमा लगता। औऱ उस्ताद अलाने-फलाने की लड़की का किस्सा सुनाते।
..... ‘अजी उस दिन कनॉट प्लेस में बॉयफ्रेंड़ के साथ थी।’...
“मैंने बाज़ार में घुमते पकड़ लिया...तो बोली घर मत बताना”
और मेरे जैसे न सही पर मुझसे थोड़े ज्यादा बुरे हालात में रहने वाले सारे जवां लौंडे...जांघों पर हाथ मलते हुए हाय हाय करते। इस सबमें ये खासियत थी कि इनमें से कोई भी कॉलसेंटर में काम करके अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता था। लेकिन दूसरी नौकरियां भी न जाने कौन सी गली में जा छुपी थीं जो ढूंढ़े नहीं मिलती थी। सबके सब अच्छे घरों के। न कोई ऐब, न कोई हरकतें। सिर्फ मजमे की लत थी। जिसने इन सबको सारे इलाके में बदनाम कर रखा था। कसूर इनका भी नहीं बेचारे नौकरी और छोकरी दोनों मामले में वर्जिन थे।
खैर किस्सों की ये श्रृंखला उस दिन टूटी,जिस दिन उस्ताद को सबने काले कुत्ते वाली पूनम से सीढ़ियों के पास बतियाते पाया। हुआ यूं कि जब टपरे पर इंतज़ार की हद हो गई तो सारे मुश्तंडे इलाके में झुंड में घुमने से लगे। तभी किसी ने बताया कि उस्ताद तो बेवफाई कर गये।
अपनी इस हरकत पर उस्ताद से भी कुछ कहते न बना। हंस-हंस के 'बस ऐसे ही'.... वाक्य का लच्छा बनाकर जरुर दोस्तों को निगलने को दिया। पर जवानी में गर सवालों के जवाब एक ही दिन में मिल जायें तो जिंदगी खत्म न हो जाये। अगले दिन टपरे पर बैठ कर उस्ताद ने खोपड़ी खुजाते हुए जब सार्वजनिक लहज़े में जैसे ही कहा....'हो गया'... तो यारों ने नाच-नाच कर ज़मीन की कुबड़ को भी समतल कर डाला।
सिर्फ इतना ही जान पाये कि एक दिन दुकान पर चूड़ियां खरीदने आईं। तब कच्ची कलाई पर उस्ताद का दिल ऐसा फिसला की , उसके कुल्हे की हड्डी टूटी यानि उठने का नो चांस। लड़की से पूछा तो पता चला वो भी दबी जुबां से हामी भर चुकी है। उस्ताद से वो आखिरी मुलाकात थी। मैं भी उस दिन मौजूद था। लड़की को पहले से जानता था। खासी मर्दखोर किस्म की है। उस्ताद से कहा नहीं,नहीं तो दिल के गुब्बारे में छर्रे लग जाते।
अब होना क्या था? उस्ताद का सारा ध्यान उस लड़की की ओर था। और इलाके के बाकी मुफ्तखोर आशिक अब उस्ताद के किस्से सुनाया करते। यानि अब कुछ ठीक वैसे ही हो रहा था,जैसा कि सदियों से होता आया है। सिर्फ़ एक लड़की ने बैठकबाज़ों की मंडली का सत्यानाश कर दिया। किसी शागिर्द पर नज़र डाली होती तो ठीक था, लेकिन उसने तो उस्ताद पर ही चाकू-छूरी, भाले-बरछे चला दिए।
कुछ दिनों बाद सुनने में आया कि दोनों प्रेमियों ने भागकर शादी करनी चाही...पर पकड़े गए। काफ़ी दिनों तक इलाके में हो-हल्ला होता रहा। फिर चुप्पी छा गई। हालात तब बद से बदतर हो गए जब चुप्पियां साज़िशों पर उतर आई। इलाके में उस्ताद और उनकी बिन बयाही बेग़म को गाली देना शग़ल सा बन गया। यारों ने भी कन्नी काटने में देर ना लगाई। जो पहले उस्ताद के क़िस्सों पे सीटियां बजाया करते थे..अब उस्ताद के क़िस्से से जी चुराया करते थे। अपनी हाय-हैलो जारी रही........

तुषार उप्रेती




FRUSTRATION..........




सिर पर सवार हुई फरस्ट्रेशन अब आंखें निकाल कर मुझे घूरने लगी थी। और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि उससे आंखें मिलाऊं। काफी दिनों से उसे पाल रहा था। पुचकार रहा था। वो रोज़ सोचती कि आज मेरे सब़्र का बांध टूटेगा और उसकी मौज होगी। लेकिन रोज़ रोज़ फरस्ट्रेशन की आंच पर दिमाग का चूल्हा गर्म होता। उस पर गालियां भी पकतीं। फिर न जाने किस डर से गैस खत्म हो जाती।

लेकिन कल शाम तक सब बर्दाश्त के बाहर हो गया। मन हुआ कि BOSS के कैबिन में घुसूं और दुनिया का सबसे छोटा रिज़ाइन मुंह पर दे मारुं Dear sir, मां... । फिर लगा who cares? यहां फर्क किसे पड़ता है। मेरे जैसे छत्तीसौ की लाईन जो लगी है। इसलिए अपनी शिफ़्ट पूरी करके मोटसाईकिल उठाई और सारी फरस्ट्रेशन को पेट्रोल के धुएं में उड़ाता हुआ निकल गया सड़कों पर। कभी-कभी लगता है कि मीडिया में नया होना गुनाह हो जाता है।

जब फरस्ट्रेशन का उबाल कम नहीं हुआ तो एक दोस्त को बुला लिया और गालियों के कंकड़ उछालने लगा। 'शर्म नहीं है इन लोगों को ...बेटी की उम्र की लड़की को भी नहीं छोड़ते।' ॥मैंने कहा 'छोड़ेगें कैसे यार... वो खिलाती हैं तो ये खायेंगे नहीं।'॥ दोस्त चाऊमीन निगलते हुआ बोला। पता नहीं हमें किस बात का फरस्ट्रेशन ज्यादा था। इस बात का कि बीस साल की लड़की पैंतालिस साल के आदमी के साथ सोती है या फिर इस बात का कि हमें इन लड़कियों के साथ सोने को नहीं मिलता।

जब कुछ समझ नहीं आया। तो श्रीराम सेंटर के बाहर चाय पीने आ गये। ये वो जगह हैं जहां से दिल्ली वाले सपने देखना शुरु करते हैं। कितनों की जिंदगी तो इन्हीं गलियारों पर चाय की चुस्कियों में गुजर गई।


दोस्त ने पूछा-तूने अपना सी.वी तैयार कर रखा है, ना? मैंने तुरंत कहा- हां,हां क्यों ?नहीं ऐसे ही। अख़बार में ऐड था कि जगह खाली है। वो बोला-'कल चलते हैं।' मैंनें कहा। नादान थे हम। भूल गये थे कि सिफारिश या so-called , contact,के न होने पर मायूस होना नियति है। पहले समझ नहीं आता था। लेकिन अब समझ आया कि फिल्मों में हीरो की नौकरी पक्की होने से पहले वो फोन क्यों बजता था। हमारे पास भी हीरो वाली वही फरस्ट्रेशन है। इस मामले में आजकल के हीरो मस्त हैं। बड़े-बाप के घर एप्लीकेशन देकर पैदा होते हैं। क्योंकि contact वो नु्क्ता है जिसके लगने से खुदा भी ख़ुदा हो जाता है। खैर इन सबकी परवाह किये बगैर पूर जोश से एक अख़बार के दफ़्तर की सीढ़ियां चढ़ गये। रिसेप्शन पर धरे जाने पर हमने बताया कि सी.वी देने आये हैं। नतीजतन सी.वी रिसेप्शनिस्ट को देने पड़े। उसने पहले से जमा सी.वी के कूड़े में हमारा सीवी भी पटक दिया। और कहा... 'हम call करेंगें '। हमने देखा सामने एक काला शीशा लगा हुआ था। अंदर अख़बार का दफ़्तर था। लोग वहां काले नज़र आ रहे थे। जिन सीढ़ियों पर कूद-कूद कर गये थे। वापसी पर उन पर अपना भार डालते हुए उतर रहे थे। साथ में थी तो बस वही फरस्ट्रेशन॥जो अब पंजे निकाल कर हमारी औऱ लपकने वाली थी....




-तुषार उप्रेती



सिलसिले.......

कुछ किस्से ऐसे होते हैं आपकी ज़िंदगी में.. जो लगता है पूरी दुनिया में सिर्फ आपके साथ ही हुए हों... एक ऐसा किस्सा मेरी 22 बरस की ज़िंदगी में मेरे साथ भी हुआ। लेकिन किस्सागोई के इस कॉलम में मैं वो क़िस्सा अपने ही अंदाज़ में बताना चाहूंगा।
एक लड़की थी जिससे तक़रीबन डेढ़ साल पहले तक सिर्फ़ फोन पर ही बातें होती थी.. और कुछ रोज़ पहले तक मैने इतने पुराने इस साथी का चेहरा भी नहीं देखा था। पता नहीं था मगर सोचता था आखिर कैसी है वो...ज्यादा नहीं दिनभर वो तभी याद आती थी जब उसका कोई एसएमएस या फिर फोन आता था। हमारे बीच बातों के ऐसे सिलसिले होते थे के मेरे करीबी दोस्त इस अजनबी और अनूठे से रिश्ते को लेकर मेरा मज़ाक तक उड़ाने लगे । मुझे पागल कहने लगे थे मेरे दोस्त। और तब मैने अपनी ये नाराज़गी अपने जाने-पहचाने से उस अजनबी दोस्त से भी की.. जिसकी आवाज़ ही बस एक पहचान थी मेरे लिए...

"अजब है ये सिलसिला
ना देखा तुम्हें ना तुमसे कभी मिला
जाने इस रिश्ते को क्या नाम देते हैं
यार मुझको सभी पागल कहते हैं..."


मगर ये सिलसिला कुछ रोज़ पहले ही टूट गया...उसकी बीमारी तो ठीक थी लेकिन उसकी अचानक मुझसे मिलने की बेकरारी मुझे अजब लगी। क्योंकि उसने वो कहा जिसकी गुज़ारिश इससे पहले हमारे रिश्ते में नहीं हुई थी। मेरी और उसकी तरफ से इससे पहले कभी मिलने की कोशिश नहीं की गई। मन तो तब भी नहीं था मिलने का..लेकिन जो दोस्त मुझे पागल कहते थे..उनके लाख कहने पर मुझे उस अजनबी मगर जाने-पहचाने दोस्त से और ज़्यादा जान-पहचान बढ़ाने हॉस्पिटल जाना ही पड़ा। हम तीन दोस्त बाईक से निकल दिए..और मुझे थोड़ा डर, थोडी खुशी हो रही थी और साथ ही इस बात को लेकर काफी हद तक सुकून था कि कुछ लम्हों के बाद मैं अपने दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करके खड़ा होने वाला था। आखिर जिस शख़्स के लिए मेरे दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाते थे.. मैं उसी शख़्स से मिलने वाला था। सफ़र ज्यादा लंबा नहीं था... लेकिन सफ़र लंबा लगने लगा। क्योंकि एक लंबा सिलसिला जो टूटने वाला था। इस बीच कई बार मुझे लगा कि आखिर ये सब जो मैं कर रहा हूं.. क्या वाकई ठीक है (तौल-मौल की आदत है..आखिर आम-इंसान जो ठहरा) तब एकबारगी मन तो करा कि वापिस लौट जाउं। मगर वही किस्मत, भाग्य, नियती, DESTINY वगैरह-वगैरह।
आखिरकार इतने कशमकश भरे सफ़र के बाद बाईक वहीं रूकी जो उसकी DESTINY थी...जहां उसे रूकना चाहिए था.. वो हॉस्पिटल जहां मेरी बीमार दोस्त मेरा इंतज़ार कर रही थी। बाईक गुडगांव के उसी हॉस्पिटल के आगे रूकी। रात के 10 बजे थे। सबकुछ बिल्कुल नया था मेरे लिए..इसलिए थोड़ी उलझनें भी थी मन में। और इस बीच उस कम्बख़्त कशमकश का क्या करें जो पूरे सफ़र में मेरी बाईक की पिछली सीट पर बैठी मेरे साथ चल रही थी.. फिर हावी होती गई मुझ पर । जैसे-जैसे मैं उस अंजान चेहरे के नज़दीक जा रहा था..बढ़ती जा रही थी उलझनें। और तब हद ये हो गई कि बीमार दोस्त के रूम के आगे कई बार जाकर वापिस लौटना पड़ा...क्या कहूं लाज केवल लड़कियों का ही सामान नहीं है। और फिर शर्म के मारे दोस्तों के सामने सीना चौड़ा करना तो दूर उनकी फब्तियां सुननी पड़ी। मन ही मन बैचेन दिल ने हौसला बढ़ाने के लिए दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियां गुनगुना ली। लो अब तो वो होना ही था जो मैं करने आया था। सब बंदिशें हटाकर दरवाज़ा खोला और सीधा दीदार हुआ उस चेहरे का। चेहरा आम था लेकिन मुझे खुशी बेहद थी। इतनी खुशी थी के दिल में दबानी पड़ी और पूरा माजरा तब शायद मेरी नज़रें ही बयान कर रही थी।

आखिर इक साल से भी लंबा सिलसिला जो ठहर गया था। वो चेहरा जिसकी आवाज़ में कोई जादू था और वो जादू भरी आवाज़ जो बेशक्ल थी अब तक... हां उसका चेहरा मुझे जो मिल गया था। उन लम्हों ने एक सिलसिला तो खत्म कर दिया मगर उन लम्हों की मेहरबानी रही कि एक सिलसिला और शुरू हो गया है...जो पता नहीं कब खत्म हो। शायद हो... या शायद कभी भी ना हो...
-पुनीत भारद्वाज

मामाजी......

उस दिन अचानक कई खौफ एक साथ मेरे ज़ेहन में लौट आये। मैं आज पूरे तीन सालों बाद उसी के इलाके में खड़ा था। लोग अनजाने चेहरों से ड़रते हैं। लेकिन मेरी खासियत है कि मुझे जाने-पहचाने चेहरों से ड़र लगता है।
यही जगह थी। यही पार्क था। जहां आखिरी बार मैंने उसे देखा था। उस दिन भी उसे कुछ कह न पाया। वो जानती थी। मैं जानता था। सिर्फ अल्फ़ाज़ तलाशने में देरी हो गई और पता ही न चला जिंदगी कब मेरी गिरफ्त से निकल भागी। वक्त, वक्त को धकेल कर जैसे आगे बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही आज घुम-फिर के जिंदगी ने वहीं ला पटका। जेब से फोन निकाला। ड़रते-ड़रते नंबर मिलाया। ऊंगलियां पहले से ही अपने प्रेमी नंबर से वाकिफ थी। अचानक से उससे जा लिपटी। और टेलिफोन की घंटी बजती चली गई।
‘हैलो’..।ओफ्फ ..वही मासूम आवाज़। ‘मैं बोल रहा हूं’..फिर कुछ देर चुप्पी छा गई।
ये जानने के लिए कि कहीं फोन का नेटवर्क जिंदगी की तरह द़गा न दे गया हो। मैंने चुप्पी को तोड़ते हुए कहा.. ‘पहचाना’ जवाब मिला ‘हां’।
ये लड़की बिल्कुल नहीं बदली। कभी कभी सोचता हूं प्यार की फितरत होती है, न बदलना।फिर वही रटे-रटाये मुहावरे जेहन में कौंधते हैं कि ‘जिंदगी परिवर्तन का नाम है’, ‘पानी की तरह बह जाती है’ वगैरह वगैरह। तो लगता है शायद बदल गई हो।
‘तुम्हारे इलाके मे खड़ा हूं मिलोगी मुझसे’ बिना कांफिडेंस के कहा तो डर सा लगा।
जवाब मिला ‘हां’
‘कहां’-मैंने पूछा।
‘वहीं जहां पहले मिलते थे’

वहीं जहां पहले मिलते थे। उसके इन शब्दों का मतलब मैं बखूबी जानता हूं। उसके इलाके में गलियों को निगलने वाली एक सड़क बनाई गई थी। वहीं पर पास में एक चाट-भंड़ार था। अक्सर वहीं मिलना हुआ करता था।

कुछ और कहने की हिम्मत न मुझमें थी, न उसमें। तो वक्त तय करके मैं अपना आफिशियल काम निबटाने चला गया।
..दिन के तीन बज चुके थे। इसलिए सड़क पर रिक्शा नहीं मिल रहा था। सबके सब कमबख्त सुस्ता रहे थे। ओटो पकड़ा और तयशुदा जगह पहुंचा।
वो पहले से मौजूद थी। मैं भी जाकर उसके साथ खड़ा हो गया। वो बोल रही थी मैं सुन रहा था। लेकिन शायद नहीं सुन रहा था। जब बातें अपनी मंजिल तक पहुंचने लगती तो मैं किसी पुराने किस्से को खोल बातों का रुख उस ओर मोड़ देता। पागल था, मैं। रेत को मुट्ठी में ज़ोर से दबाने से क्या वो आपकी हो जाती है। बातों मे सिर्फ इतना जान पाया कि वो अब शादीशुदा है। एक दो साल की छोटी बच्ची की मां भी है। लेकिन लगा बिल्कुल नहीं। वर्किंग वुमेन है न , शायद इसीलिये। किस्सों को ब्रेक लगा तब,जब एक आदमी ने उसका नाम पुकारा...अराधना....। कितना बेसुरा था उस मुंह से ये नाम। मैंने तो हमेशा इसे इबादत की तरह सुना था, पर ये क्या?
एक बंदा हमारे सामने खड़ा था। कहने की जरुरत नहीं वो उसका पति था। सारी बेफिक्री काफूर हो गई। मैंने थोड़ी देर के लिए खुद को जकड़न में पाया। पहला सवाल जो उस शख्स ने अपनी बीवी से नहीं मुझसे पूछा ...अमित राइट? यस , मैंने एक नकली मुस्कराहट से कहा।…. ‘तो जनाब आप हैं जो हमारी मोहर्तमा को कॉलेज में सताया करते थे’… बंदा बेबाकी से बोल गया। आखिर क्यों सताते थे इन्हें इतना?
‘अगर सताता नहीं तो मुझसे शादी न कर लेती आपसे क्यों करती?’ मैंने कुछ सहज होते हुए कहा।
फिर क्या था? जब इस इलाके में आया तो अकेला था,फिर दुकेला हुआ और अब तिकेला हो चुका था। यहां वहां की बाते हुईं। ठहाके लगे। बीच-बीच में कई बार चुप्पियों भी आईं। लेकिन कहते हैं न कि खून के रिश्ते समेटने आसान होते हैं। बेनाम रिश्ते समेटने बेहद मुश्किल। काफी देर तक वहीं खड़े रहे। रात हो चुकी थी। सड़क के कुत्ते ने भौंख कर हमें बताया कि अब राहगीरों का समय खत्म हो चुका है। मैंने भी दोनों मियां-बीवी से इज़ाज्त चाही। आगे बढ़ने ही वाला था कि उसके पति ने कहा...
‘ घर पर वान्या अकेली है। बहुत शरारती है। अगली बार आयें तो घर आइएगा। वो भी इसी बहाने अपने मामाजी से मिल लेगी’.. कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे किसी ने कोई अल्फ़ाज ज़मीन पर ज़ोर से पटक कर मेरे सर पर दे मारा हो।
हां,हां जरुर। कहता मैं आगे बढ़ गया। रास्ते में याद आया कि मेरे पास घर का पता तो है नहीं।
खैर मैं आगे बढ़ता जा रहा था । उसका इलाका पीछे छूटता जा रहा था। सारे इलाके में एक ही शब्द था जो गूंज रहा था, वो था मामाजी।............




तुषार उप्रेती.....