औरत......
















वो आ़ज़ाद होना चाहती थी
कुछ बदलना चाहती थी,




वो आ़ज़ाद हुई
उसने खुद को बदला
लेकिन क्या बदला ?

बिस्तर बदले
चूल्हे बदले
मर्द बदले
किंतु मर्द वही थे
सिर्फ मुखौटे बदले

सब कुछ बदला

हालात न बदले
दर्द वही थे
बस मरहम बदले

चादर वही थी
बस तकिये बदले


वो आ़ज़ाद होना चाहती थी
कुछ बदलना चाहती थी




घुटन वही थी
बस तैखाने बदले
अंधेरा वही था
बस डर बदले


सब कुछ बदला
लेकिन हकीकत न बदली ....




वो आज़ाद होना चाहती थी
कुछ बदलना चाहती थी..........




तुषार उप्रेती


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