दीदी आई लव यू ...



सुबह उठा, मुंह हाथ थोया, दांत मांजे, तो देखा कि कुछ लम्हे मेरे पीछे नंगे पांव आने को बेताब हैं। मैंने उन्हें समझाया पर वो नहीं माने। बस अड्डे तक वो मेरा पीछा करते हुए आ गये... हमें टिकट लेना पड़ा पर उनकी मौज थी। बस धुंएं का लच्छा बनाती हुई मेरठ जा पहुंची। शहर छोटा है, लेकिन हर बार खबरों की दुनिया में किसी हादसे के गले में हाथ डालकर स्टाइलिश इंट्री लेता है। चारों ओर से अस्त-व्यस्तता। जैसे छोटे शहर में आकर बड़े शहर के लोग खुद को बड़ा समझने लगते हैं। हम भी सुपिरीओरिटी काम्पलेक्स से छाती फुलाए रिक्शे में जा बैठे। भाई साहब मेरठ कैंट जाना है। जवाब मिला बीस रुपये। एक बार में मान जायें तो मिडिल क्लास कैसे? पता था कैंट के २० रुपये ही लगते हैं। अजी हम भी दिल्ली के पालिका बाज़ार के बंदें हैं। बारगेंन तो खूब किया पर लगे २० रुपये ही। दो आदमी। एक छोटा बैग। और ऊपर से बिन बुलाए लम्हों का बोझ। कमबख्तों से कहा कि जूते खरीद लो। हरामी हैं, कहने लगे सेल नहीं लगी। वैसे भी इस शहर की तपिश नंगे पांव पर चलने वाला ही मेहसूस कर सकता है। रिक्शे वाला खींचता रहा औऱ रिक्शा आगे बढ़ता रहा। उतरे पर लम्हे हमसे पहले ही पुल पार करके नानी की गोद में जा बैठे। मैंने कान पकड़कर उन्हें दूर हटाया। नानी के पांव छुए मौसी को गले लगाया औऱ बेहन से जा लिपटा। रिश्तों के मायने छोटे शहर में नज़र आते हैं। छोटा शहर जो हर वक्त बैठकर ख्वाब बुनता रहता है। यहां बड़े ख्वाब औऱ छोटी हसरतें होती हैं। खूब फोटो खींचे। सबसे छोटी बहन का सबसे लाडला भाई जो हूं। इसलिए मुफ्त में ही ये काम कर दिया। लम्हों के हमशक्लों को फोटो में कैद किया। मामा के सखत हाथों के मुलायम पराठें खाये। यकीन मानिए कुछ पराठों को खाया जाता है औऱ कुछ से जूझा जाता है। देसी परांठा है भईया। शहर में हम इसका अल्पविकसित रुप परांठी खाते हैं। जितना फर्क लंगोट और लंगोटी में होता है। बस उतना ही फर्क परांठे और परांठी में होता है। शाम को तैयार होना था। ना जाने ये लम्हे अपने लिए कहां से लिबास ढ़ूढ़ लाये। सुंदर लग रहे थे। मैंने भी मेरठ में ही शापिंग कर ली थी। इसलिए तैयार हुआ। जैसा कि उम्मीद थी दूल्हे को मैंने ही गोद में उठाया। सबसे हट्टा-कट्टा जो हूं। रस्मों औऱ कस्मों को अंजाम दिया जाता रहा। औऱ पता ही न चला कब शादी हो गई। कल तक जिसके कान मरोड़ा करता था। वो बहन अब विदा होने को थी। आंसू आंखों से झांक रहे थे। जोर से उसे गले लगाया। और कहा दीदी आई लव यू...


उसने कभी अपने हाथ से मेरी कलाई पर राखी नहीं बांधी । न वो मेरी सगी बहन थी। फिर भी मेरे खून में रिश्तों की पैदाइश जैसी थी। बड़े होने पर मां के बाद जिस बहन को सबसे नज़दीक पाया वो यही थी। मैं खुश था उसे उसकी पसंद का लड़का मिला। बस लम्हे थे जो रो रहे थे.....

तुषार उप्रेती




3 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

bahot he accha or dil se likha hua kissa , par thordi se jalan hue pard kar ke kash mein tumhari behan hote..........

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' ने कहा…

ससुर तुम गुज़रोगे तो हम स्पेसल करेंगे... पक्का वादा...

बेनामी ने कहा…

Tushar ise jitni baar bhi padho, bas aur achha lagta jata hai....