हिज्र....






ये जो हिज्र* का ग़म है * separation
इक जानलेवा ज़ख़्म है
और जो तेरी यादें हैं
वो इस पीर* का मरहम है
* दर्द
ग़मे-हिज्रा* से पल-पल मर रहा हूं
* बिछड़ने का दर्द
और यादों में तेरी शफ़ा* ऐसी के
* healing power
मरके भी हर पल जी रहा हूं......




-पुनीत भारद्वाज


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

the pain of separation....
nicely portrayed through this poem.
i think this could well b a healer 4 others...
should reach manyyyy people who r all away 4m their better-halves!!!!