चरखड़ी.....


मैं हमेशा से पतंगबाज़ बनना चाहता था,लेकिन हर बार मेरे हाथ में चरखड़ी पकड़ा दी जाती। हर बार मन होता कि कहूं कि मुझे मौका दिया जाये।फिर मैं भी बता दूंगा इस दुनिया को कि पेच लड़ाना किसे कहते हैं। मौका तो दूर की बात है पतंग के कट जाने पर मुझे सद्दी लपेटने तक का मौका नहीं मिला। शायद इसलिए कि यहां छत पर पतंगें कम नैनों के पेच ज्यादा लड़ाए जाते हैं। मेरे पास आंखें तो हैं, पर पेच लड़ाने लायक नहीं। इसलिए रेस में मैं पीछे छूटता जा रहा हूं।
जब लोग अपना मांजा घिस रहे होते हैं तो मैं चरखड़ी पकड़ कर उनकी हौंसला अफजाई करता हूं। इस ड़र से की किसी दिन कोई सिरफिरा तंग आकर मुझे ड़ोर थामने को कहेगा। फिर मैं दिखाऊंगा इस दुनिया को कि पेच लड़ाए बिना भी आकाश की गहराई को नापा जा सकता है। उन सारी कहावतों को झुटला दूंगा जो sky is the limit के दावे करती हैं। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि मैं तो चरखड़ी पकड़े खड़ा हूं। कभी कभी लगता है कि जैसे पतंगबाज़ के हाथ से मांजा फिसल जाता है । उसी तरह मेरे हाथ से उम्र फिसलती जा रही है और सद्दी है कि कमबख्त खत्म होने का नाम नहीं ले रही। फिलहाल इज़ाजत दीजिए। मुझे जाना है। पतंगबाज़ का आदेश है। फिर से चरखड़ी पकड़नी है। ढ़ील देनी है।


तुषार उप्रेती



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