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हर रंग में उमंग है.... होली प्रोमो




हर रंग में उमंग है

हर रंग में तरंग है

रंगों भरी होली में..

हर तरफ़ हुड़दंग है

और जब इस हुड़दंग में

मिल जाए दिलों की मस्ती

तब भूलकर हर गिले-शिक़वे

रंगों में डूब जाए हर हस्ती..

आओ बिखेरे प्यार के रंग

मनाए होली इक-दूजे के संग...

- पुनीत भारद्वाज

आज़ादी आतंकवाद के ख़िलाफ़....

    • ये एक न्यूज़ फ़ीचर है जो मैने आज़ादी की 61वीं सालगिरह पर लाइव इंडिया चैनल के लिए बनाया...





15 अगस्त 1947..

वो ऐतिहासिक दिन..
जब हमें आज़ादी मिली।।



आज़ादी कुछ कहने की..

आज़ादी अत्याचार ना सहने की..

आज़ादी हिंदुस्तान में कहीं भी रहने की..

आज़ादी खुली हवा में सांस लेने की...



मगर अब.......



हर तरफ़ ख़ून है, लाशें हैं...बर्बादी है....


ज़रा सोचिए क्या हमें जीने की आज़ादी है....





- पुनीत भारद्वाज

नारी शक्ति को सलाम.... वूमंस-डे प्रोमो


वो ममता की मूरत है,

तो कभी एक लाडली बेटी...

एक आदर्श बहू होने के साथ,

वो बंधी है राखी की डोर से...

कभी वो कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ती है,

तो कभी उस अबला को रहना पड़ता है दहलीज़ की मर्यादाओं में...

नारी की शक्ति पर टिका है सारा जहान

नारी के इन सब रूपों को हमारा सलाम

- पुनीत भारद्वाज

हैप्पी बर्थडे गुलज़ार साहब....

18 अगस्त को गुलज़ार साहब पैदा हुए थे... गुलज़ार साहब के जन्मदिन पर मेरी ये पेशकश...

मैं वो पत्रकार हूं....


क़लम की तलवार हूं
कटाक्ष की कटार हूं
सत्य की मैं धार हूं
वैचारिक ज्वार हूं
लोकतंत्र है जिसकी मंज़िल,
मैं वो पत्रकार हूं...

भाषाई औज़ार हूं
अभिव्यक्ति का व्यवहार हूं
अंकुश हूं, हथियार हूं
ख़बरों की जो ख़बर ले
मैं ऐसा ख़बरदार हूं
लोकतंत्र है जिसकी मंज़िल,
मैं वो पत्रकार हूं...


- पुनीत भारद्वाज

क्योंकि ये मेरी जेब है... बजट प्रोमो

टैक्स पे टैक्स..

औंधे मुंह गिरता सेनसेक्स..

इनफ्लेशन का दौर..

महंगाई चारों ओर..

चिदंबरम का पिटारा तय करेगा आप पर बजट का भार

और कितनी पड़ेगी इस साल टैक्स की मार

क्या आपकी जेब झेल पाएगी... बजट 2008

क्योंकि ये मेरी जेब है !

-पुनीत भारद्वाज

सब ऊंगली का खेल है मेरे भाई....



ऊंगली इतनी important होती है इसका पता अपन को काफी दिनों बाद चला..बचपन में नाक औऱ कान में ऊंगली डालने पर टीचर अक्सर डांट पिलाती थी..छी छी छोटा बाबा तुम कितना गंदा है..नाक में ऊंगली डालता है..तब से अपन को लगा कि ऊंगली कुछ ऊल जलूल चीज़ है..लेकिन मीडिया में आये तो पता चला ये ऊंगली बड़े काम की चीज़ है..ये आपके लिए सुदर्शन चक्र साबित हो सकती है..आपके अच्छे-अच्छे दुश्मनों के गले काट सकती है..किसी के भी काम में ऊंगली करो और बन गये आप बॉस फेवरेट..इसलिए ऊंगली करना और ऊंगली को झेलना दोनों सीखिए...सफलता आपके कदम चूमेगी..हां ऊंगली कहां कहां की जाती है..ये आपको सीखना पड़ेगा..



तुषार उप्रेती

करते रहिए हाय हाय….


ये हाय ,हाय का ही खेल है दोस्तों। अगर किसी से हाय बंद हो गई तो समझिए आपकी किस्मत का ताला भी बंद हो गया। अगर किसी ने हाय दे दी तो समझिए जिंदगीभर मीड़िया में मैंढ़क की तरह बैठ कर टर्राते रहेंगें कोई सुनने वाला नहीं। आखिर पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर किया भी कैसे जा सकता है। ये मगरमच्छ भी ना 'टू मच' होते हैं जी। छोटे छोटे मैंढ़कों को खाकर समझते हैं कि चैनल की प्रगति के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन होता उल्टा है जो मैंढ़क बरसाती होने के बावजूद हर मौसम में टर्राना सीख जाता है उसे भी हाय दे देते हैं। बेचारा हाय हाय हाय॥करते हुए अपने कुएं से बाहर निकल जाता है। दुनिया है बड़ी ज़ालिम।।। कोई सुनने वाला नही।...कौन किसका सगा यहां सबने सबको ठगा। अब बताइए हमें समझाया जा रहा है कि सबसे हाय हैलो चालू रखो और किसी की हाय मत लो। अगर दुनिया छोटी है तो मीड़िया की दुनिया जिंदगी का गोल चक्कर..।एक न एक दिन सबको दौबारा वहीं मिलना है जहां से बिछड़े थे। औऱ फिर से हाय करनी है।।।मैंने अपनी आंखों से देखा है जी। अभी किसी रंग का चश्मा नहीं चढ़ा है न।। एक दिन खूब हंगामा हुआ,,तू कौन मैं खामखा का ड्रामा भी देखा।।लोगों को एक दूसरे की हाय लेते और देते भी पाया।।गालियों की बौछारें सुनी।।।कानों से खून भी निकला।।बंदे अलग हो गये।।एक दूसरे की खूब मां-बहन करने के बाद। शूट पर दोनों को फिर से हाय कहते देखा।।। जी मचल गया।.. कितना नकली बेकार शहर है ये...कोई शख्स ठीक कह गया है जो जर्नलिज़्म करना चाहता है। वो नौकरी छोड़ने के लिए तैयार रहे।।।क्योंकि अंधों के शहर में आइने बेचना बेकार है....नहीं तो करते रहिए हाय हाय...वैसे इसका एक मतलब और भी होता है।।।



तुषार उप्रेती

चरखड़ी.....


मैं हमेशा से पतंगबाज़ बनना चाहता था,लेकिन हर बार मेरे हाथ में चरखड़ी पकड़ा दी जाती। हर बार मन होता कि कहूं कि मुझे मौका दिया जाये।फिर मैं भी बता दूंगा इस दुनिया को कि पेच लड़ाना किसे कहते हैं। मौका तो दूर की बात है पतंग के कट जाने पर मुझे सद्दी लपेटने तक का मौका नहीं मिला। शायद इसलिए कि यहां छत पर पतंगें कम नैनों के पेच ज्यादा लड़ाए जाते हैं। मेरे पास आंखें तो हैं, पर पेच लड़ाने लायक नहीं। इसलिए रेस में मैं पीछे छूटता जा रहा हूं।
जब लोग अपना मांजा घिस रहे होते हैं तो मैं चरखड़ी पकड़ कर उनकी हौंसला अफजाई करता हूं। इस ड़र से की किसी दिन कोई सिरफिरा तंग आकर मुझे ड़ोर थामने को कहेगा। फिर मैं दिखाऊंगा इस दुनिया को कि पेच लड़ाए बिना भी आकाश की गहराई को नापा जा सकता है। उन सारी कहावतों को झुटला दूंगा जो sky is the limit के दावे करती हैं। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि मैं तो चरखड़ी पकड़े खड़ा हूं। कभी कभी लगता है कि जैसे पतंगबाज़ के हाथ से मांजा फिसल जाता है । उसी तरह मेरे हाथ से उम्र फिसलती जा रही है और सद्दी है कि कमबख्त खत्म होने का नाम नहीं ले रही। फिलहाल इज़ाजत दीजिए। मुझे जाना है। पतंगबाज़ का आदेश है। फिर से चरखड़ी पकड़नी है। ढ़ील देनी है।


तुषार उप्रेती



बनना ही पड़ेगा सरपंच...



कई बार प्यादे से शतरंज जीत लिया जाता है... प्यादा आठ खाने फलांगता है और सरपंच बन जाता है... केवल प्यादा ही सरपंच बन सकता है... घोड़ा, वज़ीर, ऊंट, हाथी... ताकतवर सरपंच नहीं बन पाता... वो जो होता है वही रहता है... प्यादा धीरे धीरे दौड़ता है... कदम कदम चलता है.... और इसीलिए सबसे ज्यादा ख़तरा उसी को रहता है... जिसे देखो बेचारे गरीब को मारने की जुगत भिड़ाता है... उसके मरने का ज्यादा ग़म तो मालिक को भी नहीं होता... बाकी को बचाने को प्यादा शहीद कर दिया जाता है... तेज़ का जमाना है... टूट पड़ने का ज़माना है... घोड़ा बचाना है, प्यादा तो अड़ाना ही पड़ता है... ऊंट बचाना ज़रूरी है, और प्यादे का काम ही है... घर के हाथी के लिये शहादत देना... वैसे उसकी शहादत का ज्यादा मोल नहीं होता... प्यादे की ओर ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं होती... वो सरकता रहता है... आठ घरों तक... बस आठ घरों तक... फिर प्यादा शेर हो जाता है... वज़ीर बन जाता है... प्यादे को सब मारते हैं वो किसी को सीधे नहीं मार सकता... इसलिए तिरछा मारता है... प्यादा मज़बूर है... आठवें घर तक पहुंचना है... फिर प्यादा बड़े काम का हो जाता है... प्यादे का अहोदा बढ जाता है...वो राजा को बचाने लगता है... अकेले दम पर खेल जीत लेता है... प्यादा हमेशा फ़ायदेमंद होता है... प्यादा होता है तो वज़ीरों को बचाता है... वज़ीर बन गया तो राजा को... प्यादा सस्ता होता है... उसके लिये ज्यादा नहीं खर्चना पड़ता... उसे जाने पर शोर नहीं मचता... उसे चिल्ला चिल्ला कर अपनी कीमत बताने का अधिकार नहीं होता... प्यादे को घिसना पड़ता है... उसे आठ खाने लांघने होते हैं... प्यादे को अपनी कीमत बतानी नहीं दिखानी होती है... वज़ीर बनके... सरपंच बनके... शतरंज की बिसात बिछी है... लगता है अब बनना ही पड़ेगा सरपंच...।