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ऐश्वर्या राय..तारीफ करूं क्या उसकी जिसने....




THE BEAUTY QUEEN

मिस वर्ल्ड.. हिंदी फिल्मों की सफल हीरोइन..मशहूर मॉडल या फिर कुछ और?..जेहन में जितने सवाल उभरते हैं..उनके जवाब में एक ही चमकदार चेहरा मिलता है...ऐश्वर्या रॉय...जिसकी नज़ाकत भी उससे कई बार सवाल करती है कि तुम इतनी नाज़ुक क्यों हो...अगर ऐश्वर्या के मकाम की बात करें तो फिर एक सवाल उभरता है कि एक मिडल क्लास लड़की ने न जाने कौन से ख्वाब के परों को पकड़कर आज अपने हिस्से का आसमान तलाश लिया है. एक नवंबर 1973 को मैंगलोर में बॉयोलोजिस्ट पिता कृष्ण राय और मां वृंदा राय के घर जब ऐश्वर्या का जन्म हुआ तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन इस लड़की के हाथों में जहां भर की खुशियों की रेखाएं खीचेंगी...एक आम हिंदुस्तानी लड़की की तरह ऐश्वर्या की परवरिश हुई...ऐश्वर्या के जन्म के बाद उनके मां-बाप मुंबई आ गए जहां आर्य विद्या मंदिर में उनका दाखिला करा दिया गया,..इसके बाद जय हिंद कॉलेज में एक साल तक पढ़ने के बाद ऐश्वर्या ने रुपारेल कॉलेज से अपनी HSC कम्पिलीट की..और मन ही मन एक आर्किटेक्ट बनने का सपना देखने लगीं...इस बीच ऐश्वर्या ने मॉडलिंग में भी किस्मत आजमाने की सोची...और 1994 में मिस इंडिया कॉन्टेस्ट में सुष्मिता सेन के बाद फर्सट रनर अप रहकर भी उन्होंने मिस फोटोजैनिक का अवार्ड जीता...इसके बाद उन्हें भारत की ओर से लंदन में आयोजित मिस वर्ल्ड कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने का मौका मिला.....इसके बाद जो हुआ उसे न तो दुनिया भूली और न हम...आज भी वो लम्हा लोगों को याद है जब जादूभरी आंखों वाली ऐश्वर्या के सिर पर मिस वर्ल्ड का ताज सजाया गया था...और हर भारतीय खुद को भावुक होने से रोक नहीं पाया....

AN ACTRESS--
ग्लैमर के आकाश पर जितनी तेज़ चमक ऐश्वर्या के आने के बाद हुई उतनी शायद ही उनसे पहली कभी देखी गई हो....उन्हें यूं तो कई फिल्मों के ऑफर आ रहे थे..लेकिन ऐश्वर्या ने शुरुआत की जाने माने निर्देशक मणिरत्नम की फिल्म इरुवर से..1997 में आई इस फिल्म से ऐश्वर्या के हुस्न के जादू ने साउथ से लेकर मुंबई तक सबको अपना कायल बना दिया..इसी साल बॉबी देओल के साथ ऐश्वर्या की पहली हिंदी फिल्म और प्यार हो गया भी रिलीज़ हुई...फिल्म तो नहीं चली पर ऐश का जादू सबकपर छाने लगा...1998 में तमिल फिल्म जींस में ऐश्वर्या की खूबसूरती के कायल तो उन्हें आठवां अजूबा ही मानने लगे....लेकिन ऐश्वर्या की जिंदगी में एक ब्रेकथ्रू तब आया जब 1998 में हम दिल दे चुके सनम रिलीज़ हुई....इस फिल्म ने ऐश्वर्या को दिया उनका पहला फिल्मफेयर अवार्ड...इस फिल्म से ऐश्वर्या की जिंदगी में दो चीजें एक साथ आई पहली कामयाबी दूसरा सलमान खान....इसके बाद तो इन दोनों के इश्क के चर्चे हर जगह हुए....1999 में आई ताल ने ऐश्वर्या के अंदर छूपी एक मौच्योर एक्ट्रैस को उभारा तो वहीं जोश ने उनकी चुलबुली हरकतों से हमें रुबरु कराया...फिर आई देवदास जिसमें पारो के रोल में ऐश्वर्या की पर्फार्मेंस को न केवल क्रिटिक्स ने सराहा बल्कि इस रोल के लिए ऐश को बेस्ट एक्ट्रैस का दूसरा फिल्म फेयर अवार्ड मिला...जैसे जैसे फिल्में बढ़ती गई ऐश की लोकप्रियता भी बढ़ती गई.....कभी हमने उन्हें रविन्द्र नाथ टैगोर की चोखेर बाली बनते देखा तो कभी हमें वो रेनकोर्ट में एक साधारण औरत के किरदार में नज़र आई...जो एक गुमनाम जिंदगी जी रही है.....लेकिन इन सबके बीच ऐश्वर्या की मास अपील बढ़ती गई..और उन्होंने हॉलीवुड के भी कई प्रोजेक्ट्स किये...जिनंमें BRIDE & PREJUDICE ..MISTRESS OF SPICES..और THE LAST LEGION जैसी फिल्में खास रही...अपनी फिल्मों के अलावा कान फिल्म फेस्टिवल में बतौर जूरी मेंबर बनकर भी ऐश्वर्या ने काफी वाहवाही बटोरी....इस बीच धूम टू में जहां ऋतिक के साथ ऐश के किसिंग सीन के चर्चे रहे तो वहीं गुरु में ऐश की संजीदगी के कायलों की भी कमी नहीं है...इसे ऐश्वर्य का जादू ही कह सकते हैं कि लंदन के मैडम ट्यूसैड्स म्यूजियम में उनका स्टैच्यू रखा गया है...बंटी और बबली में कजरारे कजरारे करने वाली ऐश्वर्या ने जब 2007 में अमिषेक बच्चन से शादी की तो न जाने कितने गुमनाम आशिकों के दिल टूट गये होंगे...हाल फिलहाल में आई जोधा अकबर और सरकार राज ने ऐश्वर्या को बतौर एक्ट्रैस औऱ ज्यादा उभारा है और इन्हें देखकर तो यही लगता है कि भले ही वो आज देश के एक जाने-माने घराने की बहू हों लेकिन ऐश्वर्या ने अपना वजूद खुद बनाया है..


तुषार उप्रेती

शाहरुख खान...एक महानायक का उदय!


नब्बे के दशक में बहुत कुछ बदल रहा था...दुनिया ग्लोबल विलेज हो गई थी...ऐसे में सालों से परदेस में बैठे भारतीयों को हिदुंस्तान की याद आई....वो जागे और अपनी जड़ों की तलाश करने लगे......इस बीच हमारे सिनेमा में भी बदलाव हुआ..उसने अपने वक्त के नए नायक की तलाश की..लेकिन हर जगह उसे वही चालू मक्कारियां नज़र आई...जो आज से पहले भी फिल्मों मे दिखाई जा चुकी थी....बासी कहानियां..और बासी चेहरे....इस बीच दिल्ली का एक नौजवान अपने ख्वाबों को बुनकर मुंबई चला आया था...उसे नहीं मालूम था मंजिल कहां होगी...कैसी होगी..मालूम था तो बस इतना की उसमें काबिलियत है

The rising of a star…..
शाहरुख खान....एक नाम जो अपने आप में बुलंदियों की कहानी कहता है.... कहने की जरुरत नहीं कि इस शख्स ने अपनी फिल्मों से हमारी फिल्म इंडस्ट्री को कैसे नई हवा दी...मासूम शक्ल...औऱ चेहरा ऐसा जिससे कैमरा प्यार करता..एक ऐसा शख्स जो टीवी में फौजी बनकर अपने दुश्मनों को धूल चटा चुका था.अब बॉलीवुड में भी अपनी किस्मत आजमाना चाहता था..

Personal life---लेकिन हर फैसले की एक कीमत होती है..और शाहरुख ने भी उस कीमत की कई किश्तें चुकाईं...दिल्ली में 2 नबंबर 1965 को जन्मे शाहरुख ने अभी ठीक से होश भी नहीं संभाला था कि उनके पिता ताज मौहम्मद खान का निधन हो गया उसके बाद अपनी मां बेगम लतिफ फातिमा के पल्लू से बंधे रहकर भी शाहरुख ने ये बता दिया कि वो कोई साधारण इंसान नहीं है...दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में उन्हें न केवल बेस्ट स्टूडेंट होने की वजह से SWORD OF HONOUR के सम्मान से नवाज़ा गया..बल्कि स्कूल की क्रिकेट टीम में भी उन्हें जगह मिली....इसके बाद हंसराज कॉलेज से एक तरफ जहां उन्होंने इकोनॉमिक्स में अपनी ग्रेजुएशन कम्पलिट की बल्कि बैरी जॉन के एक्टिंग स्कूल से एक्टिंग की कई बारिकियां भी सीखीं...कॉलेज में ही उनकी मुलाकात गौरी से हुई...और शाहरुख दिल ही दिल में उन्हें काफी चाहने लगे...इस बीच शाहरुख की मां उन्हें दुनिया में अकेला छोड़ कर चली गई...और शाहरुख के पास सिवाए अपने सपनों के कुछ न बचा....जिसके बाद उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया....ये 1991 की बात है.....अपनी पहली फिल्म की रिलीज़ से कुछ पहले ही शाहरुख ने गौरी से शादी कर ली.....

Mumbai -City of dreams---

मुंबई आने पर शाहरुख को पता चला की एक टीवी स्टार होने के नाते उन्हें लोग जानते तो हैं...लेकिन उनका सफर आसान नहीं होने वाला..लेकिन खुद़ा को शायद कुछ औऱ ही मंजूर था और शाहरुख की दीवानगी का आलम पहली फिल्म से ही छाने लगा था.शाहरुख ने कभी राजू बनकर चमत्कार किया..तो कभी माया मेमसाहब जैसी फिल्मों से खुद को जोड़ा...इन फिल्मों से शाहरुख को शोहरत तो मिली लेकिन कामयाबी नहीं...
फिर एक ऐसा मोड़ आया जहां से इस सितारे में चमक पैदा होनी शुरु हुई...फिल्म थी बाज़ीगर...जहां शराफत के नकाब में छिपे एक एंटी-हीरो को जन्म लेते हमने देखा... इसके तुरंत बाद डर में एकतरफा प्यार में पागल एक सनकी आशिक के रोल में भी शाहरुख को खूब वाहवाही मिली...इस फिल्म ने शाहरुख के करियर को एक ऐसे अंजाम तक पहुंचाया जिसकी उन्हें तलाश थी...

Rise of a King---

अब तक जो शख्स हिंदुस्तान में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा चुका था..उसने जब दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे में राज मल्होत्रा के किरदार को जिया तो विदेशों मे बैठे भारतीयों के दिलों पर भी वो राज करने लगा...लोग शाहरुख में इंडस्ट्री के नए बादशाह को देखने लगे...
लोगों को उनका नया सुपरस्टार मिल चुका था...जो कभी किसी लड़की के लिए जुगनुओं के पीछे भागने की बातें करता..
तो कभी परदेस में बैठ कर दीवाने दिल के किस्से सुनाता.. शाहरुख की फिल्मों के इन्हीं उतार-चढावों ने उन्हें कहने पर मजबूर कर दिया की...
और इसके बाद शाहरुख का सितारा दिनों-दिन बुलंद होता गया...कुछ कुछ होता है....जोश..मोहब्बतें..कभी खुशी कभी गम ने जहां शाहरुख की पॉपुलैरिटी में चार चांद लगाएं..तो वहीं देवदास..चलते-चलते..मैं हूं न..स्वदेस...कल हो न हो..और वीर ज़ारा जैसी फिल्मों से शाहरुख ने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा लिया...इस बीच ओम शांति ओम और चक दे इंडिया जैसी फिल्मों ने शाहरुख का कद इतना बढ़ा दिया है...कि उन्हें छूना तो दूर उनकी ऊंचाई का अनुमान लगाना भी मुश्किल होता जा रहा है...अगर आने वाली फिल्मों की बात करें तो रब ने बना दी जोड़ी और बिल्लू बार्बर के दम पर एक बार फिर शाहरुख की बादशाहत को परवान चढ़ते हम देख पायेंगे....लेकिन इतनी शोहरत औऱ बुलंदियों के बाद इतना तो तय है कि शाहरुख के पास अब खुद अपने कामयाबियों का हिसाब रखने का वक्त नहीं है.....


तुषार उप्रेती....

अमिताभ होने का मतलब!


अमिताभ बच्चन...इंडस्ट्री का वो नाम जो अब किसी अल्फाज़ का मोहताज़ नहीं....
अमिताभ बच्चन...इंडस्ट्री का वो कलाकार जिसे लोग अपने आप में अभिनय का स्कूल मानते हों...
अमिताभ बच्चन...जिसके नाम का मतलब ही एक ऐसी रोशनी है जो कभी बुझती नहीं....
आज उसी अमिताभ का जन्मदिन है जिसने कभी एंग्री यंग मैन बनकर हम सबकी भड़ास को पर्दे पर जिया...कभी कुली बनकर ज़माने का बोझ उठाया...तो कभी विजय बनकर अपने बचपन का बदला लिया..वही अमिताभ जिसके साथ हमने सिनेमा और समाज को बदलते देखा...आज 66 साल का हो गया है...आंखों मे जिसकी 40 साल का अनुभव छिपा है...जिसकी आवाज़ में ही उसकी पहचान है...आज उसी अमिताभ का जन्मदिन है.....
11 अक्टूबर 1942 को जन्मा ये शख्स एक दिन एक्टर ऑफ द मिलेनियम कहलाएगा..ये किसी ने सोचा भी न था...हांलाकि 1969 में आई अपनी पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी में बेस्ट न्यूकमर के नेशनल अवार्ड के बावजूद अमिताभ को कामयाबी के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा...1971 में आई आनंद ने उन्हें बेस्ट स्पोर्टिंग एक्टर का फिल्म फेयर अवार्ड तो दिलाया लेकिन सोलो एक्टर के रुप में स्थापित होने में अमिताभ को इसके बावजूद लंबा वक्त लगा...और इस बीच अमिताभ ने बॉम्बे टू गोवा....परवाना..रेशमा और शेरा..गुड्डी जैसी फिल्मो मे काम किया...लेकिन 1973 में प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी झंझीर अमिताभ को एंग्री यंग मैन का वो खिताब दिलाया...जिसके पास पहुंचने का सपना हर कलाकार देखता है...
इस फिल्म में अमिताभ की संवाद अदायगी लोगों के दिलो-दिमाग पर हावी हो गई...
हांलाकि इसके बाद मजबूर...रोटी कपड़ा और मकान...फरार औऱ चुपके-चुपके जैसी अमिताभ की कई फिल्में रिलीज़ हुई लेकिन पब्लिक के दिल में अमिताभ की जो इमेज़ थी उसे भुनाया 1975 में आई य़शचोपडा़ की दीवार ने...जिसमें हालात के मारे एक शख्स के फर्श से अर्श तक के सफर को अमिताभ ने बखूबी जिया है...
और इसके बाद 1975 में ही आई शोले...जिसने अमिताभ को दिया वो मकाम जिसे छूने का हौंसला अच्छे अच्छों मे नहीं है...जय जो पूरी फिल्म में लगभग खामोश सा रहता है..आखिरी में वो जब अपने दोस्त की खातिर मरता है तो इस सीन को देखने वालों की पल्कें भीगे बिना नहीं रहती..
लेकिन अमिताभ में इस संजीदगी के अलावा एक रुमानीपन भी था जो कभी कभी..से लेकर सिलसिला तक के अपने फिल्मी पड़ावों मे उन्होंने दिखाया है...तो वहीं दूसरी तरफ अपनी निजी जिंदगी में उन्होंने 1973 में जया भादुड़ी से शादी के बाद भी रेखा से अपने प्यार का सिलसिला जारी रखा था....
वैसे हर किरदार के साथ अमिताभ ने खुद को तलाशा है..उन्होंने कभी डॉन बनकर सबको ये जतलाया कि वो छोरा गंगा किनारे वाला कहलाना पसंद करेंगे तो कभी एंथनी बनकर
आइने के सामने खुद की मर्हम-पट्टी कर डाली..
दरअसल अमिताभ की शख्सियत में जो कुछ भी था उसे उन्होंने अपने अलग-अलग रोल में उडेल दिया है...इसलिए शायद पब्लिक उन्हें ढ़ेरों नामों से जानती है कोई उन्हें विजय कहता है तो किसी के लिए वो एंथनी है..कोई उन्हें डॉन बुलाता है तो किसी के लिए वो शहंशाह...
जब एक शख्स के इतने अक्स सामने आयें तो दिल ये मानने से इनकार कर देता है कि ये महज़ कोई आदमी है....और कुली की शूटिंग के दौरान चोट लगने पर जितने हाथ अमिताभ के लिए दुआ करने के लिए उठे उससे कम से कम ये तो काफी पहले साबित हो गया था कि अमिताभ होने का मतलब अपने आप में सिनेमा की आधी सदी होना है...
बॉलीवुड को एक्टिंग की नई परिभाषा देने वाले अमिताभ को वैसे राजनीति कभी रास नहीं आई...1984 में अपने दोस्त राजीव गांधी के न्यौते पर उन्होंने इलेक्शन लड़ा भी और जीता भी लेकिन जल्द ही बोफोर्स घोटाले में नाम आने और तमाम राजनीतिक फज़ीहतों के बाद अमिताभ ने राजनीति से तौबा करना ही बेहतर समझा...हांलाकि कि इसके बाद हम और अग्निपथ की कामयाबी से अमिताभ ने अपनी ज़ोर दार वापसी दर्ज कराई....जिसमें अग्निपथ के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर के नेशनल फिल्म अवार्ड से भी नवाज़ा गया..पर जल्द ही इंसानियत और खुदा गवाह जैसी फिल्मों के failure से सबको लगने लगा कि ये सितारा अब जल्द ही अस्त हो जाएगा....
इस बीच एबीसीएल कंपनी के निर्माण और उससे हुए करोड़ों के घाटे से अमिताभ के सामने सुपरस्टार बनने के बाद पहली बार FINANCIAL क्राइसिस खड़ा हो गया.....लेकिन टीवी पर कौन बनेगा करोडपति ने अमिताभ को जल्द ही टीवी का शहंशाह बनाकर उन्हें इस स्थिति से भी उबार लिया....हाल के कुछ सालों में मोहब्बतें...एक रास्ता द बॉड ऑप लव...कभी खुशी कभी गम..बागबान..खाकी..ब्लैक..बंटी और बबली..सरकार...और द लास्ट लियर जैसी फिल्मों में काम करके अमिताभ ने ये साबित कर दिया कि उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका कोई जवाब नहीं.........

आज भले ही अमिताभ जवान न हों पर आज भी जब किसी गांव मे अमिताभ की कोई फिल्म चलती है,तो गांव का नौजवान एक बूढ़े़ की बगल से चींखता है कि मार अमिताभ..साले को और मार...ये अमिताभ की उस शख्सियत का महज़ एक टुकड़ा है जिसे लोग जानते हैं...असल में अमिताभ बच्चन होने का मतलब जानने के लिए एक उम्र कम पड़ सकती है....




तुषार उप्रेती

रेखा जो कई बिन्दुओं से बनी.....


फिल्मी दुनिया में बहुत कम एक्ट्रैस ऐसी आई हैं जिन्हें देखकर एक आम-आदमी ने ये समझा है कि एक औरत की तकलीफें और अकेलेपन में कई कहानियां छिपी होती हैं... अपनी पहली हिंदी रिलीज्ड फिल्म 'सावन-भादो' से इंडियन सिनेमा में कदम रखने वाली रेखा के साथ भी शुरु से कई कहानियां जुड़ी हुई हैं...जिन्हें उन्होंने अलग-अलग वक्त पर बयां किया है...
10 अक्टूबर 1954 को चेन्नई में जन्मी भानुरेखा गनेशन यानी रेखा ने जब होश संभाला तो पाया कि उसका बचपन बेहद अकेलेपन में गुज़रा है...तेलुगु एक्ट्रैस पुष्पापल्ली की बेटी रेखा को कभी बाप का प्यार नसीब नहीं हुआ..बहुत बाद में जाकर 1970 के दशक में एक मैग्ज़ीन को दिये इंटरव्यू में रेखा ने ये जब ये ख़ुलासा किया कि वो जाने-माने तमिल एक्टर जैमिनी गनेशन की औलाद हैं तो सबकी आंखें खुली की खुली रह गई...
दरअसल अपनी जिंदगी की शुरुआत से लेकर अब तक रेखा ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं...अपनी पहली ही फिल्म दो शिकारी में एक्टर विश्वजीत के साथ रेखा के किसिंग सीन ने इतना हंगामा मचाया था की बाद में सेंसर इश्यू की वजह से इस फिल्म को रिलीज़ नहीं होने दिया गया...लेकिन अपनी पहली रिलीज्ड़ फिल्म सावन-भादो से रेखा की कामयाबी का सिलसिला जो शुरु हुआ उसके इंडियन सिनेमा को आगे चलकर दी पहली ओरिजनल दीवा..
ये वही रेखा थी जिनकी शुरुआती फिल्मों 'गोरा और काला' , 'रामपुर का लक्ष्मण' और 'कहानी किस्मत की' को देखकर लोगों ने उन्हें मोटी और नॉन ग्लैमरस बताया था...लेकिन रेखा कि जिंदगी में 1976 में उस वक्त एक बदलाव आया जब उन्हें दुलाल गुहा कि फिल्म 'दो-अनजाने' में अमिताभ बच्चन के अपोज़िट एक OVER-AMBITIOUS एक्ट्रैस का किरदार निभाने को मिला..
इस फिल्म के जरिये रेखा ने न केवल अपने लुक्स बल्कि अपनी एक्टिंग से भी सभी क्रिटिक्स का मुंह बंद कर दिया...इसके बाद 1978 मे विनोद मेहरा के साथ रेखा ने 'घर' फिल्म में काम किया...जिसमें उन्होंने एक शादीशुदा रेप विक्टिम का रोल अदा किया...हांलाकि कुछ जानकारों का ये मानना है कि विनोद मेहरा औऱ रेखा इस फिल्म के रिलीज़ होने से पहले ही घर बसा चुके थे..लेकिन रेखा ने इस बात को हमेशा सिरे से खारिज किया है....,,इसी साल रेखा और अमिताभ की 'मुक्द्दर का सिंकदर' को भी लोगों ने बहुत पसंद किया...खासतौर से इस फिल्म में रेखा पर फिल्माया गया 'सलामे-इश्क' गाना लोगों की जब़ान से आज तक नहीं उतरा है....
इस फिल्म में रेखा और अमिताभ की ऑन-स्क्रीन कैमेस्ट्री लोगों को इतनी पसंद आई की उसे कई डॉयरेक्टर्स ने आगे चलकर कई फिल्मों मे दोहराया...इसकी एक वजह रेखा-और अमिताभ का रियल लाइफ कनेक्शन भी रहा....और 'मिस्टर नटवर लाल' फिल्म में आय़े 'परदेसिया ये सच है पिया' गाने को लोगों ने इन दोनों के प्यार का एनथम मान लिया...
1981 में आई सिलसिला में यूं तो अमिताभ और रेखा आखिरी बार एक साथ नज़र आये लेकिन फिल्मी पंडितों ने इस फिल्म में रेखा-अमिताभ-और जया भादुडी की जिंदगी के फलसफे की बात कही है.....वैसे 2004 में सिमी ग्रेवाल को दिया इंटरव्यू में रेखा ने भी अमिताभ के बारे में कई खुलासे किये थे...
अमिताभ से भले ही कितनी भी दूरी हो लेकिन अभिनय से रेखा का हमेशा नज़दीकी नाता रहा है..1981 में ही रेखा को अपनी चुलबुली पर्फार्मेंस के लिए फिल्म 'खूबसूरत' में बेस्ट एक्ट्रैस के फिल्म-फेयर अवार्ड से नवाजा़ गया तो वहीं इसके बाद 1982 में आई 'उमराव जान' ने रेखा के एक्टिंग करियर को नई बुलंदी दी...इसमें निभाये अमीरन के किरदार में हमारे जमाने की नाइंसाफी को लोगों ने खोज़ निकाला...
.....1980 का दशक रेखा के लिए वैसे भी काफी अच्छा रहा..इस दशक में रेखा एकमात्र ऐसी अभिनेत्री रही जिन्होंने एक तऱफ 'खून भरी मांग' जैसी कर्मिशियल फिल्में कर के अपने करियर को एक तरफ नया लुक दिया तो वहीं 'कलयुग'..'उत्सव'..'बसेरा' जैसी फिल्मों से ये साबित किया कि रेखा होने का मतलब हर बार खुद के आगे अपनी रेखा की सीमा से बड़ी रेखा खींच देना है....
इसके बाद भी रखा ने खुद को हमेशा नई चुनौतियों दीं और उनका सामना किया एक तऱफ 90 के दशक में अपने फिल्मी करियर में उन्होंने मीरा नायर की 'कामसूत्र' जैसी फिल्में करके क्रिटिक्स से दुश्मनी मोल ली तो वहीं अपनी निज़ी जिंदगी में दिल्ली बेस्ड बिजनैसमैन मुकेश अग्रवाल से शादी की....अभी मुकेश अग्रवाल से उनकी शादी की खबर ठंडी भी नहीं हुई थी कि मुकेश की आत्महत्या की खबर आ गयी ...हाल के वर्षौं मे खिलाडियों के खिलाड़ी,...जुबैदा..कोई मिल गया औऱ परिणिता जैसी फिल्मों मे भी रेखा ने अपने आप को तराशा है...शायद यही वजह है कि अपने 37 साल लंबे फिल्मी सफर में रेखा बरकरार रहीं जबकि उनके इर्द-गिर्द चहकने वाली बाकी अभिनेत्रियों को समय ने निगल लिया......
रेखा को अगर एक सेंटेन्स में डिफाइन करना हो तो हम कहेंगे....पहेली है..जो बिल्कुल अकेली है...
बकौल गुलजार " लब हिलें तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं ,आपकी आंखों में क्या साहिल भी मिलते हैं कहीं . आपकी खामोशियां भी आपकी आवाज हैं-

तुषार उप्रेती

ये श्याम बेनेगल कौन है ?


दिल्ली के ताज पैलेस होटल में हम घुसे। माहौल काफी रंगीन था। कुछ जाने-पहचाने चेहरे आसपास खड़े बतिया रहे थे। टीवी सीरियल हम लोग फेम बाबुजी भी थे , तो नटवर सिंह और जया जेटली भी टेबल पर रखे अंगुर गप्प से निगल रहे थे । वैसे कुछ और चेहरे भी थे जिन्हें अपने बचपन के दिनों मे मैं दूरदर्शन पर देखा करता था। नाम याद नहीं। लेकिन अपने को जिस आदमी से सबसे ज्यादा मतलब था । वो थे श्याम बेनेगल , जो दिखाई नहीं दे रहे थे। या यूं कहें कि हमारी आंखें उन तक पहुंच नहीं पा रही थी। वैसे शूट पर आने से पहले ही मेरा दिल टूट चुका था। कारण सिर्फ इतना था कि कैमरापर्सन ने मुझसे पूछ लिया था..श्याम बेनेगल कौन है ? और मैंने उसे बौखलाहट में जवाब दिया कि संजय लीला भंसाली को जानते हो न , बस उसका बाप है। खैर मामला था एक बुक लांच का। पार्टी में सरगर्मियां थोड़ी तेज़ हुई। देखा तो पाया एन.डी.टी.वी वाले किसी को गन-माईक लगाकर शूट कर रहे हैं। तुरंत ताड़ गये कि श्याम दा ही हैं। अपन भी हो लिये। इच्छा तो कब से थी पर दादा के दर्शन आज हुए । सुना था काफी सज्जन आदमी हैं। लग भी रहे थे। और थे भी। हमने भी कैमरा ,माईक, बीच में घुसेड़ दिया। हांलाकि दूसरे शूट्स की तरह उनसे बात करने वालों की मारामारी यहां नहीं थी। फिर भी हम कुछ ज्यादा ही फुदक रहे थे।
पहला सवाल पूछा- श्याम दा आज दिल्ली बुक लांच पर आना हुआ और जामिया मिलिया इस्लामिया ने भी आज आपको सम्मानित किया है। तो इस बार का विजिट लकी रहा?
श्याम दा- जी, खुशी तो बहुत होती है,जब कोई सम्मानित करता है। इस बार जामिया ने डाक्टेरेट की उपाधि दे दी तो काफी अच्छा लग रहा है।
दूसरा सवाल- खबर है कि गंभीर फिल्में बनाने वाले श्याम बेनेगल अब महादेव के जरिये कामेड़ी फिल्म में हाथ आजमा रहे ?
श्याम दा- ठीक सुना है। वैसे कामेड़ी मेरे लिये कोई नई बात नहीं है। मंड़ी भी एक किस्म की कामेड़ी फिल्म थी। इस बार महादेव में भी कुछ कामिक स्टायर होंगे। देखें क्या परिणाम होता है।
तीसरा सवाल- महादेव के कैरेक्टराइज़ेशन के बारे में कुछ बताएं?
श्याम दा- जी फिल्मों का कैरेक्टराइज़ेशन एक अहम हिस्सा है। कोई भी फिल्म अकेले plot पर खड़ी नहीं रह सकती। इसलिए कैरेक्टरर्स के जरिये उस इंटरेस्टिंग बनाए रखना चाहिए।
चौथा सवाल- आपके उस चर्चित प्रोजेक्ट बुद्दा का क्या हुआ ? सुना है श्रीलंका में उसके लिए १००० एकड़ का प्लाट खरीदा गया है।
श्याम दा- उस पर अभी काफी काम होना बाकी है। हां, ये इंड़ो-श्रीलंकन प्रोजेक्ट है जिसे पूरा करने में अभी काफी समय लगेगा। अभी तो स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है।
पांचवा सवाल- वैसे काफी समय हो गया आपको कोई फिल्म बनाए, अब क्या आपका कमबैक माना जाये ?
श्याम दा- नहीं,नहीं ऐसी कोई बात नहीं। उम्र जरुर हो चली है पर अभी तो काफी काम करना है। थोड़ा थक गया था तो ब्रेक ले लिया।
आखिरी सवाल- एक फिल्म आपने बनाई थी। सुसमन इतना बता दीजिए की वो कहां मिलेगी।
(ये सवाल आफ कैमरा पूछा गया)
श्याम दा- मुझसे ही ले लिजिएगा। (थोड़ा झिझके, फिर संभलकर बोले) वो आपको एन.एफ.डी.सी से मिलेगी।
दादा आगे बढ़ गये और किसी ने उनसे कोई सवाल नहीं पूछा


तुषार उप्रेती

जम कर पिक्चरें बनाएंगें..सुधीर मिश्रा
















सुधीर मिश्रा मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री का वो नाम हैं जिसकी काबिलियत को
काफी देर पहचाना गया 'जाने भी दो यारो' से लेकर इस 'रात की सुबह नहीं' और 'धारावी' से लेकर 'हज़ारों ख्वाइशें ऐसी' , 'चमेली' , 'खोया खोया चांद' तक उन्होंने बहुत कम फिल्मों मे काफी कुछ कह दिया है। दिल्ली में पिछले दिनों एक फिल्म फेस्टिवल के दौरान उनसे गलती से मुलाकात हो गई और यकीन मानिए गलती से काफी कुछ सिखने को मिल गया।


मैं- आप यहां कैसे?
सुधीर मिश्रा- बस कुछ दोस्तों ने बुला लिया तो हम आ गये। वैसे भी जहां-जहां सिनेमा का जमघट होता है, वहां हम पहुंच ही जाते हैं।




मैं- किस तरह का सिनेमा पसंद है आपको?
सुधीर मिश्रा- देखिए सिनेमा, सिनेमा होता है। अच्छा बुरा नहीं। कई लोगों की मेहनत छुपी होती है ,उसके पीछे। वैसे ईरान वाले अच्छा काम कर रहे हैं।






मैं- यानी आप भी माजिद मजिदी और मौहसिन मखमलबाफ के फैन हैं।



सुधीर मिश्रा-देखिये मुझे लगता है कि लोगों को अब कुछ दूसरे फिल्मकारों की फिल्में भी देखनी चाहिए। जहां तक इन दोनों फिल्मकारों का सवाल है। मैंने इनकी ज्यादा फिल्में नहीं देखी हैं।






मैं- पिछले दिनों एक फिल्म देखी नाम था 'जाने भी दो यारो' उसमें एक नाम पढ़ा सुधीर मिश्रा।वहां से आज इस मकाम पर पहुंच कर खुद में कितने बदलाव महसूस करते हैं?( जाने भी दो यारो का स्क्रीन प्ले सुधीर मिश्रा ने लिखा है)
सुधीर मिश्रा- बदल तो मैं गया हूं। पिछले बीस सालों से भी ज्यादा समय से इंडस्ट्री में हूं। बीच में 80 और 90 के दशक में कुछ खराब किस्म के लोगों का कब्ज़ा हो गया इस इंडस्ट्री पर। अब हालात थोड़े ठीक हैं। नए लोग काफी आ रहे हैं। हम भी हैं। खुदा ने चाहा तो आने वाले दस-बीस सालों तक जम कर पिक्चरें बनाएंगें।



मैं- आपकी नई फिल्म आने वाली है,'खोया खोया चांद' उसके बारे में कुछ बताएं?
सुधीर मिश्रा- खोया खोया चांद मे कहानी है इस फिल्म इंडस्ट्री की। फिल्म बनकर तैयार है। इसलिए ज्यादा तो नहीं बताऊंगा। लेकिन इतना जरुर कहूंगा कि एक खास समय को कैमरे से फिल्माना आसान काम नहीं है।






मैं- ट्रैफिक सिग्नल में आप मुंबईया भाई के किरदार में दिखाई दिये थे। अब कब हम आपको स्क्रीन पर देखेंगे?

सुधीर मिश्रा- मधुर तो अपना दोस्त है। उसने कहा इस किरदार को करो तो मैंने कर लिया। वैसे मैं इससे पहले हज़ारों ख्वाइशें ऐसी में कुछ पल के लिए नजर आया था। गौर से देखिएगा, शायद खोया खोया चांद में भी नज़र आ जाऊं। जब कोई जूनियर कलाकार नहीं आता तब डॉयरेक्टर होने के नाते उस किरदार को जीना पड़ता है।



तुषार उप्रेती




मैं न बोलूंगी...


विद्या बालन इंडस्ट्री का एक जाना माना नाम हैं। पिछले दिनों दिल्ली में एक ज्वैलरी लांच के मौके पर उनसे मुलाकात हो गई। फिर क्या था पत्रकार अपना काम कर गया। अपने सवालों से उन्हें घेरने की पूरी कोशिश की।



मैं- विद्या सबसे पहले ये बताएं कि आपको खुद कितना ज्वैलरी से प्यार है?
विद्या- देखिए मुझे ज्वैलरी ज्यादा पसंद नहीं। मैं ज्वैलरी का इस्तेमाल सिर्फ उतना ही पसंद करती हूं जितने में ये आपके व्यक्तित्व को निखारे। इसलिए मैं खुद भी कान में टॉप्स और हाथों में चुड़ियां पहनना ही बेहतर समझती हूं। ज्यादा एक्सपेरिमेंट मुझको पसंद नही।


मैं- आपकी फिल्म भूल-भूलैया का डब्बा गोल हो गया आपको क्या लगता है कहां कमी रह गई?
विद्या- आपको ये किसने कह दिया। इस फिल्म को काफी अच्छे रिस्पॉंन्स मिल रहे हैं। मेरे कैरेक्टर को भी काफी सराहा जा रहा है। फिल्म तो हाऊस फुल जा रही है।

मैं- आपकी फिल्म एकलव्य को ऑस्कर में भेजने को लेकर एक विवाद घिर आया है? इस पर आपकी प्रतिक्रिया।
विद्या- देखिए मैं इस पर कुछ भी कहना नहीं चाहती। फिलहाल मामला कोर्ट में है।

( इसके बाद विद्या की पी.आर को ये लगने लगा कि इस लौंडे को अगर छूट दे दी तो ये सारे सवाल ऑस्कर विवाद से रिलेटिड पूछेगा। ऐसे में उनका ज्वैलरी लॉन्च दब जाएगा। इसलिए उसने मुझे रोकने की कोशिश की। मैं भी जाते –जाते एक सवाल और पूछता आया। शायद वहां कोलगेट छाप स्माइल करने वाले पत्रकारों कि जरुरत थी। )

तुषार उप्रेती