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मित्र-मंडली


तुषार, पुनीत, प्रशांत और दीपक


ना शहर की भीड़ में दिल लगता है
ना तन्हाईयों की गहराई में
ना किसी की याद में दिल खोता है
ना किसी की अंगडाई में
अपना दिल तो तब लगता है
जब अपने यार अपने साथ हों
अपना दिल तो तब जवां होता है
जब हाथों में यारों का हाथ हो..

तस्वीरें .....




मुझे तस्वीरों से सख्त नफरत है। न जाने कब किस मोड़ पर मेरे सामने पड़ जाएं और आंखें उनका मुंह नोच लें। कारण बड़ा ही सीधा सा है। एक तो तस्वीरें हमेशा सुख के शब़ाब में डूबे पलों की होती हैं। जिन्हें देखकर मन हर बार ये सवाल गेंद की तरह उछाल देता है कि शायद मेरा बिछड़ा कल ज्यादा हसीन था। दिमाग भी उसी वक्त फरमान जारी करते हुए कहता है,कि, अगर पास्ट अच्छा था तो मैं भला किस फ्यूचर की तलाश में भटक रहा हूं । जहां जिंदगी हर कदम पर फासले पैदा करती जा रही है।

हाईवे....

खूबसूरती की शुरुआत तो अपने शहर से बाहर निकलते ही हाईवे पर हो जाती है। जो गाड़ी शहर में खांस खांस कर चलती है वो भी हाईवे पर अपनी जवानी जीना जानती है। हमने भी एक्सीलेटर पर पांव टिका दिया और एक शहर से भाग कर दूसरे शहर में मुंह छिपाने पहुंच गये। इस बार कैथल (हरियाणा),चंड़ीगढ़,होते हुए गाड़ी को सीधे ब्रेक लगा शिमला में। हां हरियाणा में मां के पांव छुए तो चंड़ीगढ़ की सड़कों पर खेलते हुए शिमला जा पहुंचे। लफंटर तो हम चारों हैं ही। ऊपर से थोड़े लडाकू भी। रास्ते भर छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे की मां-बहन एक होती रही। कभी आगे की सीट से कैसेट उछल कर बैक सीट वाले यार की खोपड़ी का मुआयना करती हुई बच निकली। तो कभी कोई दोस्त बीच रास्ते में वापस लौट जाने पर अड़ गया। दोस्त हैं साले। दो सुट्टे ज्यादा लगवाए। दो दारु की घुंट लगवाई। बंदे मस्त हो गये। लेकिन ये सफर हमें काफी कुछ सीखा गया। सबसे पहला सबक जो हमने हाईवे पर सीखा वो ये था कि दोस्ती यारी में अल्फाज़ों से नहीं खेलना चाहिए। अल्फाज़ जो ज़ुबां से फिसल कर कई बार भीतर तक कुरेद जाते हैं। हमें भी अल्फाज़ों ने सारे रास्ते जख़्मी करे रखा। काफी मुश्किलों के बाद लबों से निकलकर भागे अल्फाज़ों को दारु के नशे में भीगोकर सूखने ड़ालना पड़ा। वापसी में याद रहा तो सिर्फ इतना ही की अल्फाज़ अब पीछा नहीं कर रहे हैं। हाईवे पर गिरकर किसी मर्दाना ट्रक के नीचे आकर अपनी जान गवां चुके हैं। शायद यही दोस्ती है।

पता नहीं कितना सही है पर नेरुदा याद आ रहे हैं----
नापती हैं बमुश्किल मेरी आंखें तुम्हारा
और अधिक विस्तार पाने को
और मैं झुकाता हूं अपने आप को
तुम्हारे होठों पर समूची पृथ्वी को चूमने।

रावण जलते रहेंगे....


इस बार भी रावण जल गया । लोग राम का नाम लेकर अपने अपने घर चले गये। अगले साल दशहरा फिर आएगा । भीड़ फिर इक्ट्ठा होगी। रावण के जलने का तमाशा देखेगी। फिर घर लौट जाएगी। कभी- कभी सोचता हूं ,भीड़ को हर साल एक रावण चाहिए । जिसे जलाकर कुछ पल सुकून मिलता है। फिर सब तमाशबीन अपने अपने घर लौट जाते हैं। अगले साल दर्जनों रावण फिर से पैदा कर उन्हें फिर से जलाकर , सब अपनी अपनी छाती पिटेगें। यही होता आया है। रावण हैं जो कमबख्त खत्म नहीं होते और भीड़ है जिसका हौंसला भी कम नहीं होता।

वादियों से लौटकर....



उस दिन बुधवार था पलकों ही पलकों में सारा दिन निकल गया। जो पलकें कभी फुर्सत के कुछ पल तलाशती थी, वो आज इस जुगत में थी की कब दो दिनों के लिये हम सब दिल्ली के कॉन्क्रिट के जंगल से विदा लेकर उस प्राकृतिक जंगल के आगोश में समा जायें जो यहां से तकरीबन तीन सौ किलोमीटर दूर मसूरी की ठंडी वादियों में बसा हुआ था। बस बहुत हुआ अब अपनी नई नवेली नौकरी को पहली बार हम ऑफिस की दहलीज़ पर छोड़े चले जा रहे थे। शायद यही फर्क होता है नौकरी और छोकरी में; मन में उदासी कम उमंग ज्यादा थी। चार दोस्त, एक गाड़ी और ठंड़ी हवा के झोंके बस रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला। रास्ते भर कई तरह की बाते हुईं- गुजरात के दंगों से लेकर लड़कियों की वर्जिनिटी तक...
शायद किसी ने ठीक कहा है जिंदगी का असली मज़ा सफऱ में हैं मंजिल की खामोशी में नहीं। वापिस आये तो अपना शहर पराया लग रहा था। मानो उसने किसी और के साथ घर बसा लिया हो।
- मित्र मंडली