चेहरे....


शहर की इस भीड़ में ढूंढ़ता हूं एक चेहरा
और

चेहरों की इस भीड़ में हर चेहरा
इश्तेहार लगता है
जहां चेहरे इश्तेहार हो गये

वहां रिश्ते बाज़ार हो गये
लोग घरों की तलाश में क्यों भटकते हैं यहां ?

यहां जेबें भरी हैं लोग बेरोज़गार हो गये
मैं फिर भी तसल्ली से जी रहा था

इस उम्मीद में कि होगी सहर
पर ना जाने कब इस भीड़ में

हम भी होशियार हो गये।

तुषार उप्रेती

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