मां.....

इस कविता से पहले बालकवि बैरागी की पंक्तिया

"ईश्वर, अल्हा, राम लिखा
गुरु नानक सतनाम लिखा
जब एक शब्द में होड़ लगी दुनिया लिखने की
तो मैंने मां का नाम लिखा "





वो आई झूमके,
मुझे चूमके,

फिर आई उसके चेहरे पर एक संतोष की रेखा
मुझमें भी वो सुकून आया जब मैंने उसे गहनता से देखा
उसका अंङ इतना मखमली
मानिंदे सुर्ख़ाब के पंख
आलिंगन के व्यवहार की तपिश से मुझमें होता संचार
मोक्ष व हर ख़ास से था ये अप्रतिम एहसास

उसके ह्रदय का स्पंदन सुनकर
मैं खो गया ये धुन बुनकर
कि कहां सुना है ये मिश्री जैसा साज़
जो था बेअवाज़ पर खोल रहा था सैंकड़ों राज़

तब मैं खो गया काल की गहराईयों में
उस वक़्त की खाइयों में
जब मैं प्रस्फुटित हो रहे कमल की भांति
मां के गर्भ में पल्लवित हो रहा था
उस शुचितता को तजकर
भौतिकता में आने की बांट जोह रहा था

तब यही साज़
जिसे सुनकर अकुलाहट थी मुझमे आज

यही था..
हां, यही था वह नाद
जिससे मैंने नौ महीने किया था संवाद

जिससे मैंने नौ महीने किया था संवाद......




- पुनीत भारद्वाज

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